Oh My Dog Movie Review: बेजुबानों की वफादारी और इंसानी लालच के बीच झूलती एक भावुक दास्तान, पंकज त्रिपाठी से ज्यादा महफिल लूट ले गया 'ऑस्कर

Oh My Dog Movie Review: An emotional tale balancing the loyalty of voiceless creatures against human greed; 'Oscar' steals the show, even outshining Pankaj Tripathi.
 
कहानी  फिल्म की शुरुआत असम के डिब्रूगढ़ से होती है, जहां पुलिस विभाग अपनी बहादुर खोजी कुतिया सेनापति को अंतिम विदाई देता है। उसकी मृत्यु के बाद उसके दो बच्चे—मोमो और ऑस्कर—अलग-अलग परिवारों और परिस्थितियों में पहुंच जाते हैं।  मोमो असम में एक परिवार का प्यारा सदस्य बन जाता है, जबकि ऑस्कर बिहार में रहने वाले बाल मजदूर प्रिंस का सबसे करीबी साथी होता है। दोनों की जिंदगी तब बदल जाती है, जब मोमो का अपहरण हो जाता है और दूसरी ओर प्रिंस रहस्यमय परिस्थितियों में लापता हो जाता है।  इसके बाद कहानी दो समानांतर खोज अभियानों में बदल जाती है। एक तरफ छोटा बच्चा अपने पालतू कुत्ते की तलाश करता है, तो दूसरी तरफ ऑस्कर अपने मालिक को खोजने के लिए हर खतरे का सामना करता है। इसी सफर में कई सामाजिक अपराधों और कड़वी सच्चाइयों की परतें खुलती हैं।  निर्देशन  अमित राय ने फिल्म को केवल भावनात्मक कहानी तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसमें थ्रिल, ड्रामा और सामाजिक संदेश का संतुलित मिश्रण देने की कोशिश की है। बच्चों और जानवरों से प्रभावी अभिनय करवाना आसान नहीं होता, लेकिन निर्देशक इस चुनौती में काफी हद तक सफल दिखाई देते हैं।  हालांकि, फिल्म कई सामाजिक मुद्दों को एक साथ समेटने की कोशिश में कहीं-कहीं बिखर जाती है। यदि कहानी को थोड़ा अधिक केंद्रित रखा जाता और कुछ उपकथाओं को सीमित किया जाता, तो इसका प्रभाव और गहरा हो सकता था।  अभिनय  फिल्म का सबसे बड़ा आकर्षण इंसानी कलाकार नहीं, बल्कि ऑस्कर का किरदार निभाने वाला प्रशिक्षित कुत्ता है। उसकी बॉडी लैंग्वेज, भाव-भंगिमाएं और अपने मालिक के प्रति वफादारी हर दृश्य को जीवंत बना देती है। कई मौकों पर वह बड़े कलाकारों से भी अधिक प्रभाव छोड़ता है।  बाल कलाकार माही राय ने अपने किरदार को आत्मविश्वास और सहजता के साथ निभाया है। वहीं पंकज त्रिपाठी छोटी भूमिका में भी अपनी सादगी और संवाद अदायगी से प्रभावित करते हैं। राजेश कुमार, पवन मल्होत्रा, गीता अग्रवाल, सुलक्षणा बरुआ और निखिल कुमार ने भी अपने-अपने किरदारों के साथ न्याय किया है।  तकनीकी पक्ष  फिल्म की सिनेमैटोग्राफी इसकी सबसे बड़ी ताकतों में से एक है। असम और बिहार के प्राकृतिक तथा वास्तविक परिवेश को प्रभावशाली ढंग से फिल्माया गया है। कई दृश्य कुत्ते के दृष्टिकोण से शूट किए गए हैं, जिससे दर्शक कहानी का हिस्सा महसूस करते हैं।  बैकग्राउंड स्कोर फिल्म के भावनात्मक और रोमांचक दृश्यों को मजबूती देता है, लेकिन गीत यादगार नहीं बन पाते। लगभग ढाई घंटे का रनटाइम फिल्म की गति को प्रभावित करता है और कुछ हिस्से अनावश्यक रूप से लंबे महसूस होते हैं।  फिल्म की खूबियां इंसान और पालतू जानवर के रिश्ते को भावनात्मक तरीके से प्रस्तुत करती है। ऑस्कर का शानदार स्क्रीन प्रेजेंस पूरी फिल्म की जान है। पशु क्रूरता, बाल श्रम और अंग तस्करी जैसे गंभीर मुद्दों पर ध्यान आकर्षित करती है। परिवार के साथ देखने योग्य संवेदनशील फिल्म। कमजोर पक्ष कहानी कई स्थानों पर जरूरत से ज्यादा लंबी लगती है। कुछ दृश्य और घटनाएं दोहराव का अहसास कराती हैं। कुछ किरदारों का चित्रण रूढ़िवादी और अतिनाटकीय लगता है। पटकथा दूसरे भाग में थोड़ी धीमी पड़ जाती है। अंतिम फैसला  'ओह माय डॉग' तकनीकी रूप से परफेक्ट फिल्म नहीं है, लेकिन इसकी भावनात्मक अपील इसे खास बनाती है। यह फिल्म बताती है कि वफादारी, प्रेम और अपनापन किसी भाषा के मोहताज नहीं होते। यदि आपको इंसान और जानवर के रिश्ते पर आधारित '777 चार्ली', 'तेरी मेहरबानियां' या 'चिल्लर पार्टी' जैसी फिल्में पसंद हैं, तो यह फिल्म भी आपको जरूर पसंद आएगी।  अंतिम रेटिंग: 3/5 स्टार  भावुक कहानी, दमदार संदेश और चार पैरों वाले हीरो ऑस्कर की शानदार मौजूदगी के कारण यह फिल्म एक बार जरूर देखी जा सकती है, खासकर उन दर्शकों के लिए जो परिवार के साथ संवेदनशील और दिल को छू लेने वाली कहानी देखना चाहते हैं।

Oh My Dog Film Review: 'ओएमजी 2' जैसी सुपरहिट और सामाजिक संदेश देने वाली फिल्म के बाद निर्देशक अमित राय एक बार फिर एक बेहद अलग और संवेदनशील विषय लेकर दर्शकों के सामने आए हैं। 7 अगस्त 2026 को सिनेमाघरों में रिलीज हुई फिल्म 'ओह माय डॉग' (Oh My Dog) इंसानों और बेजुबान जानवरों के बीच के निस्वार्थ प्यार, वफादारी और समाज के कड़वे सच को उजागर करने वाली एक इमोशनल मिस्ट्री-ड्रामा फिल्म है।

यद्यपि फिल्म की स्क्रीनप्ले थोड़ी लंबी और धीमी है, लेकिन इसके मुख्य हीरो 'ऑस्कर' (चार पैरों वाले कुत्ते) का जबरदस्त स्वैग, मासूमियत और एक्शन दर्शकों का दिल जीत लेता है। आइए जानते हैं कैसा है फिल्म का पूरा रिव्यू

कहानी

फिल्म की शुरुआत असम के डिब्रूगढ़ से होती है, जहां पुलिस विभाग अपनी बहादुर खोजी कुतिया सेनापति को अंतिम विदाई देता है। उसकी मृत्यु के बाद उसके दो बच्चे—मोमो और ऑस्कर—अलग-अलग परिवारों और परिस्थितियों में पहुंच जाते हैं।

मोमो असम में एक परिवार का प्यारा सदस्य बन जाता है, जबकि ऑस्कर बिहार में रहने वाले बाल मजदूर प्रिंस का सबसे करीबी साथी होता है। दोनों की जिंदगी तब बदल जाती है, जब मोमो का अपहरण हो जाता है और दूसरी ओर प्रिंस रहस्यमय परिस्थितियों में लापता हो जाता है।

इसके बाद कहानी दो समानांतर खोज अभियानों में बदल जाती है। एक तरफ छोटा बच्चा अपने पालतू कुत्ते की तलाश करता है, तो दूसरी तरफ ऑस्कर अपने मालिक को खोजने के लिए हर खतरे का सामना करता है। इसी सफर में कई सामाजिक अपराधों और कड़वी सच्चाइयों की परतें खुलती हैं।

निर्देशन

अमित राय ने फिल्म को केवल भावनात्मक कहानी तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसमें थ्रिल, ड्रामा और सामाजिक संदेश का संतुलित मिश्रण देने की कोशिश की है। बच्चों और जानवरों से प्रभावी अभिनय करवाना आसान नहीं होता, लेकिन निर्देशक इस चुनौती में काफी हद तक सफल दिखाई देते हैं।

हालांकि, फिल्म कई सामाजिक मुद्दों को एक साथ समेटने की कोशिश में कहीं-कहीं बिखर जाती है। यदि कहानी को थोड़ा अधिक केंद्रित रखा जाता और कुछ उपकथाओं को सीमित किया जाता, तो इसका प्रभाव और गहरा हो सकता था।

अभिनय

फिल्म का सबसे बड़ा आकर्षण इंसानी कलाकार नहीं, बल्कि ऑस्कर का किरदार निभाने वाला प्रशिक्षित कुत्ता है। उसकी बॉडी लैंग्वेज, भाव-भंगिमाएं और अपने मालिक के प्रति वफादारी हर दृश्य को जीवंत बना देती है। कई मौकों पर वह बड़े कलाकारों से भी अधिक प्रभाव छोड़ता है।

बाल कलाकार माही राय ने अपने किरदार को आत्मविश्वास और सहजता के साथ निभाया है। वहीं पंकज त्रिपाठी छोटी भूमिका में भी अपनी सादगी और संवाद अदायगी से प्रभावित करते हैं। राजेश कुमार, पवन मल्होत्रा, गीता अग्रवाल, सुलक्षणा बरुआ और निखिल कुमार ने भी अपने-अपने किरदारों के साथ न्याय किया है।

तकनीकी पक्ष

फिल्म की सिनेमैटोग्राफी इसकी सबसे बड़ी ताकतों में से एक है। असम और बिहार के प्राकृतिक तथा वास्तविक परिवेश को प्रभावशाली ढंग से फिल्माया गया है। कई दृश्य कुत्ते के दृष्टिकोण से शूट किए गए हैं, जिससे दर्शक कहानी का हिस्सा महसूस करते हैं।

बैकग्राउंड स्कोर फिल्म के भावनात्मक और रोमांचक दृश्यों को मजबूती देता है, लेकिन गीत यादगार नहीं बन पाते। लगभग ढाई घंटे का रनटाइम फिल्म की गति को प्रभावित करता है और कुछ हिस्से अनावश्यक रूप से लंबे महसूस होते हैं।

फिल्म की खूबियां

  • इंसान और पालतू जानवर के रिश्ते को भावनात्मक तरीके से प्रस्तुत करती है।
  • ऑस्कर का शानदार स्क्रीन प्रेजेंस पूरी फिल्म की जान है।
  • पशु क्रूरता, बाल श्रम और अंग तस्करी जैसे गंभीर मुद्दों पर ध्यान आकर्षित करती है।
  • परिवार के साथ देखने योग्य संवेदनशील फिल्म।

कमजोर पक्ष

  • कहानी कई स्थानों पर जरूरत से ज्यादा लंबी लगती है।
  • कुछ दृश्य और घटनाएं दोहराव का अहसास कराती हैं।
  • कुछ किरदारों का चित्रण रूढ़िवादी और अतिनाटकीय लगता है।
  • पटकथा दूसरे भाग में थोड़ी धीमी पड़ जाती है।

अंतिम फैसला

'ओह माय डॉग' तकनीकी रूप से परफेक्ट फिल्म नहीं है, लेकिन इसकी भावनात्मक अपील इसे खास बनाती है। यह फिल्म बताती है कि वफादारी, प्रेम और अपनापन किसी भाषा के मोहताज नहीं होते। यदि आपको इंसान और जानवर के रिश्ते पर आधारित '777 चार्ली', 'तेरी मेहरबानियां' या 'चिल्लर पार्टी' जैसी फिल्में पसंद हैं, तो यह फिल्म भी आपको जरूर पसंद आएगी।

अंतिम रेटिंग: 3/5 स्टार

भावुक कहानी, दमदार संदेश और चार पैरों वाले हीरो ऑस्कर की शानदार मौजूदगी के कारण यह फिल्म एक बार जरूर देखी जा सकती है, खासकर उन दर्शकों के लिए जो परिवार के साथ संवेदनशील और दिल को छू लेने वाली कहानी देखना चाहते हैं।

Tags