फिल्मों पर छिड़े 'बॉयकॉट' युद्ध के बीच कंगना रनौत ने तोड़ी चुप्पी
कला का मकसद सिर्फ मनोरंजन नहीं: कंगना
'क्वीन' और 'तनु वेड्स मनु' जैसी फिल्मों से अपनी एक्टिंग का लोहा मनवाने वाली कंगना का कहना है कि किसी भी फिल्म या कलाकृति से आपकी असहमति होना बिल्कुल स्वाभाविक है। लेकिन, असहमति का मतलब उसे पूरी तरह 'बैन' करना या लोगों को उसे देखने से रोकना नहीं होना चाहिए।
कंगना के मुताबिक कला, चाहे वह फिल्म हो या किताब, उसका उद्देश्य केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं है। उसका काम समाज में एक चर्चा (Dialogue) की शुरुआत करना है। अगर आपको कुछ पसंद नहीं आता, तो उस पर बहस कीजिए, रिव्यू लिखिए, लेकिन नफरत का माहौल बनाकर उसे बंद करने की मांग करना लोकतंत्र के खिलाफ है।"
इतिहास और नजरिया: मणिकर्णिका का उदाहरण
कंगना ने अपनी चर्चित फिल्म 'मणिकर्णिका: द क्वीन ऑफ झांसी' का जिक्र करते हुए कहा कि फिल्में हमें इतिहास और संघर्ष को एक नए नजरिए से देखने का मौका देती हैं। हर कहानीकार का अपना एक विजन होता है, जिसे सुनने और समझने का मौका दर्शकों को मिलना चाहिए। उन्होंने साफ किया कि अगर हम हर असहमत विचार को दबाने लगेंगे, तो लोकतंत्र में 'स्वतंत्र संवाद' की जगह खत्म हो जाएगी।
हॉलीवुड की चर्चा और भविष्य के फैसले
फिल्म 'धाकड़' के बाद कंगना को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी नोटिस किया गया है। हॉलीवुड से मिल रहे ऑफर्स पर उन्होंने स्पष्ट किया कि कुछ प्रोजेक्ट्स को लेकर बातचीत जरूर हुई है, लेकिन वह किसी भी विदेशी प्रोजेक्ट को करने में जल्दबाजी नहीं दिखाएंगी। वह केवल उन्हीं कहानियों को चुनेंगी जो उनके दिल के करीब होंगी और जिनके लिए वह पर्याप्त समय दे पाएंगी।
दर्शक और बॉक्स ऑफिस ही अंतिम जज
कंगना का संदेश स्पष्ट है— फिल्मों को बहस का हिस्सा बनाइए, बहिष्कार का नहीं। उनका मानना है कि अंततः दर्शक ही सबसे बड़े जज होते हैं। अगर फिल्म में दम होगा, तो वह विरोध के बावजूद चलेगी, और अगर वह कमजोर होगी, तो बॉक्स ऑफिस खुद-ब-खुद उसका फैसला कर देगा।
