हर  ज़हर  तुमने  भरे हैं

जो  हवा  में  घुल गए हैं

अम्लवर्षा और  प्रदूषण

क्या करम तुमने किए हैं

Corona side effect
 प्रारब्ध

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ये विदारक भ्रंश देखो

ये भयावह ध्वंश देखो

मृत्यु का विषदंत देखो

शत्रु का भुजदंड देखो

प्रकृति की विकृति में

जो मनुज निर्मम रहा

वन निकर के त्रास में

मतलबी  हरदम  रहा

बेज़ुबानों का विलाप

शौक  से  सुनता रहा

बुद्धिबल  आवेग   में

पृथ्वीपति बनता रहा

स्वच्छ वायु को धुँआ

जल गरल करता रहा

वो मनोहर शैल पर्वत

काटकर  बढ़ता  रहा

माना तेरी तकनीक से

बढ़ते रहे शहरी नज़ारे

पर कहीं  गिनती नहीं

जो बसाए घर उजाड़े

वो प्राणवायु  देने वाले 

वनतरु सब काट डाले

जो थे धरा के रोमकूप

वो जलाकर छाँट डाले

खग विहग के गीतराग

कर रहे थे बस विलाप

और जीव जो बेघर हुए

बेबस  बिचारे  मर गए

जो बच गए बंधक बने

ज़ुल्म सारे कब सही थे

लुप्त  हो  गए जीव जो

दोष उनके कुछ नहीं थे

बंदी रहे वो जो पखेरू

रे आततायी कौन था?

वो जो मरे पिंजरे तले

उनके हिस्से व्योम था

निर्दोष चीखें और रुदन

जैवमंडल जल रहा था

तू मग़र निर्मोही मानव

तानाशाही कर रहा था

वो जीवधारी डर रहे थे

तेरी ग़ुलामी कर रहे थे

मासूमों को मृत्यु सुनाई

क्या दया तुमने दिखाई

आज अपना बिंब देखो

वो अहम  अब क्षीण है

रे धरा का  क्रूर शासक

तू आज कितना दीन है

देख  संकट  जो  खड़ा

अब तू नहीं सबसे बड़ा

कोई आ गया है सामने

तेरे  दम्भ को  दुत्कारने

सड़कों के सारे शोरगुल

कैसे यकायक  खो गए

तेरे  उगाए   सब  शहर

कैसे शिथिल से हो गए

क्या हुआ ये क्यूँ हुआ

इतने में ही घबरा गए

सब तुम्हारे कर्म हैं जो

लौटकर फिर आ गए

आखेट अब  इंसान हैं

ओ मनस्वी डर रहे हो

अब स्वयं पर आई तो

त्राहि त्राहि कर रहे हो

चुप्पियाँ ये कह रही हैं

अस्तित्व तेरा मिट रहा

मेघ-सा छाया जगत में

काल परचम दिख रहा

रोग-व्याधी बन गए हैं

अनगिनत जो पाप  हैं

ये क़ैदगी और  बेबसी

उन पक्षियों के श्राप हैं

ये  घुट रही है  साँस जो

ये बिक रही है साँस जो

जो  फेफड़ों  में  दाग हैं

उन वृक्षदल  के श्राप हैं

हर  ज़हर  तुमने  भरे हैं

जो  हवा  में  घुल गए हैं

अम्लवर्षा और  प्रदूषण

क्या करम तुमने किए हैं

जीवन वहाँ मौजूद था

आग जब वन में लगी

वो धरा की उष्णता में

ताप बनकर घुल गयी

एक हिमगिरि रोता रहा

तुम बेफ़िकर  सोते रहे

तुमको मिले कर्तव्य से

हरदम विमुख होते रहे

ये काल जो  मंडरा रहा

जानो कोई प्रतिशोध है

ये जो मनुज पर छा रहा

सब प्रकृति का कोप है

और तू विदारक रोग रे

आवेग  अपना  रोक रे

निज दर्प में बस चूर है

तू भी मनुज-सा क्रूर है

विज्ञान अब  विक्षुब्ध है

वो  तीव्र बुद्धि स्तब्ध है

अंत का आह्वान करता

लो आ गया 'प्रारब्ध' है!

लो आ गया 'प्रारब्ध' है!

- जया मिश्रा 'अन्जानी'

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