सुप्रीम कोर्ट ने उपासना स्थल अधिनियम के प्रावधानों को चुनौती देने वाले याचिकाकर्ताओं से कहा- हस्तक्षेप याचिका दायर करें

सुप्रीम कोर्ट ने उपासना स्थल अधिनियम के प्रावधानों को चुनौती देने वाले याचिकाकर्ताओं से कहा- हस्तक्षेप याचिका दायर करें
सुप्रीम कोर्ट ने उपासना स्थल अधिनियम के प्रावधानों को चुनौती देने वाले याचिकाकर्ताओं से कहा- हस्तक्षेप याचिका दायर करें नई दिल्ली, 29 जुलाई (आईएएनएस)। सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को उपासना स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 के कुछ प्रावधानों को चुनौती देने वाले याचिकाकर्ताओं से उन याचिकाओं में हस्तक्षेप करने को कहा, जो पहले से ही इस मामले में अदालत में लंबित हैं।

जस्टिस डी. वाई. चंद्रचूड़ और जस्टिस जे. बी. पारदीवाला की पीठ ने कहा, हम दो लंबित याचिकाओं में हस्तक्षेप करने की स्वतंत्रता देते हैं।

अधिनियम के कुछ प्रावधानों को चुनौती देते हुए कुल छह याचिकाकर्ताओं ने शीर्ष अदालत का रुख किया है। सुनवाई के दौरान, पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता लंबित याचिकाओं में चुनौती के आधार को पूरक कर सकते हैं या जोड़ सकते हैं।

याचिकाएं अधिवक्ता चंद्रशेखर और रुद्र विक्रम सिंह, सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी अनिल काबोत्रा, देवकीनंदन ठाकुर जी, स्वामी जीतेंद्रानंद सरस्वती और भारतीय जनता पार्टी के पूर्व सांसद चिंतामणि मालवीय द्वारा दायर की गई हैं।

अधिनियम की धारा 2, 3 और 4 की वैधता के खिलाफ काबोत्रा ने शीर्ष अदालत का रुख किया। उन्होंने तर्क दिया कि ये धाराएं धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों का उल्लंघन करती हैं। काबोत्रा ने कहा कि एक पूर्वव्यापी कट-ऑफ तारीख - 15 अगस्त, 1947 - बर्बर आक्रमणकारियों के अवैध कृत्यों को वैध बनाने के लिए तय की गई थी और बताया कि यह अधिनियम धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों का उल्लंघन करता है। अधिवक्ता अश्विनी कुमार दुबे के माध्यम से दायर याचिका में उपासना स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम 1991 की धारा 2, 3 और 4 की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है, जिसमें कहा गया है कि यह अनुच्छेद 14, 15, 21, 25, 26, 29 का उल्लंघन करता है।

काबोत्रा की याचिका में कहा गया है, हिंदुओं, जैनियों, बौद्धों, सिखों को धर्म को मानने, आचरण करने और प्रचार करने का अधिकार है जैसा कि उनके धार्मिक ग्रंथों में दिया गया है और अनुच्छेद 13 कानून बनाने से रोकता है जो उनके अधिकारों को छीन लेता है। इसमें आगे कहा गया है, धार्मिक संपत्ति को वापस बहाल करने का अधिकार निरंकुश है और लगातार गलत है और चोट (समस्या) को न्यायिक उपचार से ठीक किया जा सकता है।

अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय द्वारा भी एक याचिका दायर की गई है, जिसमें 1991 के अधिनियम के कुछ प्रावधानों की वैधता को चुनौती दी गई है।

उपाध्याय की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल 12 मार्च को नोटिस जारी किया था। भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने जून 2020 में 1991 के कानून को चुनौती देते हुए एक और याचिका दायर की थी। शीर्ष अदालत ने 26 मार्च, 2021 को स्वामी की याचिका को सुनवाई के लिए स्वीकार कर लिया और केंद्र से जवाब मांगा।

--आईएएनएस

एकेके/एएनएम

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