उत्तर प्रदेश में गौशालाओं की दयनीय स्थिति: निरीक्षण के बाद भी क्यों नहीं बदलती तस्वीर?

The deplorable state of cow shelters in Uttar Pradesh: Why doesn't the situation change even after inspections?
 
उत्तर प्रदेश में गौशालाओं की दयनीय स्थिति: निरीक्षण के बाद भी क्यों नहीं बदलती तस्वीर?

अतिवीर जैन ‘पराग’, विभूति फीचर्स

उत्तर प्रदेश में गोवंश संरक्षण के लिए बड़ी संख्या में गौशालाएं संचालित की जा रही हैं। सरकार की ओर से इनके संचालन, चारा-पानी और पशुओं की देखभाल के लिए व्यवस्थाएं भी की जाती हैं। इसके बावजूद समय-समय पर गौशालाओं में गोवंश की मौत, चारे की कमी, गंदगी और इलाज में लापरवाही से जुड़े मामले सामने आते रहे हैं।

हाल के दिनों में बरेली के सीबीगंज स्थित कान्हा उपवन गौशाला में गोवंश की मौतों का मामला सामने आया। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, कुछ दिनों के भीतर कई गोवंशों की मौत हुई और मामले में सुपरवाइजर तथा भूसा सप्लायरों समेत चार लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई। प्रशासन और नगर निगम की ओर से निरीक्षण भी किया गया।

ऐसे मामलों के बाद सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि क्या किसी गौशाला में मौतों की खबर सामने आने के बाद ही प्रशासन सक्रिय होगा, या प्रदेश की सभी गौशालाओं की नियमित निगरानी की कोई स्थायी व्यवस्था भी है?

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क्या केवल निरीक्षण से बदल जाएगी तस्वीर?

जब किसी गौशाला में गोवंश की मौत की खबर सामने आती है तो मंत्री से लेकर अधिकारी तक मौके पर पहुंचते हैं। निरीक्षण होता है, व्यवस्थाओं को सुधारने के निर्देश दिए जाते हैं और कई बार जिम्मेदार कर्मचारियों पर कार्रवाई भी होती है।लेकिन असली परीक्षा निरीक्षण के बाद शुरू होती है।

क्या गौशाला में गोवंश को निर्धारित मात्रा में चारा मिल रहा है? क्या पीने के पानी की पर्याप्त व्यवस्था है? बीमार पशुओं की नियमित जांच हो रही है? सरकारी पशु चिकित्सक कितनी बार गौशाला का दौरा कर रहे हैं? इलाज के लिए आवश्यक दवाएं उपलब्ध हैं या नहीं? कमजोर और घायल गोवंश की अलग से देखभाल की जा रही है या नहीं?

इन सवालों का जवाब केवल कागजों में नहीं, बल्कि गौशालाओं की जमीनी स्थिति में दिखाई देना चाहिए।

बरेली की घटना ने फिर खड़े किए सवाल

बरेली के कान्हा उपवन में गोवंश की मौतों के बाद अव्यवस्थाओं को लेकर सवाल उठे। एक रिपोर्ट में गौशाला में गंदगी, कीचड़, कमजोर और घायल गोवंश तथा चारे-पानी से संबंधित समस्याओं के आरोपों का उल्लेख किया गया। वहीं प्रशासनिक पक्ष में कुछ अधिकारियों ने बीमारी को मौत का कारण बताया। यानी वास्तविक कारणों को लेकर अलग-अलग दावे सामने आए हैं और जांच तथा पोस्टमार्टम की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।

यही वजह है कि ऐसी घटनाओं में भावनाओं के बजाय पारदर्शी जांच और तथ्यात्मक रिपोर्ट सामने आना जरूरी है।

सड़कों पर घूमते गोवंश भी बड़ा सवाल

यदि सरकार की ओर से गौशालाओं का संचालन किया जा रहा है तो शहरों और राजमार्गों पर बड़ी संख्या में आवारा गोवंश क्यों दिखाई देते हैं?

मेरठ और बरेली जैसे शहरों में सड़कों पर गोवंश के झुंड कई बार यातायात के लिए परेशानी और दुर्घटना का कारण बनते हैं। इसका समाधान केवल पशुओं को पकड़कर गौशाला भेजना नहीं है। इसके लिए नगर निकाय, पशुपालन विभाग और स्थानीय प्रशासन के बीच नियमित समन्वय आवश्यक है।

साथ ही यह भी सुनिश्चित करना होगा कि नए गोवंश को गौशाला में भेजने के बाद उनके लिए पर्याप्त क्षमता, चारा, पानी और चिकित्सा सुविधा उपलब्ध हो।

हर जिले की गौशाला की हो नियमित निगरानी

प्रदेश की गौशालाओं की स्थिति सुधारने के लिए केवल आकस्मिक निरीक्षण पर्याप्त नहीं हो सकता। एक ऐसी व्यवस्था की जरूरत है जिसमें हर गौशाला की स्थिति की नियमित निगरानी हो।

प्रत्येक जिले से मासिक रिपोर्ट शासन को भेजी जा सकती है, जिसमें स्पष्ट रूप से दर्ज हो—

  • जिले में कुल कितनी गौशालाएं संचालित हैं।
  • प्रत्येक गौशाला में कितने गोवंश मौजूद हैं।
  • महीने की शुरुआत और अंत में गोवंशों की संख्या कितनी रही।
  • कितने नए गोवंश गौशाला में लाए गए।
  • कितने गोवंश की मृत्यु हुई और उसका कारण क्या था।
  • कितने पशुओं का उपचार किया गया।
  • पशु चिकित्सक ने कितनी बार निरीक्षण किया।
  • चारा, भूसा और पानी की उपलब्धता कैसी रही।
  • कितने आवारा गोवंश पकड़े गए और उन्हें कहां रखा गया।
  • गौशाला की क्षमता के मुकाबले वहां कितने पशु रखे गए हैं।

ऐसी रिपोर्ट को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर सार्वजनिक करने से जवाबदेही और पारदर्शिता दोनों बढ़ सकती हैं।

गौशालाओं की क्षमता बढ़ाना भी जरूरी

कई क्षेत्रों में आवारा गोवंश की संख्या और उपलब्ध गौशाला क्षमता के बीच अंतर हो सकता है। ऐसी स्थिति में केवल प्रशासन को दोष देने के बजाय दीर्घकालीन समाधान तलाशना होगा।

जहां जरूरत हो वहां नई गौशालाओं का निर्माण किया जाए। पुरानी गौशालाओं की क्षमता बढ़ाई जाए और वहां शेड, साफ पानी, चारा भंडारण, जल निकासी तथा उपचार की पर्याप्त व्यवस्था की जाए।

इस काम में स्थानीय समाज, सामाजिक संस्थाओं और दानदाताओं की भागीदारी भी ली जा सकती है। गोसेवा के प्रति समाज के एक बड़े वर्ग में रुचि है और पारदर्शी व्यवस्था होने पर लोग सहयोग के लिए आगे आ सकते हैं।

जवाबदेही तय करना भी उतना ही जरूरी

गौशाला में किसी गोवंश की मौत होना हमेशा लापरवाही का प्रमाण नहीं माना जा सकता। बीमारी, उम्र, दुर्घटना या अन्य चिकित्सकीय कारण भी हो सकते हैं। इसलिए प्रत्येक मौत की स्थिति में पशु चिकित्सकीय जांच और आवश्यक होने पर पोस्टमार्टम के आधार पर कारण दर्ज किया जाना चाहिए।

लेकिन यदि जांच में चारा-पानी की कमी, इलाज में लापरवाही, कुप्रबंधन या किसी अन्य स्तर पर जिम्मेदारी सामने आती है तो संबंधित व्यक्ति या संस्था के खिलाफ कार्रवाई भी होनी चाहिए।

हाल में बरेली के मामले में एफआईआर दर्ज होने के साथ ही प्रशासनिक स्तर पर निरीक्षण और कार्रवाई की खबरें सामने आईं। इससे यह स्पष्ट है कि शिकायत सामने आने पर तंत्र कार्रवाई कर सकता है, लेकिन स्थायी सुधार के लिए नियमित निगरानी अधिक महत्वपूर्ण है।

गोसेवा केवल भावनात्मक मुद्दा नहीं, प्रशासनिक जिम्मेदारी भी

गोवंश संरक्षण धार्मिक और सामाजिक भावनाओं से जुड़ा विषय जरूर है, लेकिन सरकारी गौशालाओं का संचालन मूल रूप से प्रशासनिक जिम्मेदारी भी है। इसलिए इसमें भावनाओं के साथ-साथ व्यवस्था, बजट, पारदर्शिता, चिकित्सा सुविधा और जवाबदेही का भी उतना ही महत्व है।

जरूरत इस बात की है कि किसी गौशाला में गोवंश की मौत के बाद कुछ दिनों तक सक्रियता दिखाने के बजाय पूरे साल निगरानी की व्यवस्था हो। यदि हर गौशाला की स्थिति की नियमित रिपोर्टिंग, स्वतंत्र निरीक्षण और जवाबदेही सुनिश्चित हो जाए तो बार-बार सामने आने वाली अव्यवस्थाओं पर काफी हद तक रोक लगाई जा सकती है।

गोवंश संरक्षण का वास्तविक अर्थ केवल गौशाला बनाना नहीं, बल्कि वहां रहने वाले प्रत्येक पशु को पर्याप्त भोजन, स्वच्छ पानी, सुरक्षित आश्रय और समय पर उपचार उपलब्ध कराना है। यही किसी भी गोशाला की सफलता की वास्तविक कसौटी होनी चाहिए।

— अतिवीर जैन ‘पराग’
विभूति फीचर्स

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