राम मंदिर का इतिहास क्या है? | Ram Mandir Ki Puri History In Hindi 

Ram mandir ayodhya

Ayodhya Ram Mandir History

When was Ayodhya Ram Mandir destroyed?

राम मंदिर इतना महत्वपूर्ण क्यों है?

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राम मंदिर अयोध्या के बारे में क्या खास है?

इस समय हमारा पूरा देश राममय है और अब अयोध्या में श्री राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा में बहुत ही कम समय बचा है या यूँ कहें की बस कुछ समय बाद ही राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा होने वाली है. जिसका इंतजार हर भारतीय 500 सालों से करता आ रहा है। एक ऐसी तारीख, जिसका इंतजार न जाने कितनी पीढ़ियां सालों से करती आई हैं। एक ऐसी लड़ाई, जिसमे न जाने कितने लोगों ने अपनी जान गवां दी। और 16 वीं सदी के बाद सभी की ये चाह थी, की राम मंदिर का निर्माण वो अपनी आँखों से देखें। जिसके लिए उन्होंने पूरे जीवन भर संघर्ष किया। जिसमे हजारों लोगों ने अपना पूरा जीवन ही राम मंदिर की लड़ाई में न्योछावर कर दिया। और आज वो हमारे साथ नहीं हैं और न ही वो ये गौरवशाली पल अपनी आँखों से देख पाएंगे। लेकिन हम और आप वो शौभाग्यशाली पीढ़ी हैं जो अयोध्या में श्री राम मंदिर को बनता हुआ देख रहे हैं, श्री राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा को देखेंगे। 

 

Ram mandir ayodhya

राम मंदिर इतना महत्वपूर्ण क्यों है?

अब आपकी जानकारी के लिए बता दें की राम मंदिर एक बहुत ही महत्वपूर्ण हिन्दू मंदिर है। और प्रभु श्री राम एक हिंदू देवता हैं जो भगवाम विष्णु के 7 वें अवतार माने जाते हैं। बता दे की प्राचीन भारतीय महाकाव्य, रामायण के अनुसार, श्री राम का जन्म अयोध्या में हुआ था।और ये मंदिर उस जगह बना है जहाँ प्रभु श्री राम का जन्म स्थान है। वो राम मंदिर, जिसको 1528 में बाबर ने गिरवाकर उसमे एक मस्जिद का निर्माण कराया था। तो आज के इस वीडियो में हम आपको राम मंदिर के निर्माण और संघर्ष की पूरी जानकारी बताएंगे। इसलिए लास्ट तक वीडियो को जरूर देखें और ज्यादा से ज्यादा लोगों को शेयर करें ताकि सभी लोग राम मंदिर के संघर्ष की पूरी लड़ाई का इतिहास जान पाएं। 

Ram mandir ki history

राम मंदिर की जगह पहले क्या था?

बता दे की राम मंदिर की लड़ाई में जो लोगों का संघर्ष है वो 10-20 साल पुराना नहीं बल्कि 4-5 सौ साल पुराना है. और ये बात भी सभी जानते हैं की बाबर ने 1528 में राम मंदिर को तुड़वाकर वहां मस्जिद बनवाई। जहाँ पर श्री राम लला की पुनर्स्थापना की जा रही है. लेकिन ये बात बहुत कम लोग जानते है की मस्जिद बनने से पहले का जो मंदिर था। उसका निर्माण स्वयं श्री राम के पुत्र कुश ने कराया था और सिर्फ अयोध्या में ही श्री राम और माँ सीता के हजारों मंदिर थे, जो बहुत लम्बे समय तक वहां बने रहे. इसके बाद 21 अप्रैल 1526 को बाबर और इब्राहीम लोधी में युद्ध होता है और 1528 को बाबर की सेना अयोध्या में कब्ज़ा करती है और बाबर के कहने पर उसके सेनापति ने राम मंदिर को तोड़कर वहां मस्जिद का निर्माण कराया। जिसे बाबरी मस्जिद नाम दिया। लेकिन सालों तक किसी ने कुछ नहीं किया क्यूंकि उस समाय मुगलों का राज पुरे देश में था। उसके बाद साल 1717 में जयपुर के राजा जयसिंह द्वितीय ने मस्जिद की जमीन को हिन्दुओं को देने का बहुत प्रयास किया क्यूंकि वो जानते थे की वो जमीन हिन्दुओं के लिए कितनी महत्वपूर्ण है और उनके मुगलों से सम्बन्ध भी ठीक थे लेकिन वो अपने प्रयासों में सफल नहीं हो पाए। लेकिन उन्होंने मस्जिद के पास ही हिन्दुओं को पूजा करने के लिए एक राम चबूतरा बनवाने का निश्चय किया और ये वो दौर था जब मुस्लिम मस्जिद के अंदर नमाज पढ़ते थे और हिन्दू बाहर चबूतरे में बैठकर पूजा अर्चना करते थे। अब आप जरा खुद से सोंच कर देखिये, उन हिन्दुओं को कैसा लगता होगा। जैसे अपने ही घर से निकाल कर बाहर खड़ा कर दिया गया हो। 

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बाबर ने राम मंदिर कब तोड़ा था?

वैसे तो अयोध्या में श्री राम के अनेक मंदिर थे, लेकिन श्री राम के जन्मस्थान में मंदिर को तोड़कर मस्जिद बनाने वाली घटना से लोगों की भावनाएं बहुत आहत हुईं। और वो इस घटना को भुला नहीं पाए। और 1813 में हिन्दू संगठन ने ये दावा कर दिया की बाबर के कार्यकाल में राम मंदिर को तोड़कर मस्जिद बनाई गई। और उस समय के अधिकारियों ने भी मस्जिद में हिन्दू मंदिर जैसे साक्ष्य मिलने की बात कही। और विवाद शुरू होने के बाद से उस जमीन पर नमाज के साथ पूजा अर्चना भी शुरू हो गई। और 1853 में अयोध्या में पहली बार धार्मिक हिंसा हुई. इसके बाद भी कुछ सालों तक एक ही जमीन पर लोग पूजा अर्चना और नमाज अदा करते रहे। लेकिन 1855 में मुस्लिमों को मस्जिद के अंदर जाने की इजाजत मिल गयी और हिन्दुओं का मस्जिद में प्रवेश रोक दिया गया। जिसके बाद हिन्दुओं ने राम चबूतरे में पूजा करनी शुरू की। इसके बाद 1885 में पहली बार ये मामला अदालत पहुंचा। जिसमे निर्मोही अखाड़े के महंत रघुवर दास की राम चबूतरे की अर्जी को अदालत ने अस्वीकार कर दिया। इसके बाद 1934 में हुए दोबारा दंगे में वहां नमाज होना बंद हो गया। लेकिन उस समय की कांग्रेस सरकार राम मंदर के मुद्दे को लेकर बिलकुल भी गंभीर नहीं थी. लेकिन उस वक्त की आम जनता जो थी, जो राम भक्त थे वो 400 सालों बाद भी राम मंदिर की लड़ाई में खड़े रहे। 

अयोध्या विवाद की पूरी कहानी

उसके बाद समय आया देश की आजादी यानि 1947 का, जब लोगों ने ये मान लिया था। की देश की आजादी के साथ ही राम मंदिर का फैसला भी उनके हक़ में आ जाएगा। लेकिन उस समय के किसी भी कांग्रेसी नेता ने राम मंदिर को लेकर कोई कदम नहीं उठाया। लेकिन बड़ा मोड़ तब आया तब 23 दिसंबर 1949 को विवादित जगह से घंटों की आवाज आने लगी। और वहां पूजा शुरू कर दी गई, जिसमे हिन्दू पक्ष का कहना था की श्री राम की प्रतिमा वहां प्रकट हुई।जबकि मुस्लिम पक्ष का कहना था की रात में मूर्ति की स्थापना की गई है। और दोनों समुदायों के लोगों की भीड़ बढ़ने लगी। और विवाद दिन प्रति दिन बढ़ता गया। जिसके बाद उस समय के प्रधानमंत्री प.जवाहरलाल नेहरू ने वहां के जिलाधिकारी केके नायर को वहां से मूर्ति हटाने का आदेश दिया। जिसपर केके नायर इस चीज़ का विरोध  करते हैं और प्रधानमंत्री के आदेश को ठुकरा देते हैं और सरकार की तरफ से जब उनपर ज्यादा दबाव बनाया गया तो वो अपने पद से इस्तीफा देने का निश्चय करते हैं।और साथ ही सरकार से श्री राम की मूर्ति को न हटाने की सलाह देते है। 

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राम मंदिर आंदोलन का इतिहास

लेकिन 35 सालों तक हिन्दू और मुस्लिम दोनों पक्ष लगातार अदालत में अर्जी देते हैं लेकिन कोई फैसला नहीं निकल सका। उसके बाद 1980 में केंद्र में बीजेपी सरकार के आने के बाद राम मंदिर का आंदोलन तेज होने लगा। जिसमे बीजेपी के साथ साथ संघ और विश्व हिन्दू परिषद भी इस मुद्दे में सक्रिय हो गए। और 1980 के दशक में ही, हिंदू राष्ट्रवादी परिवार, संघ परिवार से संबंधित विश्व हिंदू परिषद ने हिंदुओं के लिए इस स्थान को पुनः प्राप्त करने और इस जगह पर श्री राम के बाल स्वरुप को समर्पित एक मंदिर बनाने के लिए एक आंदोलन शुरू कर दिया। जिसके बाद 1986 को राजीव गाँधी राम मंदिर का ताला खोलने का आदेश देते हैं। जिसके विरोध में मुसलमानों ने भी एक बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी बनाई। इसके कुछ समय बाद लालकृष्ण अडवानी जी ने सोमनाथ से अयोध्या तक 10 हजार किलोमीटर की रथ यात्रा निकाली। और रथ यात्रा के दौरान ही आडवानी जी को बिहार में गिरफ्तार कर लिया गया। और जब अयोध्या में रथयात्रा का समापन हुआ। तब बहुत भारी मात्रा में रामभक्त वहां पहुंचे और विवादित जगह पर झंडा फहराया। लेकिन भीड़ को काबू करने और मुसलमानों को खुश करने के लिए उस समय की मुलायम सरकार ने कार सेवकों यानि की राम भक्तों पर गोलियां चलवा दीं।

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राम मंदिर की खुदाई में क्या क्या मिला है?

वहीँ कुछ समय बाद ये विवाद अपने चरम पर आ गया। जिस समय कल्याण सिंह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे और कारसेवकों के अयोध्या पहुँचने से पहले कल्याण सिंह ने अदालय को भरोसा दिलाया की वो अयोध्या की स्थिति गंभीर नहीं होने देंगे। लेकिन  6 दिसंबर 1992 में कारसेवकों की भीड़ ने विवादित ढांचे को धवस्त कार दिया। जिसके बाद वहां राष्ट्रपति शासन लग गया और मुख्यमंत्री ने अपने पद से स्तीफा दे दिया। जिसके बाद हुए साम्प्रदाइक दंगों में हजारो लोगों ने अपनी जान गवां दी। लेकिन फिर भी 7 साल तक अदालत में कोई सुनवाई नहीं हुई। और 90 के दशक में जब दोबारा से केंद्र में भाजपा की सरकार आई तो फिर से हिन्दू संगठनों को राम मंदिर को लेकर एक आस जगी। उसके बाद ASI को राम मंदिर के जांच की जिम्मेदारी दी गई। जिसके बाद ASI ने वहां मिले सबूतों से वहां हिन्दू मंदिर होने का दवा किया। जिसके बाद ये साबित होने लगा की वहां राम मंदिर ही था। और ASI की रिपोर्ट के बाद अदालत ने विवादित जमीन को राम जन्म भूमि ट्रस्ट, निर्मोही अखाड़ा और सुन्नी वक्फ बोर्ड में बराबर बांटने का फैसला किया।लेकिन तीनों ही पक्षों ने इस फैसले को अस्वीकार कर दिया।

Ayodhya Ram mandir ki history

राम मंदिर के पीछे की कहानी क्या है?

ये विवाद 2011 में सुप्रीम कोर्ट पहुँच गया। लेकिन वहां भी 7 साल कोई सुनवाई नहीं हो पाई और आपसी रजामंदी से मामले का हल निकालने की कोशिश की गई। लेकिन उससे भी कोई हल नहीं निकला और सुनवाई लगातार जारी रही और 9 नवंबर 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने सारे साक्ष्यों के रूप में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की एक रिपोर्ट के अनुसार, जिसमें बाबरी मस्जिद के नीचे एक गैर-इस्लामिक संरचना की मौजूदगी के सबूत थे। उसके  अनुसार विवादित जमीन को राम जन्मभूमि ट्रस्ट को देने का फैसला किया। और 5 जनवरी 2020 को ट्रस्ट के गठन के बाद राम मंदिर का निर्माण शुरू कर दिया गया.इस समय मंदिर की देखरेख श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट द्वारा की जा रही है। और मंदिर का उद्घाटन 22 जनवरी 2024 को निर्धारित किया गया है। 

अयोध्या के राम मंदिर का वास्तुकार कौन है?

अब अगर हम बात करें मंदिर की डिज़ाइन की तो बता दे की राम मंदिर का मूल डिज़ाइन 1988 में ही अहमदाबाद के सोमपुरा परिवार द्वारा तैयार कर लिया गया था। और जो सोमपुरा परिवार है उसने कम से कम 15 पीढ़ियों से दुनिया भर में 100 से ज्यादा मंदिरों के डिजाइन में अपना सहयोग किया है, जिसमें सोमनाथ जैसे मंदिर भी शामिल हैं। वहीँ बाद में कुछ बदलावों के साथ  2020 में सोमपुरा द्वारा एक नया डिज़ाइन,तैयार किया गया।  जिसमे हिंदू ग्रंथों, वास्तु शास्त्र और शिल्पा शास्त्रों के अनुसार, मंदिर 250 फीट चौड़ा, 380 फीट लंबा और 161 फीट होगा ऊँचा। और मंदिर का निर्माण एक बार पूरा होने पर, मंदिर परिसर दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा हिंदू मंदिर होगा। और  मंदिर की जो मुख्य संरचना है उसे तीन मंजिला ऊंचे चबूतरे पर बनाई जाएगी। और मंदिर में पांच शिखर होंगे, जो इसकी भव्यता को और ज्यादा बढ़ाएंगे। 

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राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा क्या है?

और अब अगर बात करें श्री राम मंदिर के प्राण प्रतिष्ठा की, तो जनवरी 2024 तक गर्भगृह और मन्दिर का प्रथम तल तैयार हो चुका है। जहाँ 22 जनवरी को श्रीराम के मूर्ति की प्राण-प्रतिष्ठा की जायेगी, जिसमें प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी प्राण प्रतिष्ठा समारोह का मुख्य हिस्सा होंगे। और जो  प्राणप्रतिष्ठा के कार्यक्रम है, उनकी शुरुआत 14 जनवरी से ही शुरू हो चुकी है। और इसी पर्व को लेकर 22 जनवरी को कई प्रदेशों में विद्यालयों में अवकाश भी रहेगा।  

 

Ram mandir ki history

इसलिए आप सभी से निवेदन है की अपने अपने घरों में 22 जनवरी को दीपोत्सव मनाकर अपने घरों को दीपों से सजाएं और अपने आस पास के मंदिरों में भजन कीर्तन का आयोजन करें। और साथ ही उन महान आत्माओं को भी श्रद्धांजलि अर्पित करें, जिन्होंने राम मंदिर के संघर्ष में अपने प्राणों का भी बलिदान दे दिया।

 

 

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