आठवाँ सुर’: संगीतकार नौशाद के भीतर छिपे शायर से परिचय कराती पुस्तक
(विवेक रंजन श्रीवास्तव – विभूति फीचर्स)
हिंदी सिनेमा के महान संगीतकारों में नौशाद अली का नाम बेहद सम्मान के साथ लिया जाता है। ‘बैजू बावरा’, ‘मुगल-ए-आज़म’, ‘मदर इंडिया’ और ‘अनमोल घड़ी’ जैसी फिल्मों का संगीत उनकी अमिट पहचान है। लेकिन नौशाद का व्यक्तित्व केवल संगीत तक सीमित नहीं था। सुरों के इस जादूगर के भीतर एक संवेदनशील शायर भी सांस लेता था। ‘आठवाँ सुर’ इसी शायर नौशाद अली से पाठकों का परिचय कराती है। यह पुस्तक उनकी ग़ज़लों, शेरों और आत्मानुभूतियों का ऐसा संग्रह है, जिसमें जीवन के अनेक रंग एक साथ दिखाई देते हैं।
सात सुरों के बीच तलाशा गया आठवाँ स्वर
‘आठवाँ सुर’ शीर्षक अपने आप में बेहद अर्थपूर्ण है। भारतीय संगीत में सात सुरों की परंपरा है, लेकिन नौशाद की शायरी में जीवन के अनुभवों, प्रेम, विरह, स्मृतियों, पीड़ा और मृत्यु-बोध से उपजा एक ऐसा स्वर सुनाई देता है, जिसे आठवाँ सुर कहा जा सकता है।
संगीतकार नौशाद ने जहां सुरों के माध्यम से भावनाओं को अभिव्यक्ति दी, वहीं शायर नौशाद ने उन्हीं भावों को शब्दों में ढाला। यही वजह है कि उनकी शायरी में भी एक सहज लय और संगीतात्मकता दिखाई देती है। नौशाद की शायरी केवल प्रेम और रूमानियत तक सीमित नहीं है। उसमें जीवन की क्षणभंगुरता, बिछोह, स्मृति, आत्मसंवाद और मृत्यु की आहट भी महसूस होती है। वे लिखते हैं—
“क्यों मिली थी हयात याद करो
याद रखने की बात याद करो।”
दो छोटे-से मिसरे जीवन के एक बड़े प्रश्न को सामने रख देते हैं—जीवन हमें क्यों मिला और हमने उसका क्या अर्थ बनाया? अंततः हमारे पीछे क्या रह जाएगा? यह सवाल शायर खुद से भी करता है और पाठक को भी सोचने के लिए मजबूर करता है।
इसी भावभूमि पर उनका एक और शेर है—
“इक बे-क़रार दिल से मुलाक़ात कीजिए
जब मिल गए हैं आप
तो कुछ बात कीजिए।”
भाषा सहज है, लेकिन भाव गहरे हैं। ‘बेकरार दिल’ और ‘मुलाकात’ जैसे पारंपरिक ग़ज़ल के शब्दों के सहारे नौशाद उस आत्मीय क्षण को पकड़ते हैं, जब किसी अपने से मिल लेने के बाद भी मन में अनकही बातें रह जाती हैं।
सादगी है नौशाद की शायरी की ताकत
‘आठवाँ सुर’ की सबसे उल्लेखनीय विशेषताओं में उसकी सादगी है। नौशाद कठिन शब्दों या अत्यधिक अलंकारों के सहारे प्रभाव पैदा करने की कोशिश नहीं करते। उर्दू ग़ज़ल की समृद्ध परंपरा में रहते हुए भी उनकी अभिव्यक्ति अपेक्षाकृत सहज और सीधे मन तक पहुंचने वाली है।
प्रेम है तो उसमें आत्मीयता है, विरह है तो पीड़ा है और स्मृति है तो उसके साथ एक गहरी कसक भी है। इसलिए उनकी शायरी पढ़ते हुए यह अनुभव होता है कि कोई व्यक्ति केवल शेर नहीं कह रहा, बल्कि अपने जीवन के अनुभवों और भावनाओं का हिसाब पाठक के सामने रख रहा है।
मीर की परंपरा के प्रति विनम्र स्वीकार
नौशाद की शायरी की जड़ें उर्दू की समृद्ध काव्य परंपरा में दिखाई देती हैं। वे इस परंपरा से परिचित होने के साथ-साथ उसके सामने अपनी स्थिति को लेकर विनम्र भी हैं। उनका आत्मव्यंग्यपूर्ण शेर इसका सुंदर उदाहरण है—
“करना है शायरी अगर ‘नौशाद’
‘मीर’ का कुल्लियात याद करो।”
यह केवल मीर के प्रति सम्मान व्यक्त करने वाला शेर नहीं है, बल्कि अपनी रचनात्मक सीमाओं और महान परंपरा के प्रति सजगता का भी परिचायक है। बड़ा रचनाकार वही होता है जो अपने पीछे मौजूद साहित्यिक विरासत को पहचानता है। नौशाद यहां स्वयं के लिए भी एक ऊंची कसौटी तय करते दिखाई देते हैं।
निजी पीड़ा जब कविता बन जाती है
पुस्तक के शुरुआती हिस्सों में आया नौशाद का आत्मीय संस्मरण इसे महज शायरी का संग्रह नहीं रहने देता। परिवार, मृत्यु, स्मृति और प्रियजनों से जुड़े प्रसंगों के बीच उनकी निजी पीड़ा कविता का रूप लेती दिखाई देती है।
“फिर उसी तरह कलेजे से लगा लो मुझको
गिरती दीवार हूँ लिल्लाह सँभालो मुझको।”
और आगे—
“जिसने फल-फूल दिये, प्यार दिया, साया दिया
मैं वही पेड़ हूँ मरने से बचा लो मुझको।”
यहां ‘पेड़’ महज पेड़ नहीं रह जाता। वह जीवन, परिवार, आश्रय और ढलती उम्र का प्रतीक बन जाता है। इन पंक्तियों से गुजरते हुए संगीतकार नौशाद के भीतर छिपे उस शायर का एहसास होता है, जो अपने जीवन के अंतिम सत्य और अपनी स्मृतियों से संवाद कर रहा है।
स्मृति और तलाश का द्वंद्व
‘आठवाँ सुर’ में स्मृति एक महत्वपूर्ण भाव के रूप में बार-बार उभरती है। कभी यह प्रेम की याद है, कभी बिछड़े हुए व्यक्ति की स्मृति और कभी अपने ही अतीत में लौटने का प्रयास। इसी भाव को एक शेर में नौशाद इस तरह व्यक्त करते हैं—
“मैं लाख ढूँढूँ उसे ढूँढने से क्या होगा
मेरी तलाश में वो भी तो खो गया होगा।”
इस शेर में तलाश का द्वंद्व बेहद प्रभावी है। जिसे हम खोज रहे हैं, संभव है कि वह भी हमें तलाशते-तलाशते कहीं खो गया हो। प्रेम की यह विडंबना शेर को सामान्य विरह से उठाकर जीवन की व्यापक अनुभूति में बदल देती है।
संगीत और शायरी का एक ही संवेदनशील संसार
नौशाद की शायरी में समय और मृत्यु का बोध भी महत्वपूर्ण है। उनके यहां जीवन कोई स्थायी उपलब्धि नहीं, बल्कि निरंतर बदलती हुई यात्रा है। रिश्ते बनते हैं, बिछड़ते हैं और अंततः मनुष्य स्मृतियों में बदल जाता है। यही दृष्टि ‘आठवाँ सुर’ को केवल प्रेम-कविता के संग्रह से कहीं आगे ले जाती है।
नौशाद के संगीत और उनकी शायरी को एक-दूसरे से पूरी तरह अलग करके देखना भी उचित नहीं होगा। संगीत में उन्होंने भारतीय शास्त्रीय परंपरा को लोकप्रिय सिनेमा की भाषा से जोड़ा, वहीं शायरी में उसी सांस्कृतिक संस्कार को शब्दों का रूप दिया। उनके संगीत की तरह उनकी शायरी में भी माधुर्य, अनुशासन और भाव की प्रधानता दिखाई देती है।इस पुस्तक से गुजरते हुए महसूस होता है कि नौशाद के लिए संगीत और कविता दो अलग-अलग रचनात्मक संसार नहीं थे। दोनों एक ही संवेदनशील मन से निकले दो अलग स्वर थे।
स्थापित पहचान से अलग एक शायर का संसार
‘आठवाँ सुर’ की सबसे सुखद बात यह है कि यहां एक प्रसिद्ध संगीतकार अपने स्थापित नाम के सहारे शायर बनने की कोशिश करता हुआ नहीं दिखता। वह अपने शब्दों और संवेदनाओं के आधार पर पाठक के सामने आता है।कहीं वह प्रेमी है, कहीं विरही, कहीं आत्मालोचक और कहीं जीवन से सवाल करता हुआ एक साधारण मनुष्य। कभी वह अपनी स्मृतियों में लौटता है तो कभी बीतते समय और मृत्यु के सामने खड़ा दिखाई देता है। यही मानवीयता इस संग्रह को मूल्यवान बनाती है।
ऐसा लगता है कि ये रचनाएं नौशाद के लंबे जीवन-सफर में मन के भीतर उठती भावनाओं को कागज पर दर्ज करने के प्रयासों का संकलन हैं। उनके संगीत को सुनते हुए हम उनके सुरों के जादू में खो जाते हैं, लेकिन ‘आठवाँ सुर’ पढ़ते हुए उन्हीं सुरों के पीछे छिपे संवेदनशील मनुष्य से हमारा परिचय होता है।सात सुरों के महान साधक ने जब शब्दों में एक अतिरिक्त स्वर खोजा, तो वही स्वर शायद ‘आठवाँ सुर’ बन गया—एक ऐसा स्वर, जिसे कानों से कम और मन से अधिक सुना जा सकता है।
