बुंदेलखंड से रोजगार के लिए होने वाले पलायन को रोकना है चुनौती

बुंदेलखंड से रोजगार के लिए होने वाले पलायन को रोकना है चुनौती
बुंदेलखंड से रोजगार के लिए होने वाले पलायन को रोकना है चुनौती भोपाल/छतरपुर, 31 जुलाई (आईएएनएस)। बुंदेलखंड का जिक्र आते ही ग्रामीण इलाके की बदहाली की तस्वीर आंखों के सामने कौंध जाती है। यहां की समस्याओं के किस्से देश और दुनिया में सुनाए जाते हैं। इस इलाके का सबसे बड़ा दर्द रोजगार के लिए पलायन है। हर साल की तरह इस साल भी पलायन का सिलसिला चल पड़ा है। अभी रफ्तार थोड़ी धीमी है मगर रक्षाबंधन के बाद इसके तेज होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

बुंदेलखंड वह इलाका है जो सभ्यता, संस्कृति और खनिज संपदा से समृद्ध है। मगर पानी का संकट यहां की खुशहाली पर ग्रहण लगा देता है। इस इलाके के लोगों की जिंदगी पूरी तरह बारिश पर निर्भर होती है, अगर बारिश अच्छी हुई तो पलायन कम होता है और बारिश कम हुई तो पलायन ज्यादा होता है।

बुंदेलखंड वह इलाका है जो मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में फैला हुआ है। मध्य प्रदेश के सात जिले और उत्तर प्रदेश के भी सात जिले इस क्षेत्र में आते हैं और इनमें से अधिकांश जिलों की स्थिति लगभग एक जैसी होती है।

इस साल अभी तक की स्थिति देखें तो बुंदेलखंड में काफी कम बारिश हुई है और मानसून की सक्रियता से यह उम्मीद जरूर की जा रही है कि इस बार बुंदेलखंड में भी अच्छी बारिश होगी। वास्तव में होगा क्या, यह तो आने वाले समय में ही पता चल सकेगा। यह इलाका कभी अपनी जल संरचनाओं के लिए पहचाना जाता था, मगर धीरे-धीरे यह जल संरचनाएं जमींदोज होती गई और पानी बचाने, संरक्षण के नाम पर लूट करने में कोई भी पीछे नहीं रहा। यही कारण है कि बारिश का पानी रुक नहीं पाता और पर्याप्त बारिश के बावजूद इस इलाके को पानी के संकट से जूझना होता है।

बुंदेलखंड क्षेत्र में जल संरक्षण के लिए काम कर रहे शोध छात्र रामबाबू तिवारी का कहना है कि, बुंदेलखंड में पलायन यहां के मेहनतकश मजदूरों के लिए नियति बन चुका है। बारिश पर खेती निर्भर करती है और यहां की आय का साधन ही खेती है। मजदूरों को काम करने परदेस जाना होता है और इस बार भी मजदूरों के पलायन का सिलसिला शुरू हो चुका है।

तिवारी बताते हैं कि उन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों के प्रवास के दौरान महसूस किया है कि कोरोना काल से पहले मजदूरों को जो मजदूरी मिलती थी, अब उससे कम हो गई है। मजदूरों को ठेकेदार और कारोबारी बुला तो रहे हैं, मगर पहले जो मजदूरी देते थे उससे कम देने की बात कह रहे हैं। कुल मिलाकर मजबूरी में मजदूरी करने जाने वाला मजदूर शोषण का भी शिकार होगा, इसे नकारा नहीं जा सकता।

सामाजिक कार्यकर्ता मनोज चौबे कहते हैं कि पलायन बुंदेलखंड से होता है, इसे शासन प्रशासन जानता है, मगर जुलाई और अगस्त में पलायन की रफ्तार बहुत धीमी होती है उसके बाद पलायन बढ़ जाता है। ऐसे में जरूरी है कि प्रशासन और सरकार मिलकर ऐसी रणनीति और योजना बनाए जिससे यहां के लोगों को पलायन ही न करना पड़े। यह वह समय है जब कोई कारगर रणनीति बनाकर उस पर अमल किया जाए, समय रहते बनाई गई रणनीति इस क्षेत्र और यहां के लोगों को पलायन से मिलने वाले दर्द को कम किया जा सकेगा।

बुंदेलखंड क्षेत्र के जानकार और वरिष्ठ पत्रकार रवींद्र व्यास का कहना है कि बुंदेलखंड की तस्वीर बदलने के लिए अनेक योजनाएं आई, यहां तक कि यूपीए सरकार के कार्यकाल में लगभग साढे सात हजार करोड़ का पैकेज भी मंजूर हुआ, मगर इस पैकेज की किस तरह बंदरबांट हुई यह यहां की स्थिति को देखकर समझा जा सकता है। पलायन रोकने के लिए जरूरी है कि एक कारगर रणनीति अभी से बनाई जाए, क्योंकि पलायन का दौर तेज होने में एक माह से ज्यादा का वक्त है। दोनों राज्यों की सरकार अगर मनरेगा सहित दीगर योजना के जरिए मजदूरों को काम मुहैया कराए तो पलायन को रोका जा सकता है। मगर सवाल यह है क्या ऐसा हो पाएगा? या फिर रेलवे स्टेशन हो, बस अड्डे हो, हर तरफ हजारों लोग सिर पर पोटली रखे हुए परदेस की तरफ भागते नजर आएंगे।

व्यास आगे कहते हैं कि पलायन का दौर शुरू होते ही यहां की दर्द भरी तस्वीरों और बदहाली को दिखाकर समाज सेवा के नाम पर सरकारी और गैर सरकारी संस्थाओं के धन की लूट करने वालों की सक्रियता बढ़ जाती है, सरकार सोचती है कि उसने हालात बदलने के लिए बड़ा बजट मंजूर किया, मगर जमीनी हकीकत कुछ और होती है। अब तक इस इलाके में पानी संरक्षण के लिए खर्च हुई राशि का ऑडिट हो जाए, तो हकीकत सामने होगी।

इस इलाके के जानकारों की मानें तो सितंबर तक कई गांव में तो 25 फीसदी से ज्यादा आबादी पलायन कर चुकी होती है। आलम यह होता है कि गांव में सिर्फ बुजुर्ग और बच्चे ही नजर आते हैं। क्या इस बार भी ऐसा ही होगा यह चिंता अभी से सताने लगी है। वहीं सरकार और प्रशासन के लिए पलायन को रोकना किसी चुनौती से कम भी नहीं है।

--आईएएनएस

एसएनपी/एसकेपी

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