सुकून
( लेखिका नीतू माथुर )
जाने क्यूँ आज सुबाह जल्दी में है
पलकों पे नींद के निशां अभी बाकी हैं
जाने क्यूँ रात पूरी होती ही नहीं
इन सपनों केअलग ही मिज़ाज हैं
आजकल दिन थोड़े ठहरे हैं
शाम में धुआँ के पहरे हैं
ना जोश से सूरज निकलता है
ना खुल के शाम ढलती हैं
लगता है नाराज़ ये मौसम है
हवा अजीब सी कश्मकश में
हर पहर आने से पहले जाने को तैयार
यहाँ वक़्त का ठहराव गुम है
सोचती हूँ मैं किस जगह खड़ी हूँ
ये कौनसी ज़मीन का टुकड़ा है
जहां बसर की गुंजाइश कम है
पग पग का रास्ता अब सिकुड़ा है
कहीं तो दिन रात पे पहरा ख़त्म हो
चाँद सूरज मन से आयें जायें
कुछ तो उनकी भी मर्ज़ी हो
इनके कायदों में कभी तो ढील हो
नियम क़ानून हर इंसान यहाँ ने ठुकराए हैं
क्या सिर्फ़ चाँद सूरज ही इनके पहरे में आये हैं
कुछ आज़ादी इनको भी दो खुल के जीने दो
इस ज़मीं के इंसान ने अपनी गिरती फ़ितरत पर
यूं चार चाँद लगाये हैं
अब कहीं दूसरी जगह ढूँढती हूँ
जहाँ इन पहरों से आराम हो
दिन रात में ना कोई उलझन हो
बस आँखे जो देखना चाहे वो सामने हो
मुझे उम्मीद है थोड़ा यकीन भी
मेरी पलकों में सुकून की नींद हो।
लेखिका नीतू माथुर
