क्रांति के दो महानायक: महात्मा ज्योतिराव और सावित्रीबाई फुले, जिन्होंने समाज को दिखाई नई राह
(लेखिका: आरती चौगुले - विनायक फीचर्स)
भारतीय समाज सुधार के इतिहास में महात्मा ज्योतिराव फुले और सावित्रीबाई फुले के नाम स्वर्ण अक्षरों में अंकित हैं। रूढ़िवादिता, छुआछूत और अज्ञानता के घोर अंधकार में डूबे समाज में शिक्षा की ज्योति जलाने वाले इस दंपत्ति का योगदान अद्वितीय है। आज जब हम स्त्री शिक्षा की बात करते हैं, तो भारत की प्रथम महिला शिक्षिका सावित्रीबाई फुले और उनके मार्गदर्शक ज्योतिबा का स्मरण होना स्वाभाविक है।
ज्योतिबा का उदय और शिक्षा के प्रति अटूट लगन
ज्योतिराव फुले का जन्म 11 अप्रैल 1827 को महाराष्ट्र के सातारा जिले में हुआ था। फूलों के व्यवसाय के कारण उनका परिवार 'फुले' कहलाया। कुशाग्र बुद्धि के धनी ज्योतिबा ने समाज के कड़े विरोध के बावजूद 'स्कॉटिश मिशन स्कूल' से शिक्षा ग्रहण की। उस दौर में निम्न जातियों के लिए शिक्षा के द्वार बंद थे, लेकिन ज्योतिबा ने इन बेड़ियों को तोड़ने का संकल्प लिया।
सावित्रीबाई: एक निर्भीक सहचरी
मात्र 13 वर्ष की आयु में ज्योतिबा का विवाह 9 वर्षीय सावित्री से हुआ। सावित्रीबाई न केवल एक समर्पित पत्नी थीं, बल्कि वे अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाने वाली एक साहसी व्यक्तित्व की स्वामिनी थीं। ज्योतिबा ने सामाजिक बदलाव की शुरुआत अपने घर से की और सावित्रीबाई को शिक्षित बनाया।

यह सफर आसान नहीं था। जब सावित्रीबाई स्कूल पढ़ाने जातीं, तो रूढ़िवादी लोग उन पर पत्थर, कीचड़ और गोबर फेंकते थे। वे अपने साथ थैले में एक दूसरी साड़ी लेकर चलती थीं ताकि स्कूल पहुँचकर गंदी साड़ी बदल सकें। समाज की प्रताड़ना उन्हें अपने लक्ष्य से डिगा नहीं सकी।
सत्यशोधक समाज और सामाजिक क्रांति
ज्योतिबा ने 22 विद्यालयों की स्थापना की और 'सत्यशोधक समाज' के माध्यम से समाज के वंचित वर्गों को स्वाभिमान से जीने का मंत्र दिया। उन्होंने 'गुलामगिरी' जैसी कालजयी पुस्तक लिखकर सामाजिक असमानता पर कड़ा प्रहार किया।
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मानवतावादी दृष्टिकोण: अकाल के समय सावित्रीबाई ने हजारों लोगों को भोजन कराया।
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जातिवाद पर प्रहार: प्यासे अस्पृश्यों के लिए उन्होंने अपने घर का कुआँ खोल दिया, जो उस समय एक अत्यंत क्रांतिकारी कदम था।
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भ्रूण हत्या रोक थाम: उन्होंने अनाथ बच्चों के लिए आश्रम खोले और एक अनाथ बच्चे (यशवंत) को गोद लेकर उसे डॉक्टर बनाया।
अंतिम समय तक जनसेवा का व्रत
ज्योतिराव फुले के निधन के बाद भी सावित्रीबाई ने समाज सेवा का व्रत नहीं छोड़ा। उन्होंने पति की अर्थी को मुखाग्नि देकर सदियों पुरानी परंपरा को चुनौती दी। 1897 में जब महाराष्ट्र में प्लेग की महामारी फैली, तो 70 वर्षीय सावित्रीबाई स्वयं रोगियों की सेवा में जुट गईं। एक प्लेग पीड़ित बच्चे को अपने कंधे पर लादकर अस्पताल ले जाते समय वे स्वयं संक्रमित हो गईं और 10 मार्च 1897 को यह ममतामयी माँ अनंत में विलीन हो गई।
विरासत जो आज भी मार्ग प्रशस्त करती है
आज पुणे में 'सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय' और उनके संग्रहालय के रूप में उनकी विरासत जीवित है। जिस स्त्री शिक्षा का पौधा उन्होंने पत्थरों और गालियों के बीच लगाया था, वह आज एक विशाल वटवृक्ष बन चुका है।
महात्मा ज्योतिराव और सावित्रीबाई फुले का जीवन हमें सिखाता है कि सफलता के पीछे केवल परिश्रम नहीं, बल्कि एक-दूसरे का अटूट सहयोग और आदर्शों के प्रति समर्पण होता है। यह दंपत्ति समाज के लिए त्याग और बदलाव की एक ऐसी मशाल है, जो युगों-युगों तक प्रकाश फैलाती रहेगी।
