एशिया में भ्रष्टाचार के मामले में शीर्ष पर क्यों है भारत

 राजनीतिक लाभ का वाजिब पालन करना होगा 
 

जैसा कि शब्द से ही जाहिर है भ्रष्टाचार अथार्त भ्रष्ट आचार दूसरे अल्फाजों में भ्रष्टाचार को रिश्वतखोरी भी कहा जा सकता है। भ्रष्टाचार या रिश्वतखोरी का सीधा सरोकार प्रलोभन से है जैसे ही मष्तिष्क में प्रलोभन प्रजनित हुआ भ्रष्टाचार का आगाज हो जाता है। 

हमारे इस मुल्क में सरकारी तंत्र और सरकारी योजनाओं से लेकर जमीनी स्तर तक भ्रष्टाचार की जड़ें काफी बढ़ चुकी है आलम यह है कि प्रधानमंत्री आवास योजना में भी मुफलिस आवाम द्वारा सरपंचों को बिना रिश्वत दिए आवास योजना का लाभ मिलना सुबोध नहीं है। 

आज के कल्प में जो भ्रष्टाचार की लकीर हमारे मुल्क में मुसलसल बढ़ रही है वह अपरिमित चिंतनीय है क्योंकि इसका अतीव शिकार हमारी अशिक्षित और मुफलिस आवाम हो रही जो अपने शासकीय कार्यों से लेकर मुख़्तलिफ़ छोटे-बड़े कार्यों में
भ्रष्टाचार या रिश्वतखोरी का शिकार होती है। हम देखते हैं कि हमारे  आम नागरिक अपने कार्यों को लेकर दफ्तरों-दफ्तरों ठोकरें खाते फिरते हैं
और उनके अधिकांश कार्य नहीं होते उसका एक अस्बाब यही होता है कि वह पैसों का वजन किसी कर्मचारी या संस्था के ऊपर नहीं रख पाते हैं 
जिससे उनके कार्यों में अटकाव बना रहता है। दूसरी तरफ आधुनिकीकरण के दौर में कमीशन शब्द का प्रयोग भी प्रचलन में है आज हमें किसी वस्तु या अन्य किसी चीज को क्रय-विक्रय करने के लिए एक बसीठ की दरकार होती है जिसका आय के अलावा एक कमीशन भी मुकर्रर करना पड़ता है और आपसे भी कमीशन के नाम पर कोई भी कार्य करवाया जाता है और उसके बदले आप को सैलरी के नाम पर कमीशन थमाया जाता है। 

यदि हम हमारे मुल्क में भ्रष्टाचार करने वालों की बात करें तो अधिकांश शिक्षित लोग ही भ्रष्टाचार कर रहे है और इस वक्त तो ऐसा भी होने लगा है कि नौकरी दिलाने के नाम पर लोग आवाम को बेवकूफ बना कर मोटी रकम उससे वसूल रहे हैं। वहीं कुछ लोग भ्रष्टाचार या रिश्वतखोरी का एक वाजिब अस्बाब बढ़ती बेरोजगारी भी मानते हैं लेकिन मुझे नहीं पता यह किस हद तक सही है।

हमारे देश में छोटे चुनाव से लेकर बड़े-बड़े चुनाव में आपने देखा होगा किस तरह से वोट बैंक की राजनीति की आड़ में भ्रष्टाचार या रिश्वतखोरी होती जिसमें प्रथक-प्रथक पार्टियां एक-एक वोट के लिए शराब और बहुत से रुपए बांट देती हैं और भ्रष्टाचार के बलबूते पर सत्ता में भी आ जाती है इससे आप तसव्वुर कर लीजिए कि भ्रष्टाचार के दम पर बनी सरकार हमारे मुल्क से भ्रष्टाचार कम कैसे कर सकती है या फिर भ्रष्टाचार खत्म करने की दिशा में किस हद तक फलीभूत प्रयास कर कर सकती है। 

आपको आगाह कर दें कि ट्रांसपैरेंसी इंटरनेशनल नामक एक संस्था की रिपोर्ट 2020 के मुताबिक भारत में भ्रष्टाचार की दर 39 फीसदी है जो एशिया में सबसे ज्यादा है इसके अलावा एशिया में सबसे अधिक 46 फीसदी भारतीयों ने अपने व्यक्तिगत संबंधों का उपयोग कर सरकारी काम करवाए है वहीं संपूर्ण एशिया की बात करें तो इस महाद्वीप में 50 फीसदी व्यक्तियों ने स्वीकार किया उन्होंने घूस दिया है और 32 फीसदी लोगों का यह कहना है कि उन्होंने व्यक्तिगत संबंधों के जरिए सरकारी काम करवाए है। यह सर्वे 17 जून 2020 से 17 जुलाई 2020 के बीच 2 हजार भारतीयों के मध्य कराया गया था। रिपोर्ट में आगे बताया गया कि भारत में 89 फीसदी लोगों का मानना है कि सरकारी भ्रष्टाचार बेहद विस्तृत समस्या है और 18 फीसदी लोगों ने वोट के बदले रिश्वत ली। सर्वे में 63 फीसदी भारतीयों का स्वीकारना है कि यदि वे भ्रष्टाचार की शिकायत करते हैं तो उन्हें कई समस्याएं झेलनी पड़ सकती हैं। 

ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की 2020 की इस रिपोर्ट के मुताबिक भ्रष्टाचार धारणा सूचकांक (सीपीआई) में 180 देशों में से भारत का स्थान छह पायदान फिसलकर 86वें नंबर पर आ गया। रिपोर्ट के मुताबिक 46 प्रतिशत भारतीय मानते हैं कि पुलिस सबसे ज्यादा भ्रष्ट है 42 प्रतिशत का मानना है कि सांसद भ्रष्ट हैं। 41 प्रतिशत लोगों को लगता है कि सरकारी विभाग में भ्रष्टाचार है तथा 20 प्रतिशत लोगों ने कहा कि जज और मजिस्ट्रेट भी भ्रष्ट हैं।

सिर्फ ऐसा नहीं है कि हमारे मुल्क की सरकार ही भ्रष्टाचार में लिप्त है वरन् हमारी आवाम भी भ्रष्टाचार को बढ़ावा दे रही है और अपने कर्तव्यों का मुनासिब पालन नहीं कर रही है 
अब हमारे मस्तिष्क में यह प्रश्न आविर्भूत होना लाजमी है कि भ्रष्टाचार को कैसे रोका जाए तो सबसे पहले हमारे लिए अपने राजनीतिक अधिकार का वाजिब पालन करना अपरिहार्य है यानी हमें अपने मत या वोट को बेचना नहीं है और हम जिस पद पर काबिज़ है या जिस भी स्थान पर है वहाँ ना तो हमें स्वयं भ्रष्टाचार करना है तथा ना ही हमें भ्रष्टाचार का शिकार होना है सीधे शब्दों में कहें तो अपने संविधान में वर्णित कर्तव्यों का यथोचित पालन करना है इसके साथ हमारे लिए सबसे ज्यादा दरकार हमारे जहन में नैतिक मूल्यों को जिंदा रखने की है क्योंकि वह नैतिकता ही है जो आपको अच्छे कार्य करने हेतु प्रेरित करती है तथा बुरे कार्य हेतु आपको रोकती है एवं हर वक्त सचेत करती है जिससे आपकी सकारात्मक कार्य करने की मनोवृत्ति प्रादुर्भूत होती है और कहीं ना कहीं हम सकारात्मक मनोवृत्ति से अपने कर्तव्यों का उपयुक्त पालन कर रफ्ता-रफ्ता हमारे मुल्क़ से भ्रष्टाचार को अस्तंगत कर सकते हैं। 

लेखक: सतीष भारतीय

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