व्यवसायियों को भी चाहिए आर्थिक सुरक्षा कवच

Business owners also need a financial safety net.
 
व्यवसायियों को भी चाहिए आर्थिक सुरक्षा कवच

सत्यशील अग्रवाल (विनायक फीचर्स)  जब कोई जीव इस संसार में जन्म लेता है, तो उसकी पहली और सबसे बुनियादी आवश्यकता भोजन होती है। इसी कारण खाद्य सुरक्षा किसी भी जीव के लिए सर्वोपरि है। मानव, जो इस सृष्टि की सर्वोच्च रचना है, उसकी जीवन-शैली अन्य जीवों से भिन्न है। इसलिए उसकी न्यूनतम आवश्यकताओं में रोटी, कपड़ा और मकान को शामिल किया गया है। कोई भी व्यक्ति इन आवश्यकताओं की पूर्ति के बिना सम्मानजनक जीवन की कल्पना नहीं कर सकता।

भारतीय समाज की पारंपरिक विशेषता रही है—पारिवारिक सहयोग। दुःख-सुख में परिवार एक-दूसरे का संबल बनता रहा है। किंतु बदलते समय और तेजी से टूटते संयुक्त परिवारों के चलते आज व्यक्ति को अपनी लड़ाई स्वयं लड़नी पड़ रही है। ऐसे में आर्थिक संसाधन जुटाने की पूरी जिम्मेदारी परिवार के मुखिया पर आ जाती है। कई बार परिस्थितियाँ ऐसी भी होती हैं जब कोई व्यक्ति असहाय हो जाता है और दो समय का भोजन जुटाना भी उसके लिए चुनौती बन जाता है।

एक सभ्य और विकसित राष्ट्र की यह जिम्मेदारी है कि वह अपने सभी नागरिकों को जीवन भर न्यूनतम आवश्यकताओं की सुरक्षा प्रदान करे—विशेषकर उन नागरिकों को, जिन्होंने देश के विकास में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष योगदान दिया है। कठिन समय में सरकार द्वारा नागरिक की जिम्मेदारी लेना उसके सम्मान की रक्षा करना भी है।

स्वतंत्र भारत में विभिन्न सरकारों ने उद्योग, कृषि, रोजगार और सामाजिक कल्याण के लिए अनेक योजनाएँ शुरू कीं। यद्यपि भ्रष्टाचार के कारण इन योजनाओं का पूरा लाभ जनता तक नहीं पहुँच पाया, फिर भी नागरिकों ने अपने अथक परिश्रम से जीवन स्तर को बेहतर बनाया। निम्न और मध्यम वर्ग के अनेक परिवार समृद्धि की ओर बढ़े, यहाँ तक कि अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति के जीवन में भी कुछ सुधार देखने को मिला।

पिछले छह दशकों में सभी दलों की सरकारों ने सरकारी कर्मचारियों के कल्याण के लिए निरंतर कदम उठाए। वेतन आयोगों की सिफारिशों के चलते वेतनमान, चिकित्सा सुविधाएँ और सेवा-निवृत्ति के बाद पेंशन जैसी व्यवस्थाएँ मजबूत की गईं। परिणामस्वरूप सरकारी राजस्व का बड़ा हिस्सा कर्मचारियों के वेतन और सुविधाओं पर खर्च होने लगा। यह व्यय अंततः देश की अर्थव्यवस्था और विकास योजनाओं को प्रभावित करता है, लेकिन सत्ता और व्यवस्था के संतुलन के लिए इसे आवश्यक माना गया।

यहाँ एक मूल प्रश्न उठता है—क्या सरकार की जिम्मेदारी केवल सरकारी कर्मचारियों तक ही सीमित है? क्या व्यापारी, उद्योगपति और निजी व्यवसायी देश की सेवा नहीं करते? वे भी तो सरकार को कर देते हैं, रोजगार सृजन करते हैं और अर्थव्यवस्था की रीढ़ होते हैं। फिर भी, उनके लिए न तो कोई पेंशन व्यवस्था है और न ही बुरे समय में कोई ठोस सुरक्षा कवच।

निजी व्यवसायी जोखिम उठाता है—आग, चोरी, मंदी, दुर्घटना, बीमारी, अपहरण और रंगदारी जैसी चुनौतियों का सामना करता है। व्यापार में घाटा होने या शारीरिक अक्षमता आने पर उसके भविष्य की सुरक्षा के लिए कोई सरकारी प्रावधान नहीं होता। बीमा योजनाएँ भी प्रायः मृत्यु के बाद ही सहायता देती हैं, जो महंगाई के दौर में परिवार की दीर्घकालिक आवश्यकताओं के लिए अपर्याप्त साबित होती हैं।

वास्तविकता यह है कि सरकारी खजाने की आय का प्रमुख स्रोत व्यापारी और उद्योगपति ही हैं। प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कर—इनकम टैक्स, जीएसटी, कस्टम ड्यूटी, रोड टैक्स, एक्साइज, सर्विस टैक्स—सभी का भार निजी क्षेत्र उठाता है। यही वर्ग रोजगार पैदा करता है और राजस्व संग्रह की जिम्मेदारी निभाता है, फिर भी सबसे अधिक उपेक्षित रहता है।

सरकारी क्षेत्र के कई उद्योग एकाधिकार के बावजूद घाटे में चलते हैं, जबकि निजी उद्योग तीव्र प्रतिस्पर्धा के बीच भी लाभ कमाते हैं। बावजूद इसके, निजी क्षेत्र को किसी संकट में सरकारी संरक्षण प्राप्त नहीं होता। अतः समय आ गया है कि व्यापारी, उद्योगपति और निजी व्यवसायी अपने अधिकारों के प्रति सजग हों। संगठित होकर अपनी आवाज उठाएँ और सरकार से यह मांग करें कि जिस वर्ग ने देश की अर्थव्यवस्था को खड़ा रखा है, उसे भी आर्थिक सुरक्षा कवच प्रदान किया जाए। एक संतुलित और सशक्त भारत के लिए यह अनिवार्य है।

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