जब मृत्युशैया पर पड़े दुर्योधन ने श्री कृष्ण को कहा पापी को मिला करारा जवाब

When Duryodhana, lying on his deathbed, spoke to Lord Krishna—the sinner received a scathing reply.
 
दुर्योधन के आरोप: 'माधव, तुमसे बड़ा छल कपटी कोई नहीं' मरते समय दुर्योधन का क्रोध शांत नहीं हुआ था। उसने श्री कृष्ण को देखते ही चीखकर कहा, "हे माधव! इस विनाशकारी युद्ध में तुमसे बड़ा पापी और कोई नहीं है। तुमने पग-पग पर मर्यादा तोड़ी और अपनी माया से कुरुवंश के अजेय योद्धाओं का वध छलपूर्वक करवाया।"  दुर्योधन ने अपनी तर्कों की झड़ी लगाते हुए पांडवों की जीत को 'अनैतिक' बताया:  गुरु द्रोण: "अश्वत्थामा की मृत्यु का झूठा समाचार फैलाकर तुमने मेरे निहत्थे गुरु का वध करवाया।"  पितामह भीष्म: "शिखंडी की ओट लेकर तुमने उस योद्धा को गिरवाया जिसने शस्त्र त्याग दिए थे।"  जयद्रथ: "अपनी माया से सूर्य को बादलों में छिपाकर तुमने जयद्रथ के साथ छल किया।"  कर्ण: "मेरे परम मित्र और महादानी कर्ण को तब मरवा दिया जब वह निहत्था अपने रथ का पहिया निकाल रहा था।"  श्री कृष्ण का उत्तर: 'जब पाप की सीढ़ियाँ चढ़ी थीं, तब धर्म कहाँ था?' दुर्योधन की बातें सुनकर श्री कृष्ण विचलित नहीं हुए, बल्कि उन्होंने मुस्कराते हुए उसे जीवन भर के कुकर्मों का आइना दिखाया। श्री कृष्ण ने कहा, "हे दुर्योधन! तुम अधर्म की उस ऊंचाई पर खड़े हो जहाँ से तुम्हें धर्म की परिभाषा समझ नहीं आ सकती। तुमने अपने जीवन में धर्म की मर्यादा को इतनी बार कुचला कि अब न्याय की बात करना तुम्हें शोभा नहीं देता।"  श्री कृष्ण ने दुर्योधन के पापों की सूची गिनाई:  द्रौपदी का अपमान: "भरी सभा में जब एक असहाय स्त्री का चीरहरण हो रहा था और तुम निर्लज्ज होकर हंस रहे थे, क्या वह धर्म था?"  लाक्षागृह का षड्यंत्र: "अपने ही भाइयों को जलाकर मार देने की साज़िश रचना क्या वीरता थी?"  शकुनि का छल: "मामा शकुनि के साथ मिलकर चौसर के खेल में पांडवों का राज्य छीनना क्या न्यायपूर्ण था?"  अभिमन्यु का वध: "युद्ध के सभी नियमों को ताक पर रखकर तुम सात महारथियों ने मिलकर एक निहत्थे बालक को मार डाला, क्या वह धर्म था?"  निष्कर्ष: 'अधर्म के नाश के लिए छल भी धर्म है' भगवान श्री कृष्ण ने स्पष्ट किया कि जब अधर्म अपने चरम पर हो और शत्रु सारे नियम तोड़ चुका हो, तो उसे समाप्त करने के लिए अपनाई गई युक्ति 'पाप' नहीं बल्कि 'न्याय' कहलाती है। दुर्योधन के पापों का घड़ा इतना भर चुका था कि उसकी मृत्यु के लिए किए गए ये 'छल' वास्तव में उस महापाप के सामने कुछ भी नहीं थे।
कुरुक्षेत्र का युद्ध केवल शस्त्रों का नहीं, बल्कि सिद्धांतों का भी युद्ध था। जब भीम के प्रहार से पराजित होकर दुर्योधन मृत्यु की प्रतीक्षा कर रहा था, तब उसने भगवान श्री कृष्ण पर छल के गंभीर आरोप लगाए। यह संवाद आज भी धर्म और अधर्म के बीच की सूक्ष्म रेखा को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।

दुर्योधन के आरोप: 'माधव, तुमसे बड़ा छल कपटी कोई नहीं'

मरते समय दुर्योधन का क्रोध शांत नहीं हुआ था। उसने श्री कृष्ण को देखते ही चीखकर कहा, "हे माधव! इस विनाशकारी युद्ध में तुमसे बड़ा पापी और कोई नहीं है। तुमने पग-पग पर मर्यादा तोड़ी और अपनी माया से कुरुवंश के अजेय योद्धाओं का वध छलपूर्वक करवाया।"

दुर्योधन ने अपनी तर्कों की झड़ी लगाते हुए पांडवों की जीत को 'अनैतिक' बताया:

  1. गुरु द्रोण: "अश्वत्थामा की मृत्यु का झूठा समाचार फैलाकर तुमने मेरे निहत्थे गुरु का वध करवाया।"

  2. पितामह भीष्म: "शिखंडी की ओट लेकर तुमने उस योद्धा को गिरवाया जिसने शस्त्र त्याग दिए थे।"

  3. जयद्रथ: "अपनी माया से सूर्य को बादलों में छिपाकर तुमने जयद्रथ के साथ छल किया।"

  4. कर्ण: "मेरे परम मित्र और महादानी कर्ण को तब मरवा दिया जब वह निहत्था अपने रथ का पहिया निकाल रहा था।"

श्री कृष्ण का उत्तर: 'जब पाप की सीढ़ियाँ चढ़ी थीं, तब धर्म कहाँ था?'

दुर्योधन की बातें सुनकर श्री कृष्ण विचलित नहीं हुए, बल्कि उन्होंने मुस्कराते हुए उसे जीवन भर के कुकर्मों का आइना दिखाया। श्री कृष्ण ने कहा, "हे दुर्योधन! तुम अधर्म की उस ऊंचाई पर खड़े हो जहाँ से तुम्हें धर्म की परिभाषा समझ नहीं आ सकती। तुमने अपने जीवन में धर्म की मर्यादा को इतनी बार कुचला कि अब न्याय की बात करना तुम्हें शोभा नहीं देता।"

श्री कृष्ण ने दुर्योधन के पापों की सूची गिनाई:

  • द्रौपदी का अपमान: "भरी सभा में जब एक असहाय स्त्री का चीरहरण हो रहा था और तुम निर्लज्ज होकर हंस रहे थे, क्या वह धर्म था?"

  • लाक्षागृह का षड्यंत्र: "अपने ही भाइयों को जलाकर मार देने की साज़िश रचना क्या वीरता थी?"

  • शकुनि का छल: "मामा शकुनि के साथ मिलकर चौसर के खेल में पांडवों का राज्य छीनना क्या न्यायपूर्ण था?"

  • अभिमन्यु का वध: "युद्ध के सभी नियमों को ताक पर रखकर तुम सात महारथियों ने मिलकर एक निहत्थे बालक को मार डाला, क्या वह धर्म था?"

अधर्म के नाश के लिए छल भी धर्म है'

भगवान श्री कृष्ण ने स्पष्ट किया कि जब अधर्म अपने चरम पर हो और शत्रु सारे नियम तोड़ चुका हो, तो उसे समाप्त करने के लिए अपनाई गई युक्ति 'पाप' नहीं बल्कि 'न्याय' कहलाती है। दुर्योधन के पापों का घड़ा इतना भर चुका था कि उसकी मृत्यु के लिए किए गए ये 'छल' वास्तव में उस महापाप के सामने कुछ भी नहीं थे।

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