महिला दिवस विशेष: स्त्री के प्रति केवल कानून नहीं, समाज की 'आंतरिक दृष्टि' बदलने की है जरूरत
(आलेख: डॉ. राघवेंद्र शर्मा)
जब भी महिला दिवस आता है, चर्चा अक्सर आर्थिक स्वावलंबन और कार्यक्षेत्र में उनकी हिस्सेदारी तक सिमट कर रह जाती है। निस्संदेह, वित्तीय स्वतंत्रता महत्वपूर्ण है, लेकिन क्या केवल पैसा कमाना ही स्त्री की प्रगति का अंतिम पैमाना है? वास्तव में, महिलाओं का सच्चा सशक्तिकरण तब तक अधूरा है, जब तक समाज उन्हें वह सम्मान और गरिमा प्रदान नहीं करता जिसकी वे जन्मजात अधिकारी हैं।
संकीर्ण मानसिकता का त्याग आवश्यक
आज के दौर की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि आधुनिकता के नाम पर स्त्री को अक्सर केवल 'उपभोग की इकाई' मान लिया जाता है। इस संकीर्ण सोच को बदलने की जरूरत है। स्त्री परिवार की वह धुरी है, जिसके इर्द-गिर्द संस्कार और कुटुंब का अस्तित्व घूमता है। लेकिन यह सम्मान केवल बाहरी जगत या दफ्तरों तक सीमित नहीं होना चाहिए; इसकी शुरुआत घर की चारदीवारी के भीतर से होनी चाहिए।
स्त्री ही बने स्त्री की शक्ति
सशक्तिकरण का एक पहलू आत्म-अवलोकन भी है। घर के भीतर सास, बहू, ननद और भाभी जैसे रिश्तों में जब एक महिला दूसरी महिला की ताकत बनती है, तभी नारी शक्ति की सार्थकता सिद्ध होती है। आपसी ईर्ष्या और द्वेष के स्थान पर यदि आत्मीयता का भाव हो, तो परिवार स्वर्ग बन जाता है। दुर्भाग्यवश, कुछ 'प्रगतिशील' कहलाने वाले लोग आज स्त्री और पुरुष को एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी के रूप में खड़ा कर रहे हैं, जबकि भारतीय संस्कृति मानती है कि वे एक-दूसरे के प्रतिस्पर्धी नहीं, बल्कि पूरक हैं।
सनातन संस्कृति में 'शक्ति' का स्थान
हमारी जड़ों में स्त्री को सदैव प्राथमिकता दी गई है। हमारे आराध्य देवों के नाम इसका प्रमाण हैं—हम 'सीताराम' कहते हैं, 'राधेश्याम' और 'गौरीशंकर' कहते हैं। यह क्रम दर्शाता है कि शक्ति के बिना शिव भी अपूर्ण हैं। ममता, सेवा और समर्पण नारी के वे आभूषण हैं जो उसे विशिष्ट बनाते हैं। इन गुणों को कमजोरी समझना आधुनिकता का सबसे बड़ा भ्रम है।
दूसरी ओर, पुरुष वर्ग को भी अपनी मानसिकता में विस्तार करने की आवश्यकता है। पुरुष का उत्तरदायित्व केवल धनार्जन नहीं, बल्कि स्त्री के मान-सम्मान का रक्षक बनना भी है। उन्हें स्त्रियों के प्रति अधिक उदार और सुरक्षात्मक दृष्टिकोण अपनाना होगा।
चाबियों का गुच्छा और अटूट विश्वास
हमारे इतिहास और लोक-परंपराओं में घर की बुजुर्ग महिलाओं के पल्लुओं में बंधी तिजोरियों की चाबियां केवल आर्थिक नियंत्रण का नहीं, बल्कि 'घर की लक्ष्मी' पर अटूट विश्वास का प्रतीक थीं। आज हमें उन्हीं सनातन संस्कारों की ओर लौटने की आवश्यकता है, जहाँ पत्नी के अतिरिक्त विश्व की समस्त महिलाओं को माँ, बहन और बेटी के रूप में देखा जाता है।
जिस दिन हम स्त्री को शरीर से परे एक 'आत्मा' और 'शक्ति' के रूप में देखना शुरू कर देंगे, उस दिन महिला दिवस मनाने की औपचारिकता स्वतः समाप्त हो जाएगी। नारी शक्ति का सच्चा जागरण ही राष्ट्र और विश्व कल्याण का आधार है। जहाँ नारी का सम्मान होता है, वहाँ दैवीय शक्तियों का वास होता है—इस शाश्वत सत्य को आत्मसात करना ही आज के समय की मांग है।

