अल्पसंख्यक का मतलब क्या होता है | What Is The Meaning Of Minority Community?

Majority groups Examples

What Is The Minority Community

अल्पसंख्यक जातियां कौन कौन सी है?

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आज हम आपको बताएंगे की कानून की नजर में अल्पसंख्यक असल में होते कौन हैं. आम भाषा में कहें तो जो कम है वो अल्पसंख्यक और जो ज्यादा है वो बहुसंख्यक. लेकिन चलिए इसको अपनी भाषा में परिभाषित करके देखते हैं. 

बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक विभाजन के बीच अंतर

आप यह मान सकते हैं कि अल्पसंख्यक या अल्पसंख्यक समाज उन खास लोगों का एक समूह होता है, एक ग्रुप होता है जिनकी पूजा पद्धति, रहन-सहन का ढंग और बाकि के तौर तरीके बहुसंख्यक समाज यानि मेजोरिटी ग्रुप से अलग होते हैं.  बात करें अगर अपने देश भारत कि तो यहां अल्पसंख्यक, आप यूं कह सकते हैं कि एक सबसे बड़ा मुद्दा है. मौजूदा वक्त में तो और भी ज्यादा. आप बेशक समझ रहे होंगे कि हम क्या कहना चाहते हैं. बहरहाल, सिर्फ भारत में ही नहीं, बल्कि अल्पसंख्यकों की एक कैटिगरी पूरी दुनियाभर में मौजूद है, और एक बात जो इन सभी में कॉमन है वो यह है कि यह अल्पसंख्यक अक्सर भेदभाव, हाशिए और बहिष्कार का सामना करते हैं. अल्पसंख्यकों की तरफ से एक यह भी आरोप लगता आया है कि उन्हें बहुसंख्यकों के मुकाबले कम पगार यानी बहुत आम सी सैलरी पर रखा जाता है. खैर वापस आते हैं अपने असल मुद्दे पर यानी जानते हैं कि कानून की नजर में अल्पसंख्यक कौन होते हैं. अगर बाबा साहब भीमराव अंबेडकर के बनाए संविधान की नज़र से देखें तो भारत के संविधान में अल्पसंख्यक शब्द का जिक्र तो देखने में मिल जाता है लेकिन अफसोस है कि इसे डिफाइन नहीं किया गया है परिभाषित नहीं किया गया है.

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अल्पसंख्यक का पूरा अर्थ क्या है?

आपको पता होगा कि भारत में छह समुदायों को अल्पसंख्यक का दर्जा हासिल है. ये हैं, पारसी, मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध और जैन. इनमें से पारसी, मुस्लिम, ईसाई, सिख और बौद्ध को 1993 में केंद्र सरकार ने एक अधिसूचना जारी कर अल्पसंख्यक घोषित किया और जैनों को 2014 में एक अलग अधिसूचना जारी कर के उन्हें भी अल्पसंख्यक घोषित किया हुआ है. अभी बात हुई भारतीय संविधान की और चलिए अब बात करते हैं देश की सबसे बड़ी अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट की. अल्पसंख्यक कौन होते हैं. सुप्रीम कोर्ट का रुख इस तरफ जरा मुख्तलिफ है. सुप्रीम कोर्ट सीधा और साफ लफ्जों में कहता है कि क्या कोई समूह ‘अल्पसंख्यक’ है, इसका फैसला मौजूदा मानकोंं के आधार पर किया जाना चाहिए. न कि उस स्थिति के आधार पर जो भारत के संविधान के लागू होने से पहले मौजूद थी. दरअसल सुप्रीम कोर्ट अपनी इस दलील को ब्रिटिश शासन काल से जोड़कर देखती है. आपकी जानकारी के लिए बता दें कि ब्रिटिश शासन के दौरान ‘अल्पसंख्यक’ जैसा कुछ भी नहीं था. ब्रिटिश शासनकाल में हिंदू और मुसलमान बराबर से पीड़ित थे. इसलिए सुप्रीम कोर्ट कहता है कि जब दोनों ही पीड़ित थे तो फिर एक वर्ग बहुसंख्यक और एक अल्पसंख्यक कैसे हो सकता है.

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भारत का अल्पसंख्यक समुदाय कौन है?

तो अब तक आप यह समझ चुके होंगे कि भारत में अल्पसंख्यक शब्द की कोई ठोस परिभाषा नहीं है. इसके बाद सबसे बड़ा सवाल यही निकल कर आता है कि आखिर किस बेस पर यह तय किया जाता है कि कोई माइनॉरिटी या अल्पसंख्यक है भी या नहीं. तो इसके जवाब में यह जान लीजिए कि अभी फिलहाल यह काम केंद्र सरकार का होता है. उस पर जिम्मेदारी होती है कि वह ये तय करें कि कौन माइनॉरिटी है. और केंद्र सरकार इसके लिए National Commission for Minorities Act, 1992 के तहत फैसला लेती है.

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बहरहाल, जो भी हो हमारे देश में अल्पसंख्यकों के लिए कुछ विशेष अधिकारों का प्रावधान है. लगभग हर राज्य में अल्पसंख्यक आयोग बनाए गए हैं ताकि उनसे जुड़े किसी भी मसलों का हल जल्द निकल सके. यही वजह है कि बाकी देशों के मुकाबले हमारे देश के अल्पसंख्यक ज्यादा अच्छी और खुशहाल जिंदगी गुज़ार रहे हैं. 

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