सूखी शरद
sookhee sharad
Sun, 4 Jan 2026
( लेखिका नीतू माथुर )
गुज़रते हैं दिन रात के पहरे से
शाम की चादर बिछी कोहरे से
ये धुंध जंजीर सी जकड़े हुए है
खामोशियां अंदर समेटे हुए है
कई कोशिशें कीं चुप्पी तोड़ने की
पीली किरणों से रोशनी बिखेरने की
धुंध है कि अब हटती नहीं
कहना इसे बहुत कुछ है,
मगर…. कुछ कहती नहीं…
मजबूर है हालातों से
घायल से अघातों से
सर्द और सूनी रातों से
भूली बिसरी आधी बातों से
क़ायदे का भी एक दौर था
जब शाम ढलने से शुरू तो
सूरज के लिहाफ़ में गुम होती थी
वो दिन कुछ और रात कुछ और होती थी
साँसों में सरगोशी थी बातों में नरमी
हर फ़िकर धुंआ बन निकलती थी
वो धुंध आज के कोहरे में गुम हो गयी
जाने किसकी चालाकी से दूर हो गयी
सूखी शरद में जब नमी समाये
मौसम की करवट भा जाये
पानी से धुंआ जब छँट जाए
ये धुंध भी समझ में आ जाए
( लेखिका नीतू माथुर )
