तुलसी सभागार में पुस्तक लोकार्पण, साहित्यकार सम्मान व डिजिटल युग में साहित्य के साथ कवि सम्मेलन का हुआ आयोजन 

तुलसी सभागार में पुस्तक लोकार्पण, साहित्यकार सम्मान व डिजिटल युग में साहित्य के साथ कवि सम्मेलन का हुआ आयोजन 
गोण्डा। साहित्यिक संस्था पूर्वापर, स्पंदन, लायसियम और हिंदी विभाग श्री लाल बहादुर शास्त्री महाविद्यालय  के संयुक्त उपक्रम में रविवार को एक दिवसीय देवीपाटन मंडल : साहित्यकार अधिवेशन के अंतर्गत महाविद्यालय के तुलसी सभागार में पुस्तक-लोकार्पण, साहित्यकार-सम्मान, 'डिजिटल युग में साहित्य' विषयक संगोष्ठी और कवि सम्मेलन का आयोजन  किया गया। 

पुरानी पीढी के बुजुर्ग संस्कारों से बंधे होने के कारण मुद्रित साहित्य को अधिक पसन्द कर रहे हैं

पूर्वापर पत्रिका के 16वें वर्ष के उपलक्ष्य में साहित्य भूषण साहित्यकार संपादक डा सूर्य पाल सिंह एवं शोध निदेशक डा शैलेन्द्र नाथ मिश्र के संयोजन में आयोजित इस सारस्वत कार्यक्रम में वरिष्ठ साहित्यकार अतुल कुमार सिंह 'अतुल ' की पुस्तक 'सुधियों के साये में', राजेश मोकलपुरी का कथा - संग्रह 'कनेर के फूल', सुरेश मोकलपुरी का काव्य संग्रह 'लाल किले की प्राचीर से'  डा. सूर्यपाल सिंह  ग्रंथावली का आठवां भाग का विमोचन हुआ।

अधिवेशन में साहित्य की विशिष्ट सेवा के लिए अतुल कुमार सिंह 'अतुल', राधाकृष्ण 'पथिक', अवध नरेश सिंह,  गणेश गंभीर, भोलानाथ कुशवाहा, राम पाल श्रीवास्तव, राम बहादुर मिश्र, विनय दास, केदार नाथ सविता, हुस्न तबस्सुम निहा, अरविन्द अवस्थी, एवं राजेन्द्र तिवारी को 'साहित्यकार - श्री 'की उपाधि एवं अंगवस्त्र प्रदान कर सम्मानित किया गया। 

तुलसी सभागार में पुस्तक लोकार्पण, साहित्यकार सम्मान व डिजिटल युग में साहित्य के साथ कवि सम्मेलन का हुआ आयोजन 
अधिवेशन के द्वितीय सत्र में हिन्दी प्राध्यापक डा. जयशंकर तिवारी के संचालन में डिजिटल युग में साहित्य विषय पर आयोजित संगोष्ठी में शोध निदेशक डा. शैलेन्द्र नाथ मिश्र ने विषय प्रवर्तन करते हुए कहा कि डिजिटल युग में साहित्य भले ही अलपजीवी है लेकिन डिजिटल माध्यम ने साहित्य को सर्वसुलभ कर दिया। इसके बावजूद मुद्रित साहित्य समाज को सांस्कृतिक  दिशा बोध कराने की क्षमता से दीर्घजीवी  है। हमारे लिए दोनों माध्यमों में सामंजस्य आवश्यक है। \वरिष्ठ चिंतक विचारक अतुल कुमार सिंह 'अतुल' ने कहा कि परिवर्तन प्रकृति का शाश्वत नियम है। युवा पीढी डिजिटल समर्थक है तो पुरानी पीढी के बुजुर्ग संस्कारों से बंधे होने के कारण मुद्रित साहित्य को अधिक पसन्द कर रहे हैं। गणेश गंभीर ने कहा कि डिजिटल बहु आयामी माध्यम है |

यह सकारात्मक व नकारात्मक दोनों रूपों में हमे प्रभावित कर रहा है। साहित्यकार को शब्द की मर्यादा व अस्मिता  के अनुरूप साहित्य की रचना करनी चाहिए। डा. सूर्यपाल सिंह ने कहा कि डिजिटल माध्यम ने युग में परिवर्तन की गति तेज कर दिया है। डिजिटल ने साहित्य को सर्व सुलभ बनाया यह इसका सकारात्मक पक्ष हैं वहीं साहित्य के नाम पर वैचारिक कचरा समाज में वैमनस्य व सांस्कृतिक मूल्यों का क्षरण चिंता का विषय है। 
कार्यक्रम में महाविद्यालय उपाध्यक्ष वर्षा सिंह, प्राध्यापक अच्युत शुक्ल, डा मुक्ता,  साहित्य भूषण शिवाकान्त मिश्र विद्रोही, उमा शंकर शुक्ल, सतीश आर्य, डा रघुनाथ पाण्डेय, कृष्ण नन्दन तिवारी नन्दन, एस बी सिंह झंझट, परीक्षित तिवारी, प्रदीप बहराइची, अवधेश सिह, हरीराम शुक्ल प्रजागर घनश्याम अवस्थी, विनय शुक्ल, ज्योतिमा शुक्ला किरन सिंह, याकूब सिद्दीकी आदि मौजूद रहे।

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