प्रकृति की पुकार पर बहरापन है आपदाओं की जड़-हरीशचंद्र श्रीवास्तव

प्रकृति की पुकार पर बहरापन है आपदाओं की जड़-हरीशचंद्र श्रीवास्तव
 सौ वर्ष पश्चात मानवता पुनः उसी खतरनाक मोड़ पर है। 1920 में प्लेग की महामारी का तांडव संसार लगभग भूल चुका था। अब चीनी विषाणु कोविड ने उससे भी भयानक स्थिति उत्पन्न कर मानव और प्रकृति के अंतर्संबंधों के असंतुलन को उजागर किया है। संसार त्राहि-त्राहि कर रहा है। एक प्रश्न बारंबार पूछा जा रहा है कि इस संकट का उत्तरदायी कौन है?

          अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर दानवीय प्रवृत्ति की शक्तियां हैं, जो स्वभाववश विध्वंसकारी आचरण करती ही रहेंगी, चाहे वह कोरोना वायरस अथवा पर्यावरण व पारिस्थिकीय तंत्र को नष्ट कर प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन के रूप में किया गया हो या आतंकवाद जैसे आपराधिक कृत्यों के माध्यम से संसार भर में निरीह लोगों का नरसंहार व उन पर अत्याचार के रूप में किया जा रहा हो। इन अपराधों में मारे गये, प्रताड़ित हो रहे या अपंग-अपाहिज और निःशक्त हो रहे निर्दोष लोगों का क्रंदन कहां जायेगा? प्रकृति और लोगों से होने वाली यह चीत्कार विश्व की राजसत्ताओं या नीतिनियंताओं को भले न सुनाई पड़ती हो, भले ही वे मानवता और प्रकृति के विरुद्ध नृशंस व क्रूरतम षडयंत्र रच रहे हों, किंतु प्रकृति सूक्ष्मतम ध्वनियों व पुकार को आत्मसात करती है। जब प्रकृति आक्रोश और आवेश में होती है, तो मानवता को कभी बाढ़ या सूखा अथवा कभी महामारी अथवा भूकंप, चक्रवात जैसी आपदाओं का सामना करना पड़ता है। इसलिये आज संसार के जो मनीषी और चिंतक हैं, उनके लिये यह चिंतन का विषय होना चाहिये कि इस प्रकार की दानवीय शक्तियों के अनाचार व अत्याचार से जो सुरक्षा कवच प्रकृति प्रदान करती है, उसमें कहां और क्यों छेद हो रहा है। मंथन इस पर भी होना चाहिये कि सामान्य मानव भी इन आसुरी शक्तियों जैसे आचरण में लीन होकर स्वयं और आने वाली पीढ़ियों के लिये आपदा को आमंत्रण क्यों दे रहा है?
          मानव ने सृष्टि के पारिस्थिकीय तंत्र से जितनी छेड़छाड़ पिछले हजार वर्षों न की होगी, उससे कहीं अधिक पिछले 30-40 वर्षों में प्रकृति का अंधाधुंध दोहन और प्राकृतिक संसाधनों का दुरुपयोग करके किया है। कोरोना तो एक छोटा सा विषाणु है और समस्त विश्व इसके प्रकोप से कराह रहा है। सोचिये ऐसे अनगिनत जीवाणु प्रकृति की कोख में पल रहे हैं। क्या पता कोरोना से भी अधिक घातक कोई अन्य विषाणु मानव जीवन में प्रवेश कर जाए, तो पूरी पृथ्वी से मानव जनसंख्या समाप्त हो सकती है। प्रकृति ने मानव को अन्य जीवों के साथ रहने के लिए पृथ्वी पर उत्पन्न किया है। किंतु मानव के रूप में हमने केवल अपने विषय, सुविधा और अस्तित्व का ही सोचा। 
          ताल-तलैया, बाग-बागीचे, नदी-सरोवर, जंगल, चट्टान हम मानवों ने ही लील लिया। पहाड़ काट डाले गये। विश्व के अनेक भागों में नाभिकीय विस्फोट कर धरती और समुद्र की छाती छलनी की जा रही है। वन्यजीवों के अस्तित्व पर हमने जानबूझकर संकट उत्पन्न कर दिया। भारत की पारंपरिक जीवनशैली में लाखों वर्ष से पशु-पक्षियों का पालन-पोषण करना और प्रकृति के एक अंग के रूप में उनका संरक्षण करना धार्मिक कर्तव्य के रूप में निभाया जाता रहा है। किंतु इधर के कुछ दशकों में उपभोक्तावाद की लहर ने हमारी परंपरा और संस्कृति से इस कर्तव्य को उपेक्षित सा बना दिया है। मानव ने प्रकृति द्वारा पशुओं के निर्धारित भोजन को अपनाते हुए दानवीय रूप धारण कर लिया है। प्रकृति व पर्यावरण का संरक्षण करने की सनातनी परंपरा का ह्रास हुआ और इस दानवीय रूप में मानव प्रकृति व पर्यावरण का विनाश करने वाला बन चुका है। मांसभक्षण की ऐसी प्रवृत्ति आयी है कि प्रतिदिन करोड़ों निरीह पशु-पक्षियों को केवल मानव के स्वाद के लिये काट दिया जाता है। हम यह भी चिंतन नहीं करते कि प्रतिदिन करोड़ों पशु-पक्षियों की हत्या और उनके मांस के संस्करण में खतरनाक स्तर पर कॉर्बन का भी उत्सर्जन होता है और अरबों लीटर जल भी नष्ट होता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि सदा से जीवाणु जंगली जानवरों चमगादड़ आदि में रहते हैं। संभवतः यही कारण है कि सनातन दर्शन में पशु-पक्षियों, जीवों को मानव का सुरक्षा कवच बताया गया है। निश्चित ही हजारों वर्षों के वैज्ञानिक प्रेक्षण के बाद ही सनातन दर्शन ने मानव के अनुकूल इस जीवन शैली और जीवन के कर्तव्यों की संहिता बनायी होगी। 
            ग्रामीण अंचलों में आज भी ऐसे वरिष्ठ जन मिल जायेंगे, जो पशु-पक्षियों, चीटियों आदि की गतिविधियों को देखकर महामारी, रोग अथवा प्राकृतिक आपदा का सटीक अनुमान लगा लेते हैं। यद्यपि ऐसे लोगों की संख्या बहुत कम रह गयी है। निश्चित ही हमारे ऋषि-मुनि, जो वास्तव में वैज्ञानिक थे, जानते रहे होंगे कि मानव के लिये खतरनाक विषाणु या जीवाणुओं को पशु-पक्षी व अन्य जीव अपने भीतर लेकर उसे न केवल नष्ट करते हैं, अपितु उनके तन से निकलने वाले पदार्थो जैसे कि गोबर व मूत्र के गंध व स्पर्श से मानव इन विषाणुओं या जीवाणुओं से कवचित भी होता है। किंतु मानव की सबकुछ लील जाने की प्रवृत्ति ने प्रकृति से पशु-पक्षियों का भी नाश कर दिया है। मानव के लिये लाभकारी खेत के कई सूक्ष्म मित्र जीवाणु खत्म हो रहे हैं। खेतों में पाये जाने वाले कई जीव जैसे गोल घोंघा, केकड़ा, विशेष प्रकार की मछली और भी बहुत से जीव लुप्तप्राय हो रहे हैं। 
          मानव ने विकास के नाम पर या लोभवश पारिस्थिकीय तंत्र को चलाने के लिये आवश्यक नदियों, पहाड़ों और जंगलों के साथ-साथ पृथ्वी के भीतर स्थित संसाधनों का अंधाधुंध दोहन कर प्रकृति को नष्ट करने में भी कमी नहीं छोड़ी है। रही सही कसर अनियंत्रित ढंग से बढ़ रहे वाहनों व कारखानों से खतरनाक स्तर पर निकलने वाली कॉर्बन डाई आक्साइड के उत्सर्जन पूरी कर दी है। इसके कारण वैश्विक उष्णता बढ़ रही है, अंतरिक्ष में ब्लैक होल बढ़ रहा है और इसके कारण खतरनाक अल्ट्रा-वायलेट किरणें सीधे धरती पर आकर कैंसर जैसे खतरनाक रोग को बढ़ा रही हैं। इससे समुद्र तल का तापमान बढ़ रहा है और यह शैवाल, मछली और अन्य समुद्री जीवन के जीवन पर संकट उत्पन्न कर रहा है। वैश्विक उष्णता के कारण ग्लेशियर पिघल रहे हैं और विश्व में कहीं बेमौसम गर्मी या सर्दी, वर्षा आंधी, तूफान और अतिवृष्टि ला रहे हैं, तो कहीं अल्पवृष्टि के कारण सूखे जैसी स्थिति बन जा रही है। 
          पृथ्वी के भीतर के प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन का परिणाम यह है कि पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र क्षीण हो रहा है। यूरोपियन स्पेस एजेंसी के अनुसार पिछले 200 वर्षों में कि पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र 9 प्रतिशत घटा है। इस स्पेस एजेंसी के अनुसार पृथ्वी के अमेरिका और साउथ अफ्रीका के बीच चुम्बकीय क्षेत्र की तीव्रता में कमी आई हैओ जिसके कारण सैटेलाइट के कक्षों और सैटेलाइट के सिग्नल भी प्रभावित हो रहे हैं। चूंकि पृथ्वी के गर्भ के अन्तः केंद्र में एक जीवित चुम्बक सक्रिय है। इस चुम्बक का वाह्य किनारा आयरन और निकिल से बना है और आंतरिक किनारा ठोस होता है, मगर यह भी आयरन और निकिल इत्यादि से बना होता है। इसके ऊपर का स्तर मैग्मा (लावा) खनिज लवण इत्यादि पदार्थों से बना होता है। पृथ्वी अपने चुम्बकीय गुणों के कारण ही सूर्य की किरणों के साथ आने वाली हानिकारक विकिरण तत्वों को चुम्बकीय क्षेत्र द्वारा बाहर फेंक देती है और सूर्य के किरण को धरती की सतह तक आने देती है। 
          हमारी भारतीय मनीषा विज्ञान के इन रहस्यों को जानती थी। इसी कारण उसने क्षेत्र व जलवायु के अनुसार खान-पान, रहन-सहन और लोक-व्यवहार आदि बनाया था। किंतु हमने अपनी संस्कृति के मूल स्वरूप और इसके वैज्ञानिक तत्वों को भुला दिया। ग्राह्य विकास अर्थात सस्टेनेबल विकास के स्थान पर विश्व ने विकास के अंधे स्वरूप को अपना लिया। प्रकृति बारंबार चेतावनी भी दे रही है, किंतु हम उसकी उपेक्षा कर रहे हैं। परिणामस्वरूप कभी प्लेग तो कभी इबोला, बर्ड फ्लू, स्वाइन फ्लू, कोरोना या हिमस्खलन, समुद्री चक्रवात, तूफान अथवा किसी न किसी अन्य नाम या रूप से प्रकृति अपना संहारक रूप दिखाती है। इससे बचना है तो हमें प्रकृति की शरण में जाना होगा और प्रकृति के अनुकूल जीवनशैली, खान-पान और व्यवहार अपनाना होगा। प्रकृति के लिए मानव भी एक जीव है। यदि मानव प्रकृति के आधारभूत तंत्र में अवरोध उत्पन्न करेगा, तो सृष्टि के पास नियंत्रण के अनेकों उपाय है। कोरोना को भी हमें इसी रूप में देखना चाहिये। संभवतः कोरोना भी उनमें से एक हो और मानव को चेताना चाहती हो कि हम प्रकृति के समक्ष कुछ भी नहीं हैं। अब मानव को जल, भूमि, जंगल और धरती के भीतर व इसके चारो ओर के पर्यावरण व जीवों को संरक्षित करते हुए सस्टेनेबल विकास के मार्ग अपनाने होंगे। विकास के प्राकृतिक मॉडल को अपनाना होगा, तभी मानव और सृष्टि दोनों का कल्याण होगा।

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