दुर्लभ वर
(जया मिश्रा)
जो ध्येय नहीं कोई जीवन में
उसका क्या आधार कहो
कहो उसे कोई खर-पतवार
या फिर जग का भार कहो
यदि नहीं कचोटते तुमको ये
मनुज देह के आसार प्रबल
यदि नहीं तोड़ते तुमको ये
मानवमन के भाव तरल
फिर कैसे निज को वीर बताते हो
एक दुर्लभ वर को व्यर्थ बिताते हो
यदि नहीं उफनता अंतस में
जग के विष का ज्वार सखे
यदि नहीं भड़कता धमनी में
मानवरक्त का अंगार सखे
यदि नहीं फूटता उर में तेरे
चेतना का उद्गार सखे
यदि नहीं दरकता पीड़ा से
ये शीशे का संसार सखे
फिर कैसे निज को वीर बताते हो
एक दुर्लभ वर को व्यर्थ बिताते हो
जो चढ़ने से घबराए तो
कैसे उसके भाग शिखर हो
अँधकार का अनुगामी जो
कैसे उसका मार्ग प्रखर हो
जो दोषदर्शी जगनिंदक
कैसे उसके पास सुयश हो
जो क्लेशप्रेमी परपीड़क
कैसे उसको हर्ष सुलभ हो
यदि नहीं उपजती मरु हृदय में
मुक्ति की अभिलाषा जो
यदि नहीं भेदती आत्मा को
आत्मज्ञान की जिज्ञासा जो
फिर कैसे निज को वीर बताते हो
एक दुर्लभ वर को व्यर्थ बिताते हो
