राष्ट्र हित सर्वोपरि

National interest is paramount
 
राष्ट्र हित सर्वोपरि

(डॉ. सुधाकर आशावादी – विभूति फीचर्स)

सदियों से अस्पृश्यता और भेदभाव के किस्से समाज में चर्चा का विषय रहे हैं। सामाजिक संरचना में लंबे समय तक पारिवारिक एवं सांस्कृतिक उत्सवों में सभी वर्गों की भागीदारी सुनिश्चित रहती थी और साझा प्रयासों से ग्रामीण अर्थव्यवस्था सुचारु रूप से चलती थी। यद्यपि कुछ क्षेत्रों में भेदभाव की घटनाएँ सामने आती थीं, परंतु वर्तमान समय में अस्पृश्यता और छुआछूत व्यवहारिक जीवन में बहुत कम दिखाई देती है। फिर भी अनेक संगठन सामाजिक समरसता स्थापित करने के प्रयास में सक्रिय हैं।

राष्ट्र हित सर्वोपरि

इसी क्रम में अपनी स्थापना के उपरांत लगभग सौ वर्षों के कार्यकाल में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने जनसेवा का जो स्वरूप विकसित किया है, उसमें जातीय भेदभाव का कोई प्रत्यक्ष आधार नहीं दिखता। इसके बावजूद समाज में जातीय भेदभाव को लेकर विमर्श निरंतर जारी है।

प्रश्न यह उठता है कि जातीय भेदभाव वास्तव में कितना व्यापक है और कितना राजनीतिक विमर्श का परिणाम? कुछ राजनीतिक दल संकीर्ण जातीयता के प्रतिनिधि बनकर जातीय गणना की वकालत करते हैं। उनका तर्क है कि इससे समाज में विभिन्न जातियों की हिस्सेदारी स्पष्ट होगी और सुविधाओं का वितरण सुनिश्चित किया जा सकेगा। हालांकि विश्व के अधिकांश देशों में नागरिकों की गणना जातीय आधार पर किए जाने की परंपरा नहीं दिखाई देती।

जहाँ तक भेदभाव का प्रश्न है, यह व्यक्तिगत स्तर पर संभव हो सकता है, परंतु संपूर्ण जाति को आधार बनाकर किसी निष्कर्ष पर पहुँचना उचित नहीं कहा जा सकता। तथाकथित दलित, पिछड़े और सवर्ण वर्गों में भी आर्थिक विषमता विद्यमान है। ऐसे में केवल जाति के आधार पर आरक्षण को न्यायसंगत ठहराने पर बहस स्वाभाविक है। उल्लेखनीय है कि संघ प्रमुख मोहन भागवत ने जातीय भेदभाव समाप्त होने तक आरक्षण जारी रखने की बात कही है।

मेरा मत है कि समाज में सभी बुद्धिजीवियों और सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधियों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है, परंतु किसी भी विचार से सहमत होना अनिवार्य नहीं है। आर्थिक आधार पर विशेष सुविधाएँ या आरक्षण अधिक न्यायसंगत प्रतीत होता है, बजाय जातीय आधार के।

अतः आवश्यक है कि समस्त बुद्धिजीवी वर्ग जातीय पूर्वाग्रहों से ऊपर उठकर ऐसा विमर्श प्रस्तुत करे, जिसमें जाति, धर्म और क्षेत्रवाद से परे राष्ट्र को सर्वोपरि मानने की भावना हो। व्यक्तिगत हितों से ऊपर राष्ट्रहित को प्राथमिकता देना ही सशक्त और समरस समाज की आधारशिला बन सकता है।

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