कहानी सिमडेगा की, जहां बांस की जड़ों और बेल की गेंदों से हॉकी खेलने वाले ओलंपिक तक का करते हैं सफर

कहानी सिमडेगा की, जहां बांस की जड़ों और बेल की गेंदों से हॉकी खेलने वाले ओलंपिक तक का करते हैं सफर
कहानी सिमडेगा की, जहां बांस की जड़ों और बेल की गेंदों से हॉकी खेलने वाले ओलंपिक तक का करते हैं सफर रांची, 21 नवंबर (आईएएनएस)। ये कहानी उन लोगों की है जहां एक लड़की दूसरे के घरों में बर्तन मांजती है ताकि अपनी छोटी बहन को हॉकी स्टीक खरीद कर दे सके। फिर एक दिन ऐसा भी आता है कि जब उसकी बहन ओलंपिक में पहुंचकर जीत का परचम लहरा देती है। एक दूसरी कहानी उस लड़की की है जो हॉकी में अपने शानदार प्रदर्शन की बदौलत रेलवे में नौकरी हासिल करती है। जब उसे पहली पगार मिलती है तो सबसे पहला काम यह करती है कि गांव में बेल या अमरूद से हॉकी की प्रैक्टिस करनेवाले बच्चों के लिए डेढ़ दर्जन गेंदें खरीद लाती है। तीसरी कहानी उस लड़की की है जो ओलंपिक में भारत की ओर से खेल रही थी लेकिन उसके गांव के कच्चे मकान में एक अदद टीवी तक नहीं थी कि उसके मां-पिता, भाई-बहन उसे खेलता हुए देख सकें। ये कहानियां झारखंड के एक छोटे से जिले सिमडेगा की हैं, जिसे हॉकी की नर्सरी के रूप में जाना जाता है।

आगामी दिसंबर में दक्षिण अफ्रीका में होनेवाले हॉकी महिला जूनियर विश्व कप में जो 18 सदस्यीय भारतीय टीम हिस्सा लेगी, उसमें सिमडेगा की तीन बेटियां सलीमा टेटे, संगीता कुमारी और ब्यूटी डुंगडुंग शामिल हैं। सलीमा टेटे सिमडेगा के बड़की छापर गांव की रहने वाली है, वहीं संगीता कुमारी और ब्यूटी डुंगडुंग केरसई प्रखंड के करगा गुड़ी गांव की हैं। अभी दो दिन पहले डोंगाई महिला एशियाई चैंपियंस ट्रॉफी के लिए जिस भारतीय टीम का एलान हुआ है, उसमें सिमडेगा से सटे खूंटी की रहनेवाली निक्की प्रधान भी हैं। हॉकी झारखंड के अध्यक्ष भोलानाथ सिंह कहते हैं कि आज की तारीख में महिला हॉकी में किसी भी स्तर पर भारत की कोई भी टीम, झारखंड की खिलाड़ियों के बिना शायद ही बनती है।

गरीबी-मुफलिसी के बीच यहां के खेतों में बांस के डंडे से हॉकी की प्रैक्टिस करते हुए पांच दर्जन से ज्यादा खिलाड़ी नेशनल-इंटरनेशनल टूनार्मेंट्स से लेकर ओलंपिक में खेलते हुए देश के लिए गोल्ड तक जीत चुके हैं। आपको हैरत हो सकती है, लेकिन यह सच है कि सिमडेगा में हर गांव-गली में आपको दर्जनों ऐसे लड़के-लड़कियां मिल जायेंगे जो सोते-जागते हुए हॉकी में अपना और अपने गांव, जिले, शहर, राज्य, देश का नाम बुलंद करने के सपने देखते हैं। यहां रग-रग में हॉकी का जोश दौड़ता है। झारखंड में खेल पत्रकारिता के पितामह माने जाने वाले और यहां की खेल प्रतिभाओं पर अब तक तीन किताबें लिख चुके 75 वर्षीय सुभाष डे कहते हैं, भारत में हॉकी के इतिहास में आजादी के पहले से लेकर आज तक झारखंड के खिलाड़ियों की अहम हिस्सेदारी रही है। खास तौर पर सिमडेगा और खूंटी जिले के हॉकी प्लेयर्स का जिक्र किये बगैर देश के हॉकी की गौरव गाथा कभी पूरी नहीं हो सकती। ओलंपिक में भारत को गोल्ड दिलानेवाली टीम के कैप्टन जयपाल सिंह मुंडा से लेकर 2021 के टोक्यो ओलंपिक में बेहतर प्रदर्शन करनेवाली भारतीय महिला टीम में शामिल रहीं झारखंड की बेटियों सलीमा टेटे और निक्की प्रधान तक ने देश का नाम ऊंचा किया है।

गरीबी और अभाव के बीच पली-बढ़ी सिमडेगा की संगीता ने बांस के डंडे और शरीफे के गेंद से हॉकी की शुरूआत करते हुए जूनियर भारतीय महिला हॉकी टीम में जगह बनायी है। टीम की ओर से खेलते हुए उन्हें दो माह पहले ही रेलवे में सरकारी नौकरी मिली है। नौकरी मिलने के बाद पहली पगार पाकर इसी महीने जब वह अपने गांव पंहुची संगीता अपने गांव के बच्चों के लिए डेढ़ दर्जन हॉकी गेंदें लेकर आयी थीं। संगीता कहती हैं कि वह नहीं चाहतीं कि खेल के मैदान में जिन अभावों से उन्हें गुजरना पड़ा, वही कमी आगे आने वाले खिलाड़ियों को झेलनी पड़े।

यह बीते अगस्त की बात है, जब भारतीय महिला ह़ॉकी टीम टोक्यो ओलंपिक में क्वार्टर फाइनल मुकाबला खेल रही थी और इस टीम में सिमडेगा की सलीमा टेटे भी शामिल थीं। सलीमा के घर में एक अदद टीवी तक नहीं था कि उनके घरवाले उन्हें खेलते हुए देख सकें। इसकी जानकारी जब झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को हुई तो तत्काल उनके घर में 43 इंच का स्मार्ट टीवी और इन्वर्टर लगवाया गया। यह सलीमा ही थीं, जिनके हॉकी के सपनों को पूरा करने के लिए उनकी बड़ी बहन अनिमा ने बेंगलुरू से लेकर सिमडेगा तक दूसरों के घरों में बर्तन मांजने का काम किया। वह भी तब, जब अनिमा खुद एक बेहतरीन हॉकी प्लेयर थीं। उन्होंने अपनी बहनों के लिए पैसे जुटाने में अपना करियर कुर्बान कर दिया। अनिमा और सलीमा की बहन महीमा टेटे भी झारखंड की जूनियर महिला हॉकी टीम में खेलती हैं। हाल में आयोजित ऑल इंडिया जूनियर महिला हॉकी चैंपियनशिप में महिमा ने शानदार प्रदर्शन किया था।

सिमडेगा के खेतों-गांव में खेलकर देश-विदेश में सैकड़ों टूनार्मेंट्स में जौहर दिखानेवाले खिलाड़ियों की एक बड़ी फेहरिस्त है। सिमडेगा के जिस हॉकी खिलाड़ी को इंडियन नेशनल टीम में सबसे पहले जगह मिली थी, वो थे सेवईं खूंटी टोली निवासी नॉवेल टोप्पो। वह 1966-67 में देश के लिए खेले। इसके बाद 1972 में ओलंपिक खेलनेवाली भारतीय पुरुष टीम में यहां के माइकल किंडो शामिल रहे। इस ओलंपिक में भारतीय टीम ने ब्रांज मेडल जीता था। फिर 1980 के ओलंपिक में भारतीय टीम ने जब गोल्ड जीता तो उसमें सिमडेगा के सिल्वानुस डुंगडुंग का अहम रोल रहा। 2000 में कॉमनवेल्थ में सिमडेगा की बेटी सुमराई टेटे, मसीरा सुरीन और कांति बा भारतीय महिला टीम में शामिल रहीं। सुमराई टेटे 2006 में भारतीय महिला टीम की कप्तान भी रही थीं। सिमडेगा की असुंता लकड़ा भी 2011-12 में भारतीय महिला टीम की कप्तानी कर चुकी हैं। उनकी अगुवाई में देश ने कई टूनार्मेंट्स जीते। 2018 यूथ ओलम्पिक में भारतीय महिला टीम की कप्तानी सिमडेगा की बेटी सलीमा टेटे के हाथ में रहीं। वह टोक्यो ओलंपिक में खेलनेवाली भारतीय टीम की भी अहम कड़ी रहीं। इसी तरह जूनियर इंडियन महिला टीम में सिमडेगा की सुषमा, संगीता और ब्यूटी शामिल रही हैं। बिमल लकड़ा, वीरेंद्र लकड़ा, मसीह दास बा, जस्टिन केरकेट्टा, एडलिन केरकेट्टा, अल्मा गुड़िया, आश्रिता लकड़ा, जेम्स केरकेट्टा, पुष्पा टोपनो जैसे अनेक खिलाड़ी यहां से निकले, जिन्होंने नेशनल-इंटरनेशनल टूनार्मेंट्स में अपनी स्टीक का मैजिक दिखाया है।

सिमडेगा में हॉकी की दीवानगी देखनी है तो इसके सुदूर गांवों तक चलना पड़ेगा। इस जिले में एक छोटा सा गांव है लट्ठाखम्हान। यहां इस राज्य की सबसे पुरानी हॉकी चैंपियनशिप पिछले 31 वर्षों से निरंतर आयोजित हो रही है। इस प्रतियोगिता में झारखंड सहित उड़ीसा, छत्तीसगढ़ और बंगाल से 60 टीमें हिस्सा लेती हैं। इसी तरह बोलबा प्रखंड के अवगा गांव में हर साल होने वाले टूनार्मेंट में तकरीबन 50 टीमें भाग लेती हैं। सिमडेगा के अलग-अलग गांवों में मेजर ध्यानचंद टूनार्मेंट, राधा कृष्ण मेमोरियल टूनार्मेंट, गांधी शास्त्री टूनार्मेंट, गोंडवाना विकास मंच चैंपियनशिप, जयपाल सिंह मुंडा टूनार्मेंट, बिरसा मुंडा स्कूल लेवल चैंपियनशिप और अम्बेडकर टूनार्मेंट जैसे एक दर्जन से ज्यादा टूनार्मेंट होते हैं।

सिमडेगा जिला मुख्यालय से लगभग 30 किलोमीटर दूर एक गांव है करंगागुड़ी। यहां के प्राइमरी स्कूल में प्रधानाध्पायक होते थे फादर वेनेदिक कुजूर। उन्होंने लगभग 40 साल पहले एक नियम बनाया था। इसमें सभी छात्रों को हॉकी स्टिक लेकर ही स्कूल आना पड़ता था। इस स्कूल से निकले दो दर्जन से ज्यादा खिलाड़ी नेशनल-इंटरनेशनल टूनार्मेंट में जौहर दिखा चुके हैं।

सिमडेगा में हॉकी के दो डे-बोडिर्ंग हॉकी ट्रेनिंग सेंटर है, जिनमें से एक का संचालन साई के जरिए होता है। साल 2015 में सिमडेगा में हॉकी का पहला टर्फ स्टेडियम बनने के बाद यहां के खिलाड़ियों के सपनों को पंख लगे हैं। उनके प्रैक्टिस का तरीका सुधरा है। इस स्टेडियम में जूनियर और सब जूनियर लेवल पर इसी साल दो नेशनल टूनार्मेंट्स का सफल आयोजन हुआ है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने बीते महीने यहां जूनियर नेशनल महिला हॉकी चैंपियनशिप का उद्घाटन करते हुए एक और एस्ट्रो टर्फ स्टेडियम की आधारशिला रखी है। यह उम्मीद की जानी चाहिए कि सिमडेगा की हॉकी नर्सरी से आनेवाले सालों में कई और हीरे निकलकर सामने आएंगे।

--आईएएनएस

एसएनसी/आरजेएस

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