मैडम के जूते लाओ!” जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में जावेद अख्तर ने सुनाया संघर्ष का किस्सा, बोले – इंडस्ट्री पूरी तरह बदल चुकी है
आज की स्टोरी है एक ऐसे शख्स की, जो 80 साल के हो चुके हैं, लेकिन जिनकी बातें आज भी सीधे दिल को छू जाती हैं। हम बात कर रहे हैं हिंदी सिनेमा के लीजेंड – जावेद अख्तर साहब की। हाल ही में उन्होंने 19वें जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में एक ऐसा किस्सा सुनाया, जिसने सबको हैरान कर दिया।
इस किस्से का टाइटल कुछ ऐसा है जिसे सुनकर आप भी चौंक जाएंगे –
“मैडम के जूते लाओ!”
जी हां, जावेद अख्तर साहब ने खुद बताया कि एक समय ऐसा था जब उन्हें फिल्म सेट पर यही काम करना पड़ता था।
आज जावेद अख्तर वो नाम हैं, जिन्होंने सलीम खान के साथ मिलकर सलीम-जावेद की जोड़ी बनाई और हिंदी सिनेमा का इतिहास बदल दिया।
शोले, दीवार, जंजीर, यादों की बारात, मिस्टर इंडिया जैसी ब्लॉकबस्टर फिल्मों की स्क्रिप्ट लिखने वाले जावेद साहब… लेकिन उनकी शुरुआत? बिल्कुल नीचे से।
करियर की शुरुआत में जावेद अख्तर असिस्टेंट डायरेक्टर थे। और उस दौर में AD होने का मतलब था –
ना कोई इज्जत,
ना कोई पहचान,
ना नाम से बुलाए जाने का हक।
बस छोटे-मोटे काम –
“मैडम के जूते लाओ!”,
“हीरो का कोट कहां है?”,
“जैकेट जल्दी ढूंढो!”
जावेद अख्तर साहब ने खुद कहा –
“हमारा काम यही था। आज के असिस्टेंट डायरेक्टर स्टार्स को उनके नाम से बुलाते हैं। मैं उन्हें देखकर डर जाता हूं!”
ये बात उन्होंने 15 जनवरी 2026, जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के पहले दिन अपने सेशन ‘Javed Akhtar: Points of View’ में कही।
उन्होंने बताया कि पहले फिल्म इंडस्ट्री में सब कुछ बेहद अनऑर्गनाइज़्ड था।
स्टार्स बड़े होते थे,
और असिस्टेंट डायरेक्टर बस ऑर्डर फॉलो करने वाले।
कोई नाम से नहीं बुलाता था, सिर्फ काम दिया जाता था – और वो भी बिना सवाल।
आज हालात बिल्कुल बदल चुके हैं।
आज के AD प्रोफेशनल हैं,
सेट पर रिस्पेक्ट पाते हैं,
क्रिएटिव इनपुट देते हैं,
और हीरो-हीरोइन को उनके नाम से बुलाते हैं –
“आर्यन”, “शाहरुख”
ये चीज़ जावेद साहब के दौर में सोचना भी नामुमकिन था।
इस सेशन में जावेद अख्तर साहब ने सेकुलरिज़्म पर भी बात की।
उन्होंने कहा –
“सेकुलरिज़्म कोई क्रैश कोर्स नहीं है, ये एक लाइफस्टाइल है, जो घर से आती है।”
लेकिन सबसे ज्यादा तालियां उन्हें इंडस्ट्री के बदलाव पर कही गई बातों के लिए मिलीं।
सोचिए दोस्तों,
जो इंसान कभी सेट पर जूते ढूंढता था,
वही आगे चलकर हिंदी सिनेमा की रीढ़ बना।
अंदाज़, हाथी मेरे साथी, क्रांति, शोले जैसी फिल्मों की कहानियां आज भी क्लासिक मानी जाती हैं।
इसके बाद जावेद अख्तर साहब गीतकार बने और ऐसे गाने लिखे जो आज भी ज़ुबान पर हैं –
“लग जा गले”, “ये दिल है मुश्किल”
उनकी कलम ने हर दौर में कमाल किया।
इस पूरे किस्से से एक बात साफ निकलती है –
वक्त बदलता है,
इंडस्ट्री बदलती है,
और मेहनत कभी बेकार नहीं जाती।
जावेद अख्तर साहब का सफर इस बात का सबसे बड़ा उदाहरण है।
आज के असिस्टेंट डायरेक्टर्स वाकई लकी हैं।
उन्हें रिस्पेक्ट मिलती है,
सीखने का मौका मिलता है,
और पहचान भी।
क्योंकि अब लोग समझ चुके हैं कि फिल्म बनाने में हर किसी का रोल जरूरी होता है।
तो दोस्तों, आप क्या सोचते हैं?
पुराना दौर बेहतर था या आज का?
जावेद अख्तर साहब का ये किस्सा सुनकर आपको हंसी आई या हैरानी हुई?
कमेंट में जरूर बताइए।
