Guru Purnima Special: आषाढ़ पूर्णिमा, महर्षि वेदव्यास और भारतीय संस्कृति में 'गुरु' शब्द की विराटता
सुप्रभात आत्मीय परिजनों एवं मित्रों, सपरिवार।
आज का दिन भारतीय संस्कृति में अत्यंत पावन और महान पर्व गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है। इसे व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है। यह मान्यता है कि इसी दिन महर्षि वेदव्यास का जन्म हुआ था, जिन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा को अपनी अमूल्य रचनाओं से समृद्ध किया।
महर्षि वेदव्यास को 18 महापुराणों और अनेक उपपुराणों के रचनाकार के रूप में सम्मान प्राप्त है। उन्हें भारतीय वांग्मय का महान स्तंभ माना जाता है। हालांकि यह निश्चित रूप से कहना कठिन है कि उनका अवतरण आषाढ़ पूर्णिमा के दिन ही हुआ था, लेकिन परंपरा और श्रद्धा ने इस तिथि को उनकी जयंती के रूप में स्वीकार किया है।
आषाढ़ मास वर्षा ऋतु का प्रारंभिक समय होता है। वर्षा पृथ्वी के जीवन का आधार है, क्योंकि जल ही जीवन है। संभव है कि प्रकृति के पोषण और ज्ञान के प्रकाश के इस संबंध के कारण भी इस दिन को विशेष महत्व मिला हो।
महर्षि वेदव्यास के विचारों की महानता को इस श्लोक से समझा जा सकता है—
अष्टादश पुराणेषु व्यासस्य वचनद्वयम्।
परोपकाराय पुण्याय पापाय परपीडनम्।।
अर्थात् परोपकार पुण्य है और दूसरों को पीड़ा देना पाप है।
गुरु के बिना जीवन अधूरा है
इस संसार में कोई भी व्यक्ति गुरु के बिना पूर्ण नहीं होता। गुरु केवल शिक्षा देने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि जीवन को सही दिशा दिखाने वाला मार्गदर्शक होता है।विश्व के महान दार्शनिकों को भी गुरु परंपरा से ही ज्ञान मिला। जैसे अरस्तू के गुरु प्लेटो थे और प्लेटो के गुरु सुकरात। यह परंपरा बताती है कि ज्ञान का प्रवाह सदैव गुरु से शिष्य तक चलता आया है। भारतीय संस्कृति में गुरु का स्थान सर्वोच्च माना गया है। भगवान श्रीकृष्ण को जगद्गुरु कहा गया है और रामचरितमानस के प्रारंभ में भी गुरु की महिमा का वर्णन मिलता है—
"बंदउं गुरु पद पदुम परागा।
सुरुचि सुबास सरस अनुरागा।।"
गुरु किसी जाति या वर्ग से सीमित नहीं होते। जीवन का पहला गुरु माता-पिता होते हैं। इतिहास में भी ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं जहां महान व्यक्तियों ने अपने गुरु के रूप में ऐसे संतों को स्वीकार किया जो सामाजिक दृष्टि से साधारण माने जाते थे। महारानी मीरा के गुरु संत रविदास इसका प्रमुख उदाहरण हैं।
गुरुओं का गुरु कौन है?
जब हम देखते हैं कि भगवान श्रीकृष्ण के गुरु सांदीपनि ऋषि थे, भगवान शिव के गुरु बृहस्पति माने जाते हैं और देवताओं तथा असुरों के भी गुरु रहे हैं, तब यह प्रश्न उठता है कि स्वयं गुरुओं का गुरु कौन है?
इसका उत्तर महाकवि भर्तृहरि ने अपने नीति शतक में दिया है—
विद्यानां नरस्य रूपमधिकं प्रच्छन्नगुप्तं धनम्।
विद्या भोगकरी यशः सुखकरी विद्या गुरूणां गुरु:।।
अर्थात् विद्या मनुष्य का श्रेष्ठ रूप है, छिपा हुआ धन है और विद्या ही गुरुओं की गुरु है।
विद्या केवल किसी कला या कौशल में निपुणता प्राप्त करना नहीं है, बल्कि वह ज्ञान है जो मनुष्य को अज्ञान, बंधन और दुखों से मुक्त करने का मार्ग दिखाए।
विष्णु पुराण में भी कहा गया है—
तत्कर्म यन्न बन्धाय सा विद्या या विमुक्तये।
आयासायापरं कर्म विद्याSन्या शिल्पनैपुणम्।।
अर्थात् वही कर्म श्रेष्ठ है जो बंधन में न डाले और वही विद्या सार्थक है जो मुक्ति का मार्ग दिखाए।
गुरु का स्थान ईश्वर से भी ऊपर
भारतीय परंपरा में गुरु को ईश्वर तक पहुंचाने वाला मार्ग माना गया है। संत कबीर ने कहा है—
गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पांय।
बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय।।
गुरु वह शक्ति है जो शिष्य को सत्य, ज्ञान और परमात्मा तक पहुंचने का मार्ग दिखाती है।
शास्त्रों में गुरु की महिमा इस प्रकार कही गई है—
अखण्ड मण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम्।
तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्री गुरवे नमः।।
और—
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरु साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः।।
गुरु पूर्णिमा का संदेश
गुरु पूर्णिमा केवल पूजा और सम्मान का पर्व नहीं, बल्कि अपने जीवन में गुरु की शिक्षाओं को अपनाने का अवसर है। गुरु के प्रति श्रद्धा तभी पूर्ण होती है जब उनके बताए सत्य, अनुशासन, सेवा और सदाचार के मार्ग पर चला जाए।
अपने-अपने गुरु गोविंद की जय।
श्री हरि ऊं नमः शिवाय।
