गुरु पूर्णिमा -ईश्वर की प्राप्ति में गुरु की क्या है भूमिका और प्रभु का कैसे मिलता है आशीर्वाद-स्वामी रामानंद सरस्वती 

स्वामी रामानंद सरस्वती

प्रभु का साक्षात् स्वरूप है गुरु : स्वामी रामानंद सरस्वती                                     

(आर. एल. पाण्डेय )                 

 यह संसार पृथ्वी पर ईश्वर की अनुपम देन है. यहाँ का हर चराचर प्राणी व सम्पूर्ण प्रकृति प्रभु की मर्जी से संचालित है. बिना ईश्वर की इच्छा पूरे ब्रम्हाण्ड में पत्ता भी नहीं हिल सकता है. नियम - संयम से रहकर ध्यान साधना में लगे रहने वाले संत हृदय सौभाग्यशाली लोगों को गुरु के आशीर्वाद से प्रभु की कृपा तो मिल जाती है लेकिन ईश्वर के विराट स्वरूप के दर्शन तो विरले ही संत - महंत और उच्चकोटि के साधकों को हो पाते हैं. वेद पुराण से लेकर बाद के महाकवियों तक ने गुरु का स्थान ईश्वर से भी बड़ा माना है - गुरु गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागौ पाय, बलिहारी गुरु आपने, गोविन्द दियो मिलाय.

इंटरनेशनल सोसाइटी फॉर स्प्रिचुयल एडवांसमेंट (आइसा, अमेरिका) के अध्यक्ष स्वामी रामानंद सरस्वती जी गुरु की महिमा पर व्याख्यान देते हुए कहते हैं कि गुरु संसार में ईश्वर का साक्षात् स्वरूप होता है. बिना गुरु की कृपा के कोई प्रभु का आशीर्वाद नहीं पा सकता है.

गुरु ही मिलाता है भगवान से 

गुरु ही भक्त और भगवान को एक दूसरे से मिलाता है. इसीलिए कहा जाता है कि जिसे सच्चा गुरु मिल गया मानो भगवान मिल गये. ईश्वर तक पहुंचने का मार्ग गुरु ही प्रशस्त्र करता है. इस मार्ग में भी बहुत बाधाएं आती हैं जिन्हें गुरु अपने तप व साधना के बल से दूर कर देता है.सनातन परम्परा में गुरु पूर्णिमा का पवित्र पर्व उन सभी आध्यात्मिक गुरुओं को समर्पित है जिन्होंने कर्म योग के सिद्धांत के मुताबिक स्वयं और अपने शिष्यों के साथ सदैव सम्पूर्ण जगत के कल्याण की कामना की.

गुरु पूर्णिमा कौन मनाते हैं ?

गुरु पूर्णिमा का पर्व भारत, नेपाल और भूटान में हिन्दू, जैन और बौद्ध धर्म के अनुयायी बड़े उत्साह व हर्षोल्लास के साथ मनाते हैं. यह पर्व अपने आध्यात्मिक गुरुओं के सम्मान और उनके प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट करने का दुर्लभ क्षण है. हिन्दू पंचांग के अनुसार आषाढ़ मास की पूर्णिमा को ही गुरु पूर्णिमा पर्व मनाया जाता है. हिन्दू परम्परा के अनुसार गुरु पूर्णिमा का पर्व वेदों के रचयिता महर्षि वेद व्यास के जन्मदिन के रूप में भी मनाया जाता है. इसीलिए इस पर्व का एक प्रचलित नाम व्यास पूर्णिमा भी है.रामानंद सरस्वती जी का कहना है कि गुरु पूर्णिमा का पर्व हमें अंधकार से प्रकाश अर्थात अज्ञान से ज्ञान के मार्ग पर ले जाने का सुगम व सरल तरीका दिखाता है.

श्री रामचरितमानस में बताए गए हैं सदगुरू के सात लक्षण 

श्रीरामचरितमानस के रचयिता महाकवि तुलसीदास ने भी सद्गुरु के सात लक्षण बताये हैं. पहला बालक की तरह निर्मल व शुद्ध हृदय, दूसरा त्याग भावना, तीसरा निरंतर गतिशील रहने व मन में जाति, पंथ व पद का कोई भेद न करने वाला, चौथा शिष्य से मित्रवत व्यवहार करने वाला, पांचवां काम - क्रोध - मद - मोह इन चारों विकारों का दहन करने वाला, छठा मनरूपी नाभि के विकारों को छेदन कर नष्ट कर देने वाला और सातवाँ शिष्य के मन में उठने वाले सभी प्रश्नों का समुचित उत्तर देकर उसे संतुष्ट करने वाला ही सच्चा गुरु हो सकता है.

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