बदलती होली: समरसता के रंगों पर चढ़ता सियासत और सावधानी का पहरा

सुधाकर आशावादी जी का यह लेख होली के बदलते स्वरूप और वर्तमान सामाजिक-राजनीतिक चुनौतियों पर एक गहरा कटाक्ष करता है। यह लेख पुरानी यादों की मिठास और आज के दौर की कड़वाहट के बीच के अंतर को स्पष्ट रूप से दर्शाता है।
 
बदलती होली: समरसता के रंगों पर चढ़ता सियासत और सावधानी का पहरा

लेखक: सुधाकर आशावादी (विभूति फीचर्स)

आज के बाजारीकरण और राजनीतिक ध्रुवीकरण के दौर में होली का त्यौहार अपनी मौलिकता खोता जा रहा है। लेखक इस लेख के माध्यम से समाज में बढ़ती दूरियों और उत्सवों के प्रति पैदा हुए 'डर' पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हैं।

1. अतीत की होली बनाम आज की कृत्रिमता

लेखक याद करते हैं कि कैसे कभी गलियों में बच्चे पिचकारियों के साथ तैनात रहते थे, लेकिन आज वे घरों की चारदीवारी में सिमट गए हैं। पहले होली केवल एक त्यौहार नहीं, बल्कि सामाजिक जुड़ाव का माध्यम थी। अब उत्सवों पर कृत्रिमता और बाजारीकरण हावी हो गया है।

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2. वर्ण व्यवस्था और सामाजिक समरसता

लेख में पुरानी शिक्षा पद्धति का जिक्र है, जहाँ निबंधों के माध्यम से चार पर्वों को चार वर्णों से जोड़ा जाता था (रक्षाबंधन-ब्राह्मण, दशहरा-क्षत्रिय, दिवाली-वैश्य और होली-शूद्र)। लेखक का तर्क है कि इस वर्गीकरण के बावजूद, धरातल पर होली के दिन कोई भेदभाव नहीं होता था। रंगे हुए चेहरों में जातियां छिप जाती थीं और लोग एक-दूसरे को गले लगाकर समरसता का परिचय देते थे।

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3. सियासत और मुकदमों का डर

लेखक वर्तमान परिदृश्य पर प्रहार करते हुए कहते हैं कि आज राजनीति ने समाज को जातियों में इस कदर बांट दिया है कि त्यौहार मनाने में भी डर लगता है। संवैधानिक प्रावधानों और राजनीतिक सक्रियता के कारण अब बिना पूछे रंग लगाना 'भेदभावपूर्ण आचरण' का आरोप लगवा सकता है। होली की गुझिया की जगह जेल की सलाखों और कानूनी पचड़ों का डर अब उत्सव पर भारी पड़ रहा है।

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4.  सावधानी ही बचाव है

लेख का समापन एक कड़वे सच के साथ होता है—सुरक्षित रहने के लिए सार्वजनिक स्थलों पर होली खेलने से दूरी बनाना ही आज के समय की मांग है। मुकदमों और अलगाववादी शक्तियों से बचने के लिए अब सावधानी को ही उत्सव का हिस्सा बनाना मजबूरी बन गया है।

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