रक्षाबंधन : समाज और राष्ट्र रक्षा का प्रेरक पर्व
इंजी. अतिवीर जैन 'पराग', (सौजन्य: विभूति फीचर्स) रक्षाबंधन केवल भाई-बहन के स्नेह का पर्व नहीं, बल्कि यह समाज और राष्ट्र की रक्षा का भी प्रतीक है। यह एक ऐसा अवसर है जब प्रेम, कर्तव्य और सुरक्षा के भाव एक रक्षा-सूत्र में बंध जाते हैं। बहनें अपने भाइयों की कलाई पर राखी बांधती हैं और उनसे जीवनभर सुरक्षा का वचन लेती हैं, लेकिन इस पर्व का दायरा केवल पारिवारिक संबंधों तक सीमित नहीं है।
रक्षासूत्र का सामाजिक और आध्यात्मिक स्वरूप
राखी का धागा केवल बहन भाई को ही नहीं, बल्कि बहनें अपने पिता, चाचा, भतीजे, यहां तक कि सहेलियों को भी बांधती हैं। वहीं पुरुष भी एक-दूसरे को रक्षासूत्र बांधकर समाज में सौहार्द और एकता का संदेश देते हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में रक्षासूत्र एक-दूसरे को बांधने की परंपरा है, जिससे राष्ट्र की रक्षा का संकल्प लिया जाता है।
ब्राह्मणों द्वारा अपने यजमानों को रक्षा-सूत्र बांधने की परंपरा भी हमारे समाज में रक्षाबंधन के व्यापक आयाम को दर्शाती है।
जैन धर्म में रक्षाबंधन की ऐतिहासिक कथा
जैन धर्म में यह पर्व जैन मुनियों की रक्षा की स्मृति में मनाया जाता है। इसके पीछे एक प्रेरक प्रसंग है जो आचार्य अकम्पनाचार्य और उनके 700 शिष्य मुनियों से जुड़ा हुआ है। जब उन्होंने हस्तिनापुर के जंगल में विहार किया, उस समय वहां के मंत्री बलि, नमुचि, प्रह्लाद और बृहस्पति – जो पूर्व में उज्जैन में जैन मुनियों पर उपसर्ग कर चुके थे – ने पुनः षड्यंत्र रचा। उन्होंने झूठ से राजा पद्मराय से सात दिन का राजपद प्राप्त कर, जंगल में रह रहे मुनियों को जलाने का प्रयास किया।
मुनियों की रक्षा के लिए मुनि विष्णुकुमार, जो विक्रिया रिद्धि से युक्त थे, हस्तिनापुर पहुंचे और बलि को चुनौती दी। वामन रूप में तीन पग भूमि मांगकर, जब उन्होंने अपने विराट स्वरूप से दो पग में संपूर्ण धरती को नाप लिया, तो तीसरा पग बलि की पीठ पर रख दिया। बलि और अन्य मंत्री भयभीत हो गए और अंततः यज्ञ रोककर क्षमा मांगी।
मुनियों की सेवा और दूध-सिवैयों की परंपरा
यज्ञ की आग और धुएं से मुनियों की हालत अत्यंत दयनीय हो गई थी। श्रावकों ने उनकी सेवा की और आहार स्वरूप दूध-सिवैयां बनाई गईं, जिन्हें मुनियों ने ग्रहण किया। तभी से रक्षाबंधन पर दूध-सिवैया, घेवर और फैनी बनाने और बांटने की परंपरा शुरू हुई।
रक्षासूत्र की शुरुआत
उपसर्ग से बचने के बाद मुनि विष्णुकुमार को रक्षा सूत्र बांधा गया और श्रावकों ने भी एक-दूसरे को रक्षा का संकल्प देते हुए रक्षा सूत्र बांधे। इसी दिन श्रावण शुक्ल पूर्णिमा को 'रक्षाबंधन' या 'सलूनो' पर्व का शुभारंभ हुआ।
रक्षाबंधन : राष्ट्ररक्षा का प्रतीक पर्व
आज भी हमारे देश के सैनिक सीमा पर एक-दूसरे को राखी बांधते हैं और राष्ट्र की सुरक्षा का संकल्प लेते हैं। छात्राएं भी अपने हाथों से राखियां बनाकर सैनिकों को भेजती हैं। इस प्रकार रक्षाबंधन आज न केवल पारिवारिक भावनाओं का पर्व है, बल्कि यह राष्ट्रीय एकता, रक्षा और भाईचारे का प्रतीक बन चुका है।

