काली बकरी नहीं काला सोना है ,आदिवासियों के लिए की लाखों की कमाई 

काली बकरी नहीं काला सोना है ,आदिवासियों के लिए की लाखों की कमाई

Positive story  भूख और कुपोषण से मरते लोगों को देख कर आये एक आइडिया ने आज लोगों की जिंदगी बदल कर रख दी आज महाराष्ट्र के 8000 आदिवासी लोग बकरी पालन के क्षेत्र से जुड़ कर अपनी आजीविका चला रहे हैं और सम्मान की जिंदगी जी रहे हैं | 

एशिन एग्रो लाइवस्टॉक एक ऐसा NGO है जिसने लोगों को काला सोना के साथ जोड़ दिया और बकरी पालन जिसमे काली बकरी को प्रोत्साहन देकर शुरू किया गया प्रयास आज कई लोगों को भुखमरी से बचा रहा है | 

'काला सोना-जीवन के लिए आशा'

एक NGO ने बकरी पालन के लिए लोगों को ट्रेनिंग दी और आज स्थिति यह है की 5 परिवार से शुरू की गई योजना आज 8000 परिवारों तक पहुंच गई है | इस की शुरुआत करने वाले डॉक्टर नीलरतन शेण्डे ने उस समय की जब उन्होंने मेलघाट में अपनी पीएचडी की पढ़ाई के दौरान भूख और कुपोषण से किसी को मरते देखा, तभी उन्होंने एनजीओ शुरू करने का फैसला किया। और तभी EAGL ईएजीएल (एशिन एग्रो लाइवस्टॉक) की स्थापना हुई। 

PIB Press Information Bureau द्वारा इस NGO के लोगों से बात की गई और उनसे यह जाना कि आदिवासी क्षेत्रों में सबसे बड़ा लाभ इस योजना का हुआ क़ी गाँव वालों का पलायन रुक गया जो रोजगार के लिए दूर दर्ज क्षेत्रों में अपने परिवार को छोड़कर जाते थे आज वह अपनों के बीच में ही लोगों के साथ काम करके एक अच्छी जिंदगी बिता रहे हैं | 

। मझगांव डॉकयार्ड लिमिटेड ने 1.3 करोड़ रुपये की लागत से 200 आदिवासी परिवारों की मदद की। आदिवासी लोग बकरी के गले में बंधी रस्सी को एक रस्सी ही नहीं मानते बल्कि उसे अपनी लाइफ लाइन मानते हैं। वे काली बकरी को काला सोना मानते हैं | 

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