बिना रावण दहन के किया होलिका दहन तो घिर जाते हैं गंभीर बीमारी से लोग 

 हिन्दू ही नही मुस्लिम भी मनाते है रामलीला 

रविवार के ही दिन होता है रावण का दहन 

 Holi festival rituals 2021 करनैलगंज गोण्डा । जनपद के कर्नलगंज तहसील क्षेत्र का पहाड़ापुर  गांव में करीब चार सौ साल पहले मुगल शासन काल से ही फागुन मास में होलिका दहन से पहले रामलीला, लंका दहन और रावण वध का  की परंपरा के बारे मेंगांव के बुजुर्ग पं. ठाकुर प्रसाद दीक्षित बताते हैं कि उनके पूर्वज बताते थे कि एक साल रामलीला स्थल पर जल भराव के कारण रामलीला का मंचन नहीं हुआ।

होली का त्यौहार भी निपट गया। इसके बाद अचानक गांव के कई लोग बीमार हो गए। तब विद्वान ज्योतिषियों ने इसे दैवीय प्रकोप बताया और होलिका दहन से पहले पड़ने वाले रविवार को लंका दहन और रावण पुतला दहन की सलाह दी। तभी से यह परम्परा चल पड़ी। इस साल भी होलाष्टक लगने से पहले रविवार को लंका दहन के साथ रावण का पुतला दहन किया गया।


पहाड़ापुर गांव की इस अनोखी रामलीला में यहां के हिन्दू ही नहीं गांव के सैकड़ों मुस्लिम परिवार भी बढ़-चढ़कर भाग लेते हैं। कई सालों तक रामलीला में नील का रोल निभा चुके गांव के ठाकुर प्रसाद दीक्षित बताते हैं कि आज से 31 साल पहले वर्ष 1990 में भी देवी के प्रकोप के कारण ग्रामीणों ने रामलीला कार्यक्रम रोक दिया था।

इसका नतीजा रहा कि गांव में अचानक आग लग गई और लगभग 400 घर जल गए। गांव के कच्चे और फूस के घरों में कुछ नहीं बचा। पक्के मकानों के अंदर भी आग पहुंची और काफी नुकसान हुआ था। तब रामलीला में प्रयोग किए जाने वाले कपड़े और अन्य सामग्री सुरक्षित बच गई थी। लेकिन यह आग कहां से लगी इसका पता आज तक नहीं चला। इसीलिए इसे दैवीय प्रकोप माना गया। इसके बाद गांव के लोग सहम गए और होली के ऐन पहले लंका दहन का यह सिलसिला पुनः चल पड़ा।

गांव के बर्जुग ब्रहमादीन वैश्य और छांगुर बताते हैं कि बीस दिनों तक चलने वाले इस कार्यक्रम का शुभारंभ राम वनवास से होकर भगवान के राजसिंहासन पर विराजमान होने के बाद समाप्त होता है। यह भी मान्यता है कि रविवार के दिन ही लंका दहन और रावण का पुतला दहन होता है।

यदि किसी कारण से दिन रविवार न हो तो यह कार्यक्रम अगले रविवार को होता है। अंतिम दिन राज तिलक के बाद जिस प्रकार भगवान राम ने अयोध्या वासियों का आर्शीवाद लिया था उसी प्रकार यहां भी राम पूरे गांव में रात में घूम-घूम कर आर्शीवाद लेते हैं। राम, लक्ष्मण और उनकी वानर सेना का फूल मालाओं से सम्मान होता है और भोज भी कराया जाता है।


ग्रामवासी और पेशे से पत्रकार श्रीनाथ रस्तोगी बताते हैं कि रामलीला समिति के नेतृत्व में हर साल बसंत ऋतु के बाद फागुन मास में रामलीला का कार्यक्रम होता है। वर्तमान में समिति के अध्यक्ष शांतीचंद्र शुक्ला के अगुआई में रामलीला सम्पन्न हो रही है। वैसे तो पूरे रामलीला मंचन के दौरान आसपास के लोग बड़ी संख्या में जुटते हैं किन्तु लंका दहन और रावण वध के दिन यहां विशाल मेला लगता है। मेले में दूर दूर से व्यवसायी आकर दुकानें लगाते हैं। शाम चार बजे से शुरु होकर कार्यक्रम रात भर चलताहै। पुरातन हनुमान मंदिर में पूजा अर्चना के बाद जब वे राम चबूतरे पर आते तो उन्हें कंधे पर बिठाकर तालाब पार कराया जाता था।तब भगवान को कंधे पर बिठाने के लिए होड़ लगी रहती थी। अब छोटा सा पुल बन जाने के बाद भी यह परम्परा कायम है और अब भी भगवान को कंधे पर बिठाने और सात सीढ़ी वाले विमान को उठाने की होड़ लगती है।

लेकिन अब ट्रैक्टर ट्राली से यह विमान ले जाया जाता है। बाहर हाल गांव की यह परंपरा गांव ही नहीं पूरे देवीपाटन मंडल में होली त्योहारों के अवसर पर चर्चा का विषय होता है।

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