सुपर अल नीनो (Super El Niño) की आहट: 150 साल पुराने उस महा-विनाश की वापसी का डर, जिसने ली थी 5 करोड़ जानें

The Looming Threat of a Super El Niño: Fears of the Return of a 150-Year-Old Cataclysm That Claimed 50 Million Lives
 
सुपर अल नीनो (Super El Niño) की आहट: 150 साल पुराने उस महा-विनाश की वापसी का डर, जिसने ली थी 5 करोड़ जानें
Global Warming & Super El Niño Threat: दुनिया भर में रिकॉर्ड तोड़ती गर्मी और लगातार चढ़ता पारा केवल सामान्य मौसमी बदलाव नहीं हैं, बल्कि यह एक बहुत बड़े वैश्विक संकट का संकेत हैं। पर्यावरण वैज्ञानिकों को डर है कि वर्तमान में बन रहे मौसमी हालात ठीक वैसे ही हैं, जैसे आज से करीब 150 साल पहले यानी साल 1877 में देखे गए थे। उस दौर में आए विनाशकारी 'सुपर अल नीनो' के कारण वैश्विक स्तर पर लगभग 5 करोड़ लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी थी और पृथ्वी का एक बहुत बड़ा हिस्सा लंबे समय के लिए बंजर हो गया था।

1877 का वो खौफनाक इतिहास: जब तड़पकर मरे थे करोड़ों लोग

आज भी इतिहासकार और वैज्ञानिक करीब डेढ़ सदी पहले आए उस दुर्लभ सुपर अल नीनो इफेक्ट को याद कर सिहर उठते हैं।

  • बढ़ा तापमान: उस दौरान धरती का औसत तापमान लगभग 3 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ गया था।

  • अकाल और बीमारियां: इसके प्रभाव से चारों तरफ अभूतपूर्व सूखा, अकाल और भुखमरी फैल गई थी। इस प्राकृतिक आपदा के कारण जब वैश्विक आबादी शारीरिक रूप से कमजोर हुई, तो चेचक, हैजा, मलेरिया, प्लेग और पेचिश जैसी महामारियों ने उन्हें अपना ग्रास बना लिया।

  • भारत पर असर: इस महा-अकाल का सबसे भीषण प्रहार भारत पर हुआ था, जहाँ मानसून पूरी तरह फेल होने के कारण फैली भुखमरी से 1 करोड़ से अधिक लोगों की मौत हो गई थी। इसके अलावा उत्तरी चीन में फसलें पूरी तरह तबाह हो गईं, ब्राजील की नदियां सूख गईं और अफ्रीका से लेकर ऑस्ट्रेलिया तक के जंगलों में भयंकर आग का तांडव देखने को मिला था।

क्या इस बार का संकट 150 साल पुराना रिकॉर्ड तोड़ देगा?

ताजा मौसम पूर्वानुमानों और क्लाइमेट मॉडल्स ने पर्यावरणविदों की चिंता को दोगुना कर दिया है। रिपोर्ट के अनुसार, इस साल के अंत तक प्रशांत महासागर के पानी का तापमान औसत से 3 डिग्री सेल्सियस (5.4 डिग्री फारेनहाइट) से भी अधिक ऊपर जा सकता है। अगर ऐसा हुआ, तो आने वाला यह सुपर अल नीनो 1870 के दशक वाले अल नीनो से भी कहीं अधिक आक्रामक और शक्तिशाली साबित होगा।

वैश्विक विशेषज्ञों की चेतावनी:

  • प्रो. दीप्ति सिंह (वाशिंगटन स्टेट यूनिवर्सिटी): 'वाशिंगटन पोस्ट' में छपी रिपोर्ट के मुताबिक, अगर हालात नहीं सुधरे तो 1870 के दशक की तरह कई वर्षों तक चलने वाले महा-सूखे (Multi-year Drought) की स्थिति दोबारा पैदा हो सकती है, जिससे भारत और उसके पड़ोसी देश सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे।

  • पॉल राउंडी (स्टेट यूनिवर्सिटी ऑफ न्यूयॉर्क): मौजूदा संकेत बताते हैं कि संभावित रूप से यह 1877 के बाद की सबसे बड़ी और सबसे खतरनाक अल नीनो घटना हो सकती है।

  • कैथरीन हेहो (जलवायु वैज्ञानिक): इसका सीधा और बेहद दर्दनाक असर सीधे तौर पर मानव समाज, कृषि व्यवस्था और वैश्विक कल्याण पर पड़ेगा।

आखिर क्या है यह 'अल नीनो' और 'सुपर अल नीनो'?

अल नीनो एक प्राकृतिक और आवर्ती (Recurring) जलवायु पैटर्न है, जो हर दो से सात साल के अंतराल पर प्रशांत महासागर में सक्रिय होता है। इसके चक्र में दो मुख्य अवस्थाएं होती हैं:

  1. ला नीना (La Niña): समुद्र के पानी का ठंडा होना।

  2. अल नीनो (El Niño): समुद्र की सतह के पानी का अत्यधिक गर्म होना।

अल नीनो के दौरान प्रशांत महासागर में जमा गर्म पानी का क्षेत्र फैल जाता है, जिससे पूरी पृथ्वी का औसत सतही तापमान बढ़ जाता है। यह गर्मी वायुमंडल में फैलकर महीनों तक मौसम को असंतुलित रखती है। ज्योतिषीय और वैज्ञानिक भाषा में, जब समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से 2°C (3.6°F) से अधिक ऊपर चला जाता है, तो उसे 'सुपर अल नीनो' का नाम दिया जाता है।

इस सदी का सबसे मजबूत संकेत

जलवायु पूर्वानुमान के प्रमुख विल्फ्रान मौफौमा ओकिया के अनुसार, वैश्विक स्तर पर जितने भी क्लाइमेट मॉडल हैं, वे अब इस बात पर एकमत हैं कि अल नीनो की शुरुआत हो चुकी है। आने वाले महीनों में इसके और अधिक तीव्र (Intense) होने की पूरी आशंका है।

वर्तमान मॉडलिंग दर्शाती है कि ट्रॉपिकल पैसिफिक (उष्णकटिबंधीय प्रशांत) क्षेत्र में समुद्र की सतह का तापमान इस सदी में किसी भी अन्य समय की तुलना में सबसे तेज गति से बढ़ रहा है। पानी का तापमान औसत से 1.5 डिग्री सेल्सियस से लेकर 3 डिग्री सेल्सियस तक अधिक रह सकता है, जो इस सदी की सबसे भयंकर अल नीनो आपदा बन सकती है।

विज्ञान बनाम प्रकृति की चुनौती

जानकारों का मानना है कि भले ही संकट का पैमाना बहुत बड़ा है, लेकिन बीते 150 वर्षों में मानव विज्ञान और तकनीक ने इतनी प्रगति अवश्य कर ली है कि हम इस भावी विभीषिका की सटीक भविष्यवाणी और इससे निपटने की पूर्व तैयारी कर सकें। राहत और बचाव के आधुनिक साधन हमारे पास हैं, लेकिन इस अप्रत्याशित पर्यावरणीय बदलाव के बदले वैश्विक अर्थव्यवस्था और मानव जीवन को कितनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी, इसका सटीक अंदाजा फिलहाल किसी के पास नहीं है।

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