मायके की कमी से उदास थी रिचा, जिठानी की मां ने कहा- ‘यह घर हमेशा तुम्हारा मायका रहेगा

रिश्ते खून के नहीं, प्यार और अपनापन से बनते हैं—एक ऐसी कहानी, जिसने रिचा को जिंदगी का सबसे बड़ा सहारा दिया
 
मायके की कमी से उदास थी रिचा, जिठानी की मां ने कहा- ‘यह घर हमेशा तुम्हारा मायका रहेगा

कभी-कभी जिंदगी हमें ऐसे रिश्ते दे देती है, जिनका हमारे साथ कोई खून का संबंध नहीं होता, लेकिन उनका अपनापन सगे रिश्तों से भी कहीं ज्यादा गहरा होता है। यह कहानी रिचा की है, जिसने बचपन में ही अपने माता-पिता को खो दिया था। अनाथालय में पली-बढ़ी रिचा ने बहुत कम उम्र में यह सीख लिया था कि उसे अपने सपनों और जिंदगी की मुश्किलों का सामना खुद करना होगा।

पढ़ाई पूरी करने के बाद रिचा ने मुंबई की एक बड़ी कंपनी में नौकरी शुरू की। यहीं उसकी मुलाकात मानव से हुई। शुरुआत में दोनों केवल सहकर्मी थे, लेकिन धीरे-धीरे दोस्ती गहरी होती गई और देखते ही देखते दोनों एक-दूसरे के करीब आ गए। आखिरकार उन्होंने शादी करने का फैसला कर लिया।

शादी के बाद मिला नया परिवार

रिचा का अपना कोई परिवार नहीं था, लेकिन मानव के परिवार ने उसे कभी इस कमी का अहसास नहीं होने दिया। मानव के बड़े भाई सोहम और उनकी पत्नी आरती परिवार को संभालते थे। मानव के माता-पिता का कई साल पहले निधन हो चुका था, लेकिन सोहम और आरती ने पूरे परिवार को प्रेम और समझदारी के साथ जोड़े रखा था।

रिचा की शादी पूरे उत्साह और धूमधाम से हुई। शादी की तैयारियों से लेकर हर छोटी-बड़ी जिम्मेदारी तक आरती और सोहम ने उसका साथ दिया। रिचा को महसूस हुआ कि शायद जिंदगी ने उससे जो छीना था, उसकी भरपाई किसी न किसी रूप में कर रही है।

आरती उसके लिए सिर्फ जिठानी नहीं थीं, बल्कि बड़ी बहन जैसी बन गई थीं। वह रिचा को घर-परिवार की बातें समझातीं और हर मुश्किल में उसका साथ देतीं। सोहम भी उसे छोटी बहन की तरह मानते थे।

आरती के मां बनने पर रिचा ने निभाया बहन का फर्ज

कुछ समय बाद आरती गर्भवती हुईं। रिचा ने उनका पूरा ध्यान रखा। उनकी जरूरतों का ख्याल रखना उसकी दिनचर्या का हिस्सा बन गया। जब आरती ने एक बेटे को जन्म दिया तो घर में खुशियां छा गईं। बच्चे का नाम ‘आदि’ रखा गया। आदि भी रिचा से बेहद घुल-मिल गया। वह रिचा की गोद में बैठना और उसके साथ समय बिताना पसंद करता था। धीरे-धीरे दोनों के बीच एक बेहद खास रिश्ता बन गया।

मां बनने की खुशी के बीच मायके की कमी ने किया भावुक

कुछ समय बाद रिचा को भी मां बनने की खुशखबरी मिली। मानव बेहद खुश था। पूरा परिवार आने वाले बच्चे के स्वागत की तैयारियों में जुट गया। लेकिन रिचा के मन में एक सवाल बार-बार उठता था—जब वह मां बनेगी तो उसके मायके से कौन आएगा? कौन उसकी देखभाल करेगा? वह भावनात्मक सहारा, जो आमतौर पर बेटी को उसके मायके से मिलता है, उसे कहां से मिलेगा?

आखिर वह दिन भी आया जब रिचा ने एक बेटी को जन्म दिया। घर में खुशी का माहौल था, लेकिन उसके मन में अपने मायके की कमी का दर्द कहीं न कहीं मौजूद था।एक दिन आरती ने उसकी उदासी देख ली। उन्होंने प्यार से पूछा, “क्या हुआ रिचा? तुम बेटी के जन्म से खुश नहीं हो?”रिचा ने मुस्कुराने की कोशिश करते हुए कहा, “ऐसी बात नहीं है भाभी। मुझे तो बेटी ही चाहिए थी। लेकिन आज मुझे अपने मायके की बहुत याद आ रही है। मेरा तो कोई मायका है ही नहीं।”

तभी दरवाजे पर खड़ी थीं आरती की मां

रिचा की बात पूरी भी नहीं हुई थी कि दरवाजे से आवाज आई, “यह तुमने कैसे कह दिया?” दोनों ने पीछे मुड़कर देखा तो आरती की मां ढेर सारे सामान और उपहारों के साथ खड़ी थीं। वह रिचा और उसकी नवजात बेटी के लिए सामान लेकर आई थीं।रिचा की आंखों से आंसू निकल पड़े।

आरती की मां ने उसे गले लगाते हुए कहा, “मेरे लिए जैसे आरती है, वैसे ही तुम भी हो। खबरदार, अगर अब कभी यह कहा कि तुम्हारा कोई मायका नहीं है। यह घर हमेशा तुम्हारा मायका रहेगा।”इन शब्दों ने रिचा के दिल को छू लिया। जिस कमी को वह वर्षों से अपने भीतर महसूस करती आई थी, उस दिन उसे लगा कि शायद अब वह कमी पूरी हो गई है।

रिश्ते खून से नहीं, अपनापन से बनते हैं

रिचा के लिए वह पल जिंदगी भर याद रहने वाला बन गया। उसने महसूस किया कि परिवार केवल खून के रिश्तों से नहीं बनता। कई बार जिंदगी में मिले लोग अपने प्यार, विश्वास और अपनापन से ऐसे रिश्ते बना देते हैं, जो जन्म से मिले रिश्तों से भी ज्यादा मजबूत हो जाते हैं।

जिस लड़की ने बचपन में माता-पिता का साया खो दिया था, उसे शादी के बाद एक ऐसा परिवार मिला, जहां उसे बेटी, बहन और मां जैसा स्नेह मिला। यह कहानी हमें याद दिलाती है कि सच्चा परिवार वही है, जहां किसी रिश्ते को निभाने के लिए खून का रिश्ता होना जरूरी नहीं, बल्कि दिल में अपनापन होना जरूरी है।

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