परशुराम जयंती पर किये गए हवन 

परशुराम जयंती पर किये गए हवन
 

परशुराम जन्मोत्सव पर डाला हवन

कोरोना नियमों के दृष्टिगत सूक्ष्म कार्यक्रम किया आयोजित

आज के परिपेक्ष्य में ब्राह्मण के लिए शस्त्र और शास्त्र दोनों ही हैं उपयोगी: पं. शशिपाल डोगरा

*सत्यदेव शर्मा सहोड़*

शिमला।
विशिष्ट ज्योतिष सदन द्वारा आज परशुराम जयंती के उपलक्ष में कोरोना महामारी के दृष्टिकोण नियमों को ध्यान में रखते हुए वैदिक हवन डाला गया। वशिष्ठ ज्योतिष सदन के अध्यक्ष पंडित शशिपाल डोगरा ने बताया कि भगवान परशुरामजी का जन्मोत्सव आज 14 मई को पूरे देश में धूमधाम से मनाया जा रहा है। पंचांग के अनुसार हर वर्ष वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को यानी अक्षय तृतीया के दिन इनका जन्मोत्सव मनाया जाता है। 

परशुराम जयंती

उन्होंने बताया कि भगवान परशुराम भगवान विष्णु के छठे अवतार हैं। हनुमानजी की ही तरह इन्हें भी चिरंजीव होने का आशीर्वाद प्राप्त है। भगवान शिव ने इनकी घोर तपस्या से प्रसन्न होकर इन्हें फरसा दिया था। फरसा को परशु भी कहा जाता है, इसी वजह से इन्हें परशुराम के नाम से जाना जाता है। अक्षय तृतीया के दिन जन्म लेने के कारण ही भगवान परशुराम की शक्ति भी अक्षय थी। भगवान परशुराम भगवान शिव और भगवान विष्णु के संयुक्त अवतार माने जाते हैं। शास्त्रों में उन्हें अमर माना गया है। 

पं डोगरा ने बताया कि भगवान परशुराम ऋषि जमदग्नि और माता रेणुका के पुत्र थे। उनका जन्म ब्राह्मण कुल में हुआ था। उनके जन्म के समय आकाश मंडल में छह ग्रहों का उच्च योग बना हुआ था। तब उनके पिता और सप्त ऋषि में सम्मिलित ऋषि जमदग्नि को पता चल गया था कि उनका बालक बेहद पराक्रमी होगा। हैहय वंश के राजा सहस्त्रार्जुन ने अपने बल और घमंड के कारण लगातार ब्राह्राणों और ऋषियों पर अत्याचार कर रहा था। सहस्त्रार्जुन अपनी सेना सहित भगवान परशुराम के पिता जमदग्रि मुनि के आश्रम में पहुंचा। 

जमदग्रि मुनि ने सेना का स्वागत और खान पान की व्यवस्था अपने आश्रम में की। मुनि ने आश्रम की चमत्कारी कामधेनु गाय के दूध से समस्त सैनिकों की भूख शांत की। कामधेनु गाय के चमत्कार से प्रभावित होकर उसके मन में लालच पैदा हो गया। इसके बाद जमदग्रि मुनि से कामधेनु गाय को उसने बलपूर्वक छीन लिया। जब यह बात परशुराम को पता चली तो उन्होंने सहस्त्रार्जुन का वध कर दिया। सहस्त्रार्जुन के पुत्रों ने बदला लेने के लिए परशुराम के पिता का वध कर दिया और पिता के वियोग में भगवान परशुराम की माता चिता पर सती हो गयीं। पिता के शरीर पर 21 घाव को देखकर परशुराम ने प्रतिज्ञा ली कि वह इस धरती से समस्त क्षत्रिय वंशों का संहार कर देंगे। इसके बाद पूरे 21 बार उन्होंने पृथ्वी से क्षत्रियों का संहार कर अपनी प्रतिज्ञा पूरी की।

 पंडित डोगरा ने बताया कि कोरोना महामारी के दृष्टिगत परशुराम जन्मोत्सव के उपलक्ष में शिमला में आयोजित एक कार्यक्रम में पूर्ण विधि-विधान के साथ हवन यज्ञ किया गया। इस मौके पर पंडित मुकेश डोगरा, अतुल डोगरा, अक्षय पाल डोगरा और पूर्ण भारद्वाज समेत कई गणमान्य लोग उपस्थित हुए।

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