कहानी का सार: सद्गति

किशनलाल शर्मा द्वारा लिखित कहानी 'सद्गति' मानवीय संवेदनाओं, क्षमा और उच्च आचरण की एक मर्मस्पर्शी प्रस्तुति है। यह कहानी दो पुरुषों के चरित्र के माध्यम से समाज के दो विपरीत पहलुओं को उजागर करती है—एक ओर वह जो रिश्तों को कलंकित करता है, और दूसरी ओर वह जो मानवता को सर्वोच्च मानता है।
 
कहानी का सार: सद्गति

अतीत और वर्तमान का टकराव

कहानी की शुरुआत एक श्मशान घाट से होती है, जहाँ एक लावारिस लाश का अंतिम संस्कार किया जा रहा है। वहां मौजूद लोग सुरेश नाम के व्यक्ति की प्रशंसा कर रहे हैं, जिसने एक अनजान व्यक्ति की देह को दुर्गति से बचाकर उसका सम्मानजनक क्रिया-कर्म करने का बीड़ा उठाया। चिता के पास सुरेश की पत्नी गीतिका खड़ी है, जो उस मृत व्यक्ति की असलियत जानती है। वह लाश किसी अनजान की नहीं, बल्कि उसके पहले पति देवेन की है।

कहानी का सार: सद्गति

गीतिका का संघर्षमय अतीत

गीतिका एक मध्यमवर्गीय परिवार की बेटी थी। उसकी शादी देवेन से हुई थी, जो शुरुआत में तो शरीफ लगा, लेकिन बाद में जुआरी, सट्टेबाज और शराबी निकला। देवेन ने न केवल अपना और दहेज का पैसा उड़ाया, बल्कि अपनी वासना और शौक पूरे करने के लिए अपनी पत्नी गीतिका को एक बूढ़े सेठ के पास बेच दिया। देवेन के अत्याचारों और इस घिनौनी हरकत से टूटकर गीतिका ने ट्रेन के आगे कूदकर आत्महत्या करने की कोशिश की।

सुरेश: एक रक्षक और जीवनसाथी

आत्महत्या के उस क्षण में सुरेश (जो एक लेखक है) ने गीतिका की जान बचाई। उसने न केवल उसे सहारा दिया, बल्कि उसके दुखों को समझा और उसे समाज में मान-सम्मान दिलाया। सुरेश की प्रेरणा और प्रेम ने गीतिका के जीवन को बदल दिया। दोनों ने विवाह किया और एक सुखी जीवन जीने लगे।

मानवता की परीक्षा

कहानी में मोड़ तब आता है जब सुरेश और गीतिका मेरठ जा रहे होते हैं और रास्ते में उन्हें एक मृत व्यक्ति सड़क किनारे मिलता है। वह देवेन था। गीतिका के मन में देवेन के प्रति तीव्र नफरत थी, क्योंकि उसने उसे जीते जी नर्क दिया था। वह चाहती थी कि देवेन की लाश को जानवर नोचें।

परंतु, सुरेश का दृष्टिकोण अलग था। वह एक संवेदनशील लेखक और महान इंसान था। उसने तर्क दिया कि मृत्यु के साथ ही व्यक्ति के पाप भी समाप्त हो जाते हैं। उसने अपना महत्वपूर्ण सम्मान समारोह छोड़कर उस व्यक्ति का अंतिम संस्कार करने का निर्णय लिया, जिसने कभी उसकी पत्नी का जीवन बर्बाद करने की कोशिश की थी।

कहानी के अंत में गीतिका सुरेश के देवतुल्य व्यक्तित्व को देखकर दंग रह जाती है। जहाँ देवेन ने अपनी पत्नी को 'बेच' दिया था, वहीं सुरेश ने अपने 'शत्रु' (पत्नी के पूर्व शोषक) को भी सद्गति प्रदान की। यह कहानी संदेश देती है कि मनुष्य अपने कर्मों से छोटा या बड़ा बनता है और क्षमा एवं मानवता ही सर्वश्रेष्ठ धर्म है।

मुख्य विचार

  • चरित्र का अंतर: देवेन नीचता और पतन का प्रतीक है, जबकि सुरेश सज्जनता और नैतिकता का।

  • सद्गति का अर्थ: केवल मृत शरीर का दाह-संस्कार नहीं, बल्कि घृणा से मुक्ति और मानवता का विजय।

  • स्त्री का संघर्ष: गीतिका का पात्र समाज में घरेलू हिंसा और शोषण के खिलाफ एक मूक गवाह है।

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