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ग्लोबल लेप्रोसी डे-क्ुष्ठ रोग का इलाज संभव है समाज में भेदभाव की जगह नहीं है



ग्लोबल लेप्रोसी डे-क्ुष्ठ रोग का इलाज संभव है समाज में भेदभाव की जगह नहीं है

लेप्रोसी डे

राजधानी में एक राष्ट्रीय स्तर पर सेमिनार का आयोजन किया गया जिसमें देश विदेश के कुष्ठरोग विशेषज्ञों, रिसर्च स्कालर्स और द निप्पन फाउन्डेशन के पदाधिकारी इस मौके पर मौजूद थे।



नयी दिल्ली। भारत में प्रचीन काल से ही कुष्ठ रोग को असाध्य माना गया है। इसका एक प्रमुख कारण इलाज के तौर तरीकों में बदलाव न होना भी हो सकता है। लोगों में आज भी यहअवधारणा है कि जिस व्यक्ति या परिवार में कुष्ठरोग हो जाता है आस पास के लोग दूरी बना लेते हैं। उन्हे इस बात का डर होता है कि रोगी के निकट जाने या उसके पारिवारिक सदस्यों के साथ उठने बैठने से भी रोग फैल सकता है।


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इस लिये समाज के अन्य लोग कुष्ठ रोगियों की परछाई से भी दूर भागते हैं। हम लोगांे को इस बात की जागरूकता का प्रचार प्रसार करना है कि कुष्ठ रोग पूर्णतया ठीक किया जा सकता है। लेकिन उसके लिये कुष्ठरोग के उपचार की सहीं तौर तरीकों को अपनाना होगा। इस प्रकार की एक अपील वैश्विक स्तर पर द निपन फाउन्डेशन की ओर की गयी। राजधानी में एक राष्ट्रीय स्तर पर सेमिनार का आयोजन किया गया जिसमें देश विदेश के कुष्ठरोग विशेषज्ञों, रिसर्च स्कालर्स और द निप्पन फाउन्डेशन के पदाधिकारी इस मौके पर मौजूद थे। इस अवसर पर एक शार्ट मूवी का प्रदर्शन भी किया गया जिसमें दुनिया से कुष्ठ का समूल नाश करने के लिये रोडमैप दिखाया गया है। निप्पन फाउन्डेशन 30 जनवरी को ग्लोबल लेप्रोसी डे के रूप में मनाता है। द निप्पन फाउन्डेशन के अध्यक्ष योहे सासाकावा ने अपने 20 साल के व्यापारिक अनुभवों में कुष्ठ रोग की भयावहता व वेदना का एहसास किया। 1962 में उन्होंने अपने व्यापार से अर्जित धन को द निप्पन फाउन्डेशन में लगा दिया  और वो 1981 में द निप्पन फाउन्डेशन से जुड़ गये। सासाकावा ने शिक्षा, स्वास्थ्य, खाद्य सुरक्षा ओर समुद्री सरक्षा जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठाया है।


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विनय गोयल


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