झूठे केस को लेकर वायरल वीडियो में महिला सुरक्षा और कानून के दुरुपयोग पर उठे सवाल

छत्तीसगढ़ पुलिस की सब-इंस्पेक्टर मोनिका पांडे के नाम से वायरल वीडियो में झूठी शिकायतों के खिलाफ दी गई चेतावनी
 
झूठे केस को लेकर वायरल वीडियो में महिला सुरक्षा और कानून के दुरुपयोग पर उठे सवाल
नई दिल्ली। सोशल मीडिया पर छत्तीसगढ़ पुलिस की सब-इंस्पेक्टर मोनिका पांडे के नाम से एक वीडियो वायरल हो रहा है, जिसमें कथित तौर पर झूठी पुलिस शिकायतों और कानून के दुरुपयोग को लेकर लोगों को आगाह किया गया है। वीडियो में महिलाओं द्वारा बदला लेने या किसी पर दबाव बनाने के लिए झूठे मुकदमे दर्ज कराने के दावे पर चर्चा की गई है।

वायरल वीडियो में कहा गया है कि किसी भी व्यक्ति को कानून का इस्तेमाल निजी विवाद या बदले के साधन के रूप में नहीं करना चाहिए। इसमें यह भी दावा किया गया है कि जांच के दौरान डिजिटल साक्ष्यों की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है और परिस्थितियों के अनुसार चैट, कॉल रिकॉर्ड तथा लोकेशन जैसे इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों की जांच की जा सकती है।

वीडियो में मोनिका पांडे के नाम से यह संदेश दिया गया है कि कानून का उद्देश्य लोगों को सुरक्षा और न्याय उपलब्ध कराना है। यदि कानून का जानबूझकर गलत इस्तेमाल किया जाता है तो इससे वास्तविक पीड़ितों के मामलों पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।


BNS में झूठे आरोप पर क्या है प्रावधान?

वायरल वीडियो में झूठी शिकायत पर 5 से 10 साल तक की जेल का दावा किया गया है। हालांकि, भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 248 का प्रावधान इससे अधिक विशिष्ट है। इसके तहत किसी व्यक्ति को नुकसान पहुंचाने के इरादे से, यह जानते हुए कि कोई वैध आधार नहीं है, झूठा आपराधिक मामला दर्ज कराने या झूठा आरोप लगाने पर अधिकतम पांच वर्ष तक की जेल, दो लाख रुपये तक जुर्माना या दोनों का प्रावधान है। यदि झूठा आपराधिक मामला ऐसे अपराध के संबंध में हो जिसकी सजा मृत्यु, आजीवन कारावास या 10 वर्ष या उससे अधिक हो सकती है, तो धारा 248 में अधिक कठोर दंड का प्रावधान है।इसलिए किसी शिकायत को केवल इसलिए झूठा नहीं माना जा सकता कि आरोपी ने आरोप से इनकार किया है। शिकायत की सत्यता और उपलब्ध साक्ष्यों का निर्धारण जांच तथा न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से होता है।

कानून के सही इस्तेमाल का संदेश

वायरल वीडियो का मुख्य संदेश यही है कि कानून नागरिकों की सुरक्षा और न्याय के लिए है तथा इसका जानबूझकर दुरुपयोग नहीं किया जाना चाहिए। साथ ही, वास्तविक शिकायतों को सामने लाने वाली महिलाओं और अन्य पीड़ितों के अधिकारों की रक्षा भी समान रूप से महत्वपूर्ण है।वीडियो ने सोशल मीडिया पर कानून, महिला सुरक्षा और झूठे मुकदमों के आरोपों को लेकर बहस छेड़ दी है। हालांकि, वायरल वीडियो में किए गए व्यक्तिगत दावों और वक्तव्य की स्वतंत्र पुष्टि अलग से आवश्यक है।

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