मौन और ध्वनि

मौन और ध्वनि

मौन वह शून्य है जो प्रत्येक शब्द का आधार है। शून्य… जिससे सूक्ष्म भी कुछ नहीं और जिससे असीम भी कुछ नहीं। मौन से ही सबकुछ प्रारम्भ होता है और मौन में ही विलीन हो जाता है। अंतरिक्ष के अगाध मौन में एक हमारी पृथ्वी पर यह जीवन-नाद कितना रहस्यमयी है! कितनी प्रक्रियाएँ होंगी जो समय के इतिहास में घटित हुई होंगी और निरंतर हो रही हैं। एक अनंत मौन में सहसा एक नाद का गुंजन! ॐ से अनंत तक की यह यात्रा… सचमुच ब्रह्माण्ड कितना रोचक है। 

मौन स्थिरता है और ध्वनि अर्थात् गति। एक दूसरे से विपरीति रखने वाले ये दोनों तत्व एक दूसरे के पूरक हैं। मौन स्थिर रहता है ताकि ध्वनि उसमें गति कर सके। ध्वनि के लिए मौन का होना कितना महत्वपूर्ण है। मौन हमेशा विद्यमान होता है हर ध्वनि के पीछे, बस हम मौन को सुन नहीं पाते। क्योंकि मौन नीरस है… और वहीं ध्वनि ऊर्जा का एक रूप। जो सकारात्मक और नकारात्मक तरंगों को धारण किए रहती है। ध्वनि के पास भाव हैं। और मन तो है ही भावप्रेमी। मन को आवेग ही खींचता है। और मौन तटस्थ है, भावावेगों से दूर… निस्पृह! आत्मतत्व का निरूपक। जिसको ना सुख से मोह है ना दुःख से भय। निश्चित ही ब्रह्म का परिचायक! ध्वनि की सीमित अवधि है, ध्वनि आयु के अधीन है… और मौन है शाश्वत… काल से विमुक्त। मौन का अस्तित्व हमारी सोच से कहीं अधिक विराट है। जहाँ शब्द बनते और मिटते रहते हैं.. जैसे आकाश में मेघ।

कभी-कभी पर्वतों-पाषाणों को देखती हूँ तो लगता है मौन ने शरीर धारण कर लिया है। और उनके शिखरों से गिरने वाली नदियाँ जैसे ध्वनि की देह जान पड़ती हैं। ध्वनि का स्पर्श मौन को कभी उछिन्न नहीं कर पाता। प्रकृति ने कितना जोड़कर रखा है विपरीतियों को एक दूसरे से! पर्वत और नदियाँ… जिनमें इतना विरोधाभास… फ़िरभी एक-दूसरे के साथ लिपटे रहते हैं.. जैसे राधा और कृष्ण।

जैसे पर्वत चिरकाल से नदियों के साथ होकर भी उनसे पृथक रहे, वैसे आत्मा भी भावों से उतनी ही अछूत होगी। मौन भी ध्वनियों से उतना ही अछूत होगा। ध्वनि का स्पर्श मौन को भंग नहीं करता। हम केवल धारणाओं में जी रहे हैं। हमनें स्थिरता को जाना ही नहीं…और बिना स्थिरता के हम कुछ भी स्पष्ट नहीं देख सकते। मनुष्य को स्थिर होने के लिए मौन को सुनना होगा… ब्रह्म को सुनना होगा।

- जया मिश्रा ‘अनजानी’

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