गंगा किनारे शवों का मिलना और भगवा चादर होना, किसी साजिश से कम नहीं

Ganga river
 

गंगा में मिली लाशों की असल सच्चाई 

          पतितपावनी माँ गंगा जिनका हमारे धर्मग्रंथों में सर्वोच्च स्थान है,जो गंगा इस कलियुग में भी पापियों के समस्त पापों का समूल नाश करने वाली हैं इसीलिए गंगा का एक प्रसिद्ध नाम “मोक्षदायिनी” भी है ! सनातन हिन्दू धर्म में मान्यता है कि मृत्यु के समय यदि मृतक के मुंह में गंगाजल और तुलसीदल डाल दिया जाये तो वो मनुष्य मुक्ति को प्राप्त करता है और ऐसा सदियों से होता भी चला आ रहा है ! सनातन धर्म में मृत्यु को परम सत्य माना गया है वेद तो यहाँ तक कहते हैं कि मृत्यु जीवन का सबसे बड़ा पर्व है क्योंकि “मृत्यु” के पश्चात ही मनुष्य को पुनः नवजीवन प्राप्त होता है ! जिस प्रकार मनुष्य समय-समय पर अपने पुराने वस्त्रों को त्यागकर नये वस्त्र धारण करता है ठीक उसी प्रकार शरीर के अन्दर निवास करने वाली “आत्मा” मृत्यु के पश्चात उस मृत शरीर को त्यागकर एक नये आवरण अर्थात शरीर को धारण कर लेती है इसीलिए समस्त जीवों के शरीर को “नश्वर” की संज्ञा भी दी गयी है अर्थात जिसे अंततः नष्ट ही होना है हिन्दू धर्म ग्रंथो में कहा गया है...
नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः। न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः।।
जिसका अर्थ है कि “आत्मा को न शस्त्र काट सकते हैं, न आग उसे जला सकती है। न पानी उसे भिगो सकता है, न हवा उसे सुखा सकती है।“
                              वैदिक मान्यता के अनुसार हिन्दू धर्म में मृतक के मृत शरीर को गंगा नदी के पावन व पवित्र घाट पर ही अंतिम संस्कार करने की पुरातन परंपरा रही है और क्रमशः आज भी ऐसा ही होता है ! जिन शहरों के किनारे गंगा नहीं हैं वहाँ अन्य किसी पवित्र नदी के घाट पर ही अंतिम संस्कार करने की प्राचीन परंपरा है किन्तु अंततः मृतक की अस्थियों को माँ गंगा में ही प्रवाहित किया जाता है ! 
                भारतीय समाज में बहुत प्राचीन कहावत है कि “घाट घाट पर पानी,बदले कोस कोस पर वाणी” और ये कहावत ठीक उसी तरह सत्य है जैसे सूर्य का पूर्व से उदय होना ! अभी पिछले ही दिनों सभी टीवी चैनलों की सुर्खियाँ बनी न्यूज़ आप सभी ने देखी होगी जिसमे कानपुर के रौतापुर और शिवराज पुर गाँव के खेरेश्वर घाट पर गंगा के बीच में और उसके किनारे सैकड़ो शवों को बालू में दफनाया गया था ! इन सभी समाचार चैनलों ने इस खबर को खूब नमक मिर्च लगाकर प्रचारित-प्रसारित किया ! इसके साथ ही काशी और चंदौली के अलावा उन्नाव, बलिया, गाजीपुर, फतेहपुर जैसे शहरों में भी गंगा में लाशें बहने की खबरें भी दिखाई गयी ! इस खबर के प्रसारित होते ही पूरे देश में सनातन धर्मावलम्बियों का सिर शर्म से झुक गया और स्थितियां यहाँ तक बिगड़ गयी कि इसका संज्ञान लेते हुए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के आदेश पर यूपी के डीजीपी को जाँच कराने के बाद मृतकों की सूची तक जारी करनी पड़ी जिसके अनुसार पुलिस को गंगा में और उसके किनारे सिर्फ 39 शव मिले हैं ! वाराणसी में 7, गाजीपुर में 15 से 16, चंदौली में 8 और बलिया में भी 8 शव बरामद किए जाने की बात कही गई थी नदी में शव प्रवाहित करने से रोकने के लिए उन्नाव, बलिया, गाजीपुर, वाराणसी, कानपुर, फतेहपुर में पेट्रोलिंग की विशेष टीमें लगाई गई हैं ! वहीं गाजीपुर के 18 श्मशान घाट पर पेट्रोलिंग के लिए पीएसी व स्थानीय पुलिस को लगाया गया है. सैदपुर से लेकर गहमर तक 34 पुलिस टीमों को तैनात कर गंगा में पेट्रोलिंग कराये जाने का आदेश भी दिया गया ! 


               यहाँ प्रश्न ये उठता है कि इन पेड टीवी चैनलों पर गंगा के किनारे बालू में दबे और उसके पवित्र जल में तैरते दिखाये गये सभी मृतकों के शरीर पर “भगवा चादर” ही क्यों था ? जो कि सनातन परंपरा के अनुसार पूर्णतया: अनुचित है ! हिन्दू परंपरा में गृहस्थ मृतक के शरीर पर सफ़ेद चादर डाली जाती है और उसके ऊपर “भगवा रामनामी चादर” किन्तु अंतिम संस्कार से पहले भगवा चादर हटा दी जाती है और सिर्फ सफ़ेद चादर ही रह जाती है और उसके बाद ही अंतिम संस्कार कि प्रक्रिया पूर्ण कि जाती है, हाँ इसके उलट हिन्दू परंपरा में संतों के शव पर ही सिर्फ भगवा रंग की चादर डाली जाती है किन्तु ध्यान देने योग्य बात ये है कि इन पेड टीवी चैनलों पर दिखाये गए सभी मृतकों के शरीर पर सिर्फ और सिर्फ भगवा चादर ही थी इसका तो साफ़ और सीधा अर्थ यही निकलता है कि उत्तर प्रदेश के इन क्षेत्रों में सिर्फ और सिर्फ साधू समाज के लोग ही मरे हैं जो कि पूर्णतया: असत्य है क्योंकि आज तक किसी भी अखाड़े ने अपने साधू-संतों की इतनी बड़ी संख्या में मृत्यु होने की कोई भी सूचना जारी नहीं की है                                                      


              इस पूरे मामले पर संत समाज ने भी प्रश्नचिन्ह खड़ा करते हुए अखिल भारतीय संत समिति के राष्ट्रीय अध्यक्ष पूज्य स्वामी जीतेंद्रानंद सरस्वती जी ने मुख्यमंत्री योगी जी को लिखे अपने पत्र में तो यहाँ तक कह दिया कि उत्तर प्रदेश सरकार और हिन्दुओं के विरुद्ध ये एक गहरी साजिश है ! माँ गंगा के किनारे अचानक इतनी बड़ी संख्या में शवों का मिलना और उन पर भगवा चादर होना एक षड्यंत्र से ज्यादा कुछ नहीं है ! 
              इस विषय पर प्रदेश के एक प्रतिष्ठित दैनिक समाचार पत्र ने भी जब गहराई से जाँच की तो सच्चाई इसके बिलकुल विपरीत निकली ! समाचार पत्र के अनुसार जब उनके पत्रकारों ने क्षेत्रीय ग्रामीणों से इस विषय में जानकारी की तो पता चला कि गंगा के किनारे बालू में दफनाये गए शव वर्षों पुराने हैं और पिछले दिनों हुई बरसात के बाद किनारे से बालू बह जाने के कारण ये शव ऊपर दिखाई देने लगे हैं ! ग्रामीणों के अनुसार उनके यहाँ पीढ़ियों से शवों को बालू में दफ़नाने की परंपरा चली आ रही है ! जिस रौतापुर गाँव के पास ये शव मिले वहाँ के ग्रामीणों ने भी बताया कि हमारे यहाँ शव को दफ़नाने की ही परंपरा है यहाँ तक कि कबीरपंथी भी अपने शवों को यही गंगा जी के किनारे वर्षों से दफना रहे हैं ! उन्नाव के डीएम रवीन्द्र कुमार ने भी यही कहा कि टीवी चैनलों और इंटरनेट पर दी गयी खबरें भ्रामक और गलत हैं,  हमने जाँच करने के बाद भी यही पाया कि ये शव वर्षों पुराने हैं ! प्रयागराज के श्रंगवेरपुर  घाट से भी ऐसी ही तस्वीरें सोशल मीडिया और पेड टीवी चैनलों पर लगातार दिखाई गयी जिनका उद्देश्य सिर्फ प्रदेश सरकार को बदनाम करके अपना स्वार्थ सिद्ध करना मात्र था किन्तु जाँच के बात जो तथ्य सामने आये वो चौंकाने वाले हैं जाँच से ये बात अब पूरी तरह स्पष्ट हो चुकी है कि इनमे से ज्यादातर शव यहाँ क्षेत्रीय ग्रामीणों के द्वारा पिछले कई वर्षों पहले दफनाये गए थे क्योंकि इन गावों में सबके यहाँ शवों को दफ़नाने की वर्षों पुरानी परंपरा है   
                जिस सनातन परंपरा में मनुष्य अपने पितरों की मुक्ति के लिये कर्ज तक लेकर भी उसके सभी अंतिम कर्म श्रधापूर्वक पूरे करता है उस समाज को कुछ कुत्सित विचारधारा के पेड चैनलों के द्वारा जिस प्रकार प्रचारित-प्रसारित किया गया वो निश्चित ही निंदनीय कृत्य है और इसका उद्देश्य सिर्फ हिन्दू परम्पराओं का मजाक बना कर स्वार्थसिद्धि या फिर पैसे कमाने का षड्यंत्र ही हो सकता है अन्य कुछ नहीं !   
            सोंचने वाली बात ये है कि कोरोना महामारी से उत्तर प्रदेश में आज तक हुई कुल मौतों की संख्या 19 हजार के आस-पास है जबकि आबादी के हिसाब से उत्तर प्रदेश लगभग 24 करोड़ की आबादी के साथ देश का सबसे बड़ा राज्य भी है दूसरी तरफ भारत सरकार के आंकड़ों के अनुसार उत्तर प्रदेश से कम आबादी वाले राज्य जैसे महाराष्ट्र में 89 हजार, कर्नाटक में 26 हजार, दिल्ली में 23 हजार, तमिलनाडु में 20 हजार, पंजाब में 13 हजार और पश्चिम बंगाल में 14 हजार लोगों कि मृत्यु कोरोना से हुयी है ! 
            अब यहाँ ये समझना आवश्यक हो जाता है कि सिर्फ उत्तर प्रदेश में ही शवों के इन वीभत्स द्रश्यों को अचानक से मीडिया चैनलों और इंटरनेट पर दिखाने की होड़ क्यों लग गयी थी ? इसके साथ ही राजनीतिक दलों के बड़े-छोटे सभी नेताओं के द्वारा सिर्फ टीवी चैनलों की रिपोर्ट के आधार पर ही और बिना तथ्यात्मक जाँच के ही उत्तर प्रदेश सरकार को कटघरे में क्यों खड़ा किया जा रहा था ? विपक्षी नेताओं के द्वारा अनर्गल बयान क्यों जारी किये जा रहे थे ? क्या अन्य राज्यों का प्रबन्धतंत्र उत्तर प्रदेश से इतना अच्छा है कि वहाँ एक भी ऐसी घटना नहीं हुई ? साथ ही अब जब सच्चाई दुनिया के सामने आ चुकी है कि ये सभी खबरे फर्जी थीं तो फिर क्या इन ख़बरों को दिखाने वाले सभी पेड मीडिया चैनल अपने इस कृत्य के लिए हिन्दू समाज से माफ़ी मांगेंगे ?
           इसके पीछे जो कुत्सित मानसिकता या सही अर्थों में कहा जाये तो “लाशों की राजनीति” काम कर रही है उसका उद्देश्य बिल्कुल स्पष्ट है कि वर्तमान उत्तर प्रदेश सरकार के कुशल प्रबंधन कि धज्जियां उड़ाते हुए उसके प्रबंधतंत्र के विरुद्ध अराजकता पूर्ण माहौल बनाकर  एक धर्म में द्वेष और भ्रम की स्थितियां पैदा करके उसको सरकार के विरुद्ध कर दिया जाये ! ध्यान रहे अगले वर्ष ही उत्तर प्रदेश में चुनाव होने हैं और जिनको जनता पूरी तरह नकार चुकी है ऐसे कुछ राजनीतिक दलों का प्रयास है कि किसी भी तरह समाज के बहुसंख्यक धर्म के ऊपर कुठाराघात करके उसको वर्तमान प्रदेश सरकार के खिलाफ खड़ा किया जा सके ! वो बहुसंख्यक धर्म जो इस वर्तमान सरकार को बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका रखता है किन्तु ऐसी विचारधारा रखने वाले पेड मीडिया चैनल, भड़काऊ नेता व राजनीतिक दल शायद ये बात भूल रहे हैं कि जिस बहुसंख्यक धर्म को ये भ्रामक जानकारियां दिखा कर वो भड़काने और भ्रमित करने की कुचेष्टा में लगे हैं वो बहुसंख्यक समाज अपने और पराये के साथ-साथ सच और झूंठ में भी भेद करना अब अच्छी तरह से समझ चुका है, वो अब इतना जागरूक हो चुका है कि इन भड़काऊ ख़बरों की तह तक जाकर वो उसकी सच्चाई आम-जनमानस तक लाने में पूर्णतया सक्षम है !  


लेखक- पं.अनुराग मिश्र “अनु”
स्वतंत्र पत्रकार व राजनीतिक विचारक
                                    लेखक स्वतंत्र पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक हैं !
नोट-ये लेखक की मौलिक रचना है,इस लेख के सर्वाधिकार लेखक के पास सुरक्षित हैं

Share this story