पुण्यतिथि विशेष: वीर सावरकर सशस्त्र क्रांति के नायक और सामाजिक समरसता के अग्रदूत
26 फरवरी को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के प्रखर नायक स्वातंत्र्य वीर विनायक दामोदर सावरकर की पुण्यतिथि है। सावरकर केवल एक क्रांतिकारी योद्धा ही नहीं थे, बल्कि वे एक दूरदर्शी समाज सुधारक भी थे जिन्होंने हिंदू समाज में व्याप्त छुआछूत और जातिवाद जैसी कुरीतियों पर कड़ा प्रहार किया।
लेखक: प्रताप नारायण मिश्र (विनायक फीचर्स)
इतिहास में कुछ महापुरुष ऐसे होते हैं जिनके विचार और कार्य उन्हें कालजयी बना देते हैं। स्वातंत्र्य वीर विनायक दामोदर सावरकर एक ऐसे ही महामानव थे। साहस, निर्भीकता और प्रचंड आत्मविश्वास के धनी सावरकर का जीवन एक ऐसा प्रकाशस्तम्भ है, जो आज भी राष्ट्रभक्ति और सामाजिक समरसता का मार्ग प्रशस्त करता है।
विश्व के एकमात्र क्रांतिकारी: दो जन्मों का कारावास
सावरकर संभवतः विश्व के एकमात्र ऐसे स्वतंत्रता सेनानी थे, जिन्हें ब्रिटिश सरकार ने 1910 में दो जन्मों (55 वर्ष) के आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। अंडमान की सेल्यूलर जेल (कालापानी) की अमानवीय यातनाएं भी उनके हौसलों को नहीं तोड़ सकीं। जब आयरिश जेलर ने उनसे पूछा कि "क्या तुम इतने वर्षों तक जीवित रहोगे?", तब सावरकर ने पूरे आत्मविश्वास से उत्तर दिया— "मैं तो जीवित रहूँगा ही, लेकिन मेरी आँखें भारत की भूमि से ब्रिटिश साम्राज्य का खात्मा होते हुए भी देखेंगी।" और इतिहास गवाह है कि उनकी यह भविष्यवाणी सत्य सिद्ध हुई।
सामाजिक क्रांति के सूत्रधार
सावरकर का व्यक्तित्व केवल सशस्त्र संघर्ष तक सीमित नहीं था। जेल से रिहा होकर रत्नागिरि में नजरबंदी के दौरान (1924-1937) उन्होंने समाज सुधार की जो मशाल जलाई, वह अद्वितीय थी। उन्होंने स्पष्ट कहा कि जाति-भेद और अस्पृश्यता समाज के लिए कोढ़ के समान हैं।
-
मानवीय समानता का आह्वान: सावरकर ने हिंदू समाज की विडंबना पर चोट करते हुए कहा कि जो लोग घर में बिल्ली और कुत्ते को गोद में बैठा सकते हैं, वे अपने ही समाज के बंधुओं के स्पर्श से अपवित्र कैसे हो सकते हैं?
-
पतित पावन मंदिर: रत्नागिरि में उन्होंने 'पतित पावन मंदिर' की स्थापना की, जहाँ बिना किसी भेदभाव के सभी जातियों के लोग एक साथ पूजा-अर्चना और सहभोज (झुनका-भाखरी आंदोलन) करते थे।
-
सात बेड़ियों को तोड़ने का आह्वान: सावरकर ने हिंदू समाज को जकड़ने वाली सात कुरीतियों (वेदोक्त बंदी, व्यवसाय बंदी, स्पर्श बंदी, सिंधु बंदी, शुद्धि बंदी, रोटी बंदी और बेटी बंदी) को जड़ से उखाड़ने का आह्वान किया।
धर्म हृदय में है, पेट में नहीं
सावरकर का मानना था कि धर्म की रक्षा कर्मों से होती है, रूढ़ियों से नहीं। उन्होंने शुद्धि आंदोलन को तेज गति प्रदान की ताकि जो लोग छल-कपट से धर्मांतरित किए गए थे, वे ससम्मान अपने मूल धर्म में वापस लौट सकें। उन्होंने तर्क दिया कि "जन्म से कोई ऊँचा या नीचा नहीं होता, व्यक्ति अपने सुकर्मों और कुकर्मों से श्रेष्ठ या अधम बनता है।" वाल्मीकि, रैदास और तुकाराम जैसे संतों का उदाहरण देकर उन्होंने सिद्ध किया कि महत्ता कुल से नहीं, कर्म से मिलती है।
महाप्रयाण: इच्छा मृत्यु का वरण
26 फरवरी 1966 को इस राष्ट्रपुरुष ने स्वेच्छा से अन्न-जल त्याग कर (प्रायोपवेशन) महाप्रयाण किया। उन्हें आभास हो गया था कि उनके जीवन का उद्देश्य पूर्ण हो चुका है। सावरकर का जीवन हमें सिखाता है कि राष्ट्र की एकता के लिए आंतरिक सामाजिक सुधार उतने ही आवश्यक हैं जितने बाहरी शत्रुओं से सुरक्षा।
