जब “बस चिपका लेना” भी सपना था: जया बच्चन ने पीरियड्स से जुड़ा एक अनकहा सच साझा किया

 
aya Bachchans Shocking Confession: "Back Then We Wrapped 4 Towels... Now Just Stick It!" Periods in Old Bollywood

दोस्तों, क्या आपने कभी सोचा है कि आज की लड़कियां जिन सुविधाओं को “नॉर्मल” मानती हैं, वो कभी किसी के लिए सपना हुआ करती थीं?
आज पैड चिपकाया, बैग में रखा और आराम से काम पर निकल गए। लेकिन हमारी मां और नानियों के दौर में पीरियड्स सिर्फ शारीरिक तकलीफ नहीं थे, बल्कि शर्म, डर और चुप्पी का बोझ भी थे। हाल ही में बॉलीवुड की दिग्गज अभिनेत्री और राज्यसभा सांसद जया बच्चन ने अपनी नातिन नव्या नवेली नंदा के पॉडकास्ट में ऐसा खुलासा किया, जिसने इस पूरे सच को फिर से सामने ला दिया।

जया बच्चन ने अपने शुरुआती करियर के दिनों को याद करते हुए बताया कि तब आउटडोर शूटिंग के दौरान वैनिटी वैन जैसी कोई चीज़ नहीं होती थी। न अलग टॉयलेट, न बदलने की जगह, न कोई प्राइवेसी। कपड़े बदलने तक के लिए झाड़ियों का सहारा लेना पड़ता था। और जब पीरियड्स होते थे, तो हालात और भी मुश्किल हो जाते थे। उन्होंने कहा, “हम झाड़ियों के पीछे ही सैनिटरी पैड बदलते थे। बहुत शर्म आती थी।”
सोचिए दोस्तों, चारों तरफ लोग हों, पूरी यूनिट मौजूद हो, और आपको छुप-छुपाकर अपनी सबसे निजी जरूरत संभालनी पड़े — कितना अपमानजनक और दर्दनाक रहा होगा।

जया जी ने ये भी बताया कि उस समय के सैनिटरी पैड आज जैसे नहीं होते थे। आज तो बस पैड निकाला, चिपकाया और हो गया। लेकिन तब पैड में लूप्स होते थे, जिन्हें बेल्ट से बांधकर शरीर से जोड़ा जाता था। ज़रा सी भी हलचल में डर बना रहता था कि कहीं कुछ गड़बड़ न हो जाए। ऊपर से कई बार पैड की जगह 3-4, यहां तक कि 4-5 मोटे टॉवल लपेटने पड़ते थे। उन्होंने खुद सवाल किया, “क्या आप इमेजिन कर सकते हैं कि 4-5 टॉवल के साथ बैठना कितना अजीब और असहज होता होगा?”

सबसे दुखद बात ये थी कि इस्तेमाल किए गए पैड या टॉवल को वहीं फेंकने की भी इजाज़त नहीं थी। जया बच्चन ने बताया कि वो उन्हें प्लास्टिक बैग में रखकर घर तक लाती थीं और फिर फेंकती थीं। ये सिर्फ सफाई की बात नहीं थी, ये उस समाज की सोच थी, जहां पीरियड्स को गंदा और शर्मनाक माना जाता था। महिलाएं दर्द में भी मुस्कुराकर काम करती रहीं, क्योंकि बोलने की जगह ही नहीं थी।

जया बच्चन ने साफ कहा कि वो दौर बहुत बुरा था। उन्होंने “शर्म” शब्द को बार-बार दोहराया। और फिर एक लाइन में आज और तब का फर्क बता दिया — “आज तो बस चिपका लिया जाता है।”
ये लाइन सुनने में साधारण लगती है, लेकिन इसके पीछे दशकों का संघर्ष, चुप्पी और सहनशीलता छिपी है। आज की लड़कियों के पास डिस्पोज़ेबल पैड हैं, प्राइवेसी है, टॉयलेट्स हैं, वैनिटी वैन हैं। लेकिन ये सब यूं ही नहीं मिला, किसी ने बिना शिकायत किए रास्ता बनाया है।

दोस्तों, जया बच्चन आज राजनीति में सक्रिय हैं, समाजवादी पार्टी की ओर से राज्यसभा सांसद हैं और अपनी बेबाकी के लिए जानी जाती हैं। लेकिन इस बार उन्होंने राजनीति नहीं, महिलाओं का दर्द साझा किया। ये बयान सिर्फ एक सेलिब्रिटी का नहीं, बल्कि उस पूरी पीढ़ी का है जिसने पीरियड्स को चुपचाप झेला। आज हम पीरियड लीव, फ्री पैड्स और अवेयरनेस की बात करते हैं — ये सब उसी सफर का नतीजा है।

फिर भी सच्चाई ये है कि आज भी देश के कई हिस्सों में लड़कियां स्कूल-कॉलेज में शर्मिंदगी महसूस करती हैं। आज भी पीरियड्स पर फुसफुसाहट होती है। ऐसे में जया बच्चन का ये खुलासा बहुत ज़रूरी है, क्योंकि ये हमें याद दिलाता है कि संवेदनशीलता और सम्मान अभी भी सीखने की जरूरत है।

तो दोस्तों, आप क्या सोचते हैं? क्या आज की पीढ़ी को इन कहानियों को जानना चाहिए? क्या इससे सोच बदलेगी? कमेंट में अपनी राय ज़रूर बताइए। 

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