Happy Birthday Amitabh Bacchan : आज मेरे पास बिल्डिंगे है, गाड़ी है, बैंक बैलेंस है.. क्या है तुम्हारे पास -: शहंशाह बच्चन
आज बॉलीवुड के शहंशाह अमिताभ बच्चन का जन्मदिन
कल दिग्गज अभिनेत्री रेखा का जन्मदिन था। आज बॉलीवुड के शहंशाह अमिताभ बच्चन का जन्मदिन है। शहंशाह बयासी साल के हो गये हैं और आज भी नये उम्र वाले एक्टरों व सिने शहजादों को मुंह चिढ़ा रहे हैं। साठ के दशक के आख़िर में सिनेमा की दुनिया में दस्तक देने वाला छः फुट से ऊपर का वो दुबला-पतला लड़का बयासी साल की उम्र में सारी दुनिया में अपने जन्मदिन पर शुभकामनाएं बटोर रहा है। क्या यह इतना आसान था? अमिताभ बनना किसी इत्तेफ़ाक से कम तो नहीं।
११ अक्टूबर सन् १९४२ का वो दिन जब हिन्दी साहित्य जगत के सशक्त हस्ताक्षर बाबू हरिवंश राय बच्चन के सुपुत्र के रूप में अमिताभ बच्चन का जन्म हुआ था। इनका पुश्तैनी विरासत गांव बाबू की पट्टी, ज़िला प्रतापगढ़ उत्तर प्रदेश में बताया जाता है। लेकिन, इलाहाबाद से क़रीब होने के नाते हरिवंश बाबू ने अपने यश-कीर्ति से इलाहाबाद में भी ठीक-ठाक धरोहर बना लिया था।ऐसा बताया जाता है कि वहीं इलाहाबाद में ही अमिताभ बच्चन का जन्म हुआ। चूंकि हरिवंश राय बच्चन बड़े आदमी थे और सुप्रसिद्ध कवि भी थे; ऐसे में उनके आवास पर देश के नामचीन हस्तियों का आना-जाना लगा रहता था। इन्हीं माहौल को देखकर अमिताभ बच्चन का बचपन बीता।आमजन में ऐसा प्रचलित है कि आरम्भ में अमिताभ बच्चन का नाम इन्कलाब था। चूंकि, हरिवंश राय बच्चन साहित्यिक दुनिया से ताल्लुक रखते थे; अतः एक दिन सुप्रसिद्ध कवि सुमित्रानंदन पन्त इनके घर आये और हरिवंश राय बच्चन के बेटे का नया नामकरण अमिताभ कर दिया। बस, यहीं से इन्कलाब ने अमिताभ के रूप में सारी दुनिया को अपनी प्रतिभा से मन्त्रमुग्ध कर दिया।

वैसे तो अमिताभ बच्चन विज्ञान के छात्र थे। उन्होंने काम के सिलसिले में कलकत्ता में कुछ दिन व्यतीत भी किया। वहीं से उनके ज़ेहन में सिनेमा की दुनिया में क़दम रखने का ख़्याल प्रबल हुआ। वे मुम्बई चले गये जहां काफ़ी जद्दोजहद के बाद उन्हें अपनी पहली फिल्म ' सात हिन्दुस्तानी ' में काम करने का मौका मिला। इस फिल्म ने भले ही सफलता के झण्डे न गाड़े हों, लेकिन शहंशाह के चेहरे से बॉलीवुड अब अनजान भी नहीं था। सात हिन्दुस्तानी में काम करने का फ़ायदा यह हुआ कि अपनी ही फिल्म से अमिताभ को सर्वश्रेष्ठ न्यू कमर एक्टर का नेशनल अवॉर्ड मिल गया। १९७१ में एक फिल्म आयी थी 'आनन्द'। यह वह दौर चल रहा था जब देश में एक ही सुपरस्टार था, वो थे राजेश खन्ना। इस फिल्म में राजेश खन्ना ने एक कैंसर पीड़ित मरीज़ की भूमिका निभाई और अमिताभ बच्चन बने उनके इलाज़ करने वाले डॉक्टर। फिल्म आनन्द में राजेश खन्ना का तकिया कलाम - बाबू मोशाय! इतना मशहूर हुआ कि लोग आज भी हंसी-मज़ाक में इस तकिया कलाम का प्रयोग कर ही देते हैं। हालांकि, 'आनन्द' की जान पूरी तरह से राजेश खन्ना रहे; लेकिन अमिताभ ने अपनी भूमिका को बख़ूबी निभा कर बेस्ट सहायक अभिनेता का फिल्म फेयर अवॉर्ड जीत लिया। अब दर्शक अमिताभ नामक एक्टर के चेहरे से पूरी तरह वाकिफ हो चुके थे।आनन्द मूवी का गाना, " ज़िन्दगी कैसी है पहेली...!" ने कहीं न कहीं अमिताभ बच्चन और सुपर स्टार राजेश खन्ना के करियर पर हर तरह से फिट बैठा।
बॉलीवुड को अमिताभ बच्चन के रूप में नया सुपरस्टार दिया
साल १९७३ से लेकर १९८४ तक वक्त अमिताभ बच्चन के शहंशाह बनने की एक नहीं; बल्कि अनेकों कहानियां लिख चुका था। जहां बॉलीवुड में राजेश खन्ना के अलावा अनेकों नामचीन और मंझे हुए दिग्गज अभिनेताओं का जमावड़ा लगा हुआ था; उसी जमावड़े को दरकिनार करते हुए इलाहाबाद का एक लड़का जो कि १९६९ में सिनेमा में पर्दापण करता है और महज़ पांच-छह सालों में ही सुपरस्टार बन जाता है; क्या यह किसी कुदरती इत्तेफ़ाक से कम था? अमिताभ बच्चन अपने फिल्मी करियर में कुछ ख़ास नहीं कर पाये थे। मीडिया रिपोर्टों में बताया जाता रहा है कि वे इस बॉलीवुड में अपने करियर से इस क़दर निराश हो चुके थे कि फिल्मी दुनिया का मोह छोड़ कर हमेशा के लिए वापस चले जाने का मन बना चुके थे। लेकिन, जब क़िस्मत बदलनी होती है; तब उन्हीं खट्टे अनुभवों के बीच कोई न कोई संयोग बन ही जाता है। कुछ ऐसा ही हुआ मिस्टर बच्चन के साथ।

साल १९७३ में जाने-माने फिल्म निर्माता-निर्देशक प्रकाश मेहरा ने अमिताभ बच्चन के माथे की धारियों में भावी सुपरस्टार होने की नयी धारी खींच दिया। प्रकाश मेहरा ने अमिताभ बच्चन को अपनी यादगार मूवी 'ज़ंजीर' में बतौर लीड एक्टर काम करने का मौका दे दिया। ईमानदारी से समीक्षा करें तो यही निष्कर्ष निकलता है कि ज़ंजीर मूवी सिर्फ अमिताभ के लिए ही बनी थी। इनके अलावा कोई और एक्टर इस मूवी के साथ शायद ही इन्साफ़ कर पाता। अमिताभ अपने करियर से हताश हो चुके थे। लम्बी कद-काठी और ऊपर से दुबला-पतला लेकिन छरहरा बदन। वे पूरी तरह से 'एंग्री यंगमैन' की भूमिका में सटीक बैठ रहे थे। बस, इसी संयोग का सही इस्तेमाल प्रकाश मेहरा ने अपनी मूवी ज़ंजीर में कर दिया। ज़ंजीर बॉलीवुड के इतिहास में न सिर्फ यादगार मूवी साबित हुई; बल्कि इस मूवी ने एक ओर बॉलीवुड को अमिताभ बच्चन के रूप में नया सुपरस्टार दिया ; तो वहीं दूसरी ओर हर दिल की धड़कन वा एक तरफा सुपरस्टार राजेश खन्ना की कुर्सी भी उनसे छीन लिया। ज़ंजीर में उनके अपोजिट जया भादुड़ी थीं। इस फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर कामयाबी का नाम कीर्तिमान स्थापित किया। इसके बाद अमिताभ बच्चन को उस साल के लिए बेस्ट एक्टर का फिल्म फेयर अवॉर्ड भी मिला।
दीवार में अमिताभ ने एक गैंगस्टर-स्मगलर का रोल प्ले किया था
इसके कुछ ही दिनों बाद, अमिताभ बच्चन ने अपनी सह अभिनेत्री जया भादुड़ी से शादी कर ली। इसके बाद भी इन दोनों दिग्गजों की जोड़ी शोले, अभिमान और सिलसिला जैसी मूवी में देखने को मिला।साल १९७५, में अमिताभ बच्चन की दो और फिल्में रिलीज हुईं। ये दोनों ऐसी फिल्में हैं जिन्होंने अमिताभ बच्चन के कद़ को हिमालय के समान ऊंचाई प्रदान किया। यश चोपड़ा को कौन नहीं जानता? जी हां, वही यश चोपड़ा जिन्होंने शाहरुख खान को बॉलीवुड का बादशाह बनाने में अहम भूमिका निभायी थी। लेकिन, बहुत कम लोग जानते हैं कि इसी यश चोपड़ा ने साल १९७५ में एक फिल्म बनाया था - दीवार। दीवार मूवी उस साल कमाई करने के मामले में चौथे स्थान पर रही। लेकिन, दीवार ने जो लोकप्रियता हासिल की, वो अच्छी-अच्छी मूवी भी हासिल न कर सकी। 'दीवार' में अमिताभ बच्चन ने 'विजय' नामक एक ऐसे ग़रीब और लाचार बच्चे का किरदार अदा किया; जिसने समाज की ज्यादतियों को सह-सहकर ख़ुद को इतना निष्ठुर कर दिया है जिसके लिए दौलत-शोहरत ही सब कुछ है। ज़ंजीर की तरह दीवार भी समाज के एक गम्भीर विषय पर बनी हुई फिल्म थी।
दोनों फिल्मों में मिस्टर बच्चन ने भले ही अलग-अलग भूमिकाएं निभायी हो; लेकिन दोनों मूवीज़ में उनके भीतर जो कॉमन फैक्टर रहा वो था 'एंग्री यंगमैन'। दीवार में अमिताभ ने एक गैंगस्टर-स्मगलर का रोल प्ले किया था। उनके अलावा इस फिल्म में शशि कपूर, निरूपा रॉय, परवीन बॉबी और नीतू सिंह ने भी काम किया है। दीवार का लीड नायक एक नास्तिक है। उसे समाज की रूढ़िवादी विचारों से सख़्त नफ़रत है जिसने उसकी मां को ईंटें ढ़ोने पर मजबूर किया। जिसने उस नायक की कलाई पर लिख दिया- तेरा बाप चोर है। उस नायक के दिल में समाज के लिए कोई हमदर्दी नहीं बची है। उसके लिए तो बस रुपया, पैसा, दौलत और शोहरत ही दुनिया से लड़कर हक़ से जीने का आसान ज़रिया है। ज़ंजीर के विजय के दिल में जो आग जली थी, वो अभी तक बुझी नहीं थी। उसी आग की तपिश ने दीवार और अमिताभ बच्चन दोनों को अमर कर दिया। जिसका अन्ज़ाम यह हुआ कि उस मूवी के लिए भी अमिताभ बच्चन को बेस्ट एक्टर का फिल्म फेयर अवॉर्ड मिल गया।

इसके बाद, उसी साल अमिताभ बच्चन की एक और यादगार मूवी आयी - शोले। शोले ने उस साल कमायी करने का ऐसा रिकॉर्ड कायम किया जिसकी महक अभी भी बॉक्स ऑफिस की डायरी से महसूस की जा सकती है। शोले किसी एक कलाकार की मेहनत का परिणाम नहीं है। भले ही इसे सिप्पी परिवार ने बनाया हो और सलीम-जावेद ने लिखा हो; पर इस मूवी के पर्दे पर दिखने वाले हर एक कलाकार से लेकर पर्दे के पीछे से काम करने वाले हर आदमी की मेहनत का नतीज़ा था -शोले। इस मूवी में भी अमिताभ बच्चन ने अपने सिने स्क्रीन का नाम 'विजय' को लेकर काम किया। संजीव कुमार और अमजद खान जैसे दिग्गज कलाकारों ने इस मूवी को चार चांद लगा दिया। वहीं अमिताभ-धर्मेंद्र के रूप में जय-वीरू की जोड़ी ने हर दर्शक को ताली बजाने पर विवश कर दिया। फिल्म शोले के संवाद और गीत ने हर दर्शक को मोहित किया। यहां तक जिन लोगों ने उस समय शोले नहीं देखी थी, उन लोगों ने बाद में शोले की रोमांच को अपनी आंखों से देखने का बीड़ा उठाया। इस फिल्म के गीत- होली के दिन तिल-तिल जाते हैं, ये दोस्ती हम नहीं छोड़ेंगे हर ज़ुबान पर चढ़ चुके थे। संजीव कुमार का डायलॉग - 'गब्बर ये हाथ नहीं फांसी का फंदा है' और अमजद खान का डायलॉग- ये हाथ हमको दे दे ठाकुर.. को आज भी मिमिक्री कर करके दर्शाया जाता है। अमिताभ बच्चन के करियर में एक और बड़ी फिल्म दर्ज़ हो चुकी थी। हालांकि, इसका श्रेय अकेले अमिताभ के खाते में नहीं आ सकता क्योंकि एक से बढ़कर एक धुरंधर कलाकारों ने अपनी अदाकारी से शोले को महान सिनेमा बना दिया था।
प्रकाश मेहरा ने जिस एंग्री यंगमैन को हिन्दी सिनेमा को सौंपा था; अब वो तोहफ़ा रोमांटिक, कॉमेडी सहित अलग-अलग भूमिकाओं में दिखने के लिए लालायित हो रहा था। यहां बताना दिलचस्प होगा कि यश चोपड़ा ने साल १९७६ में फिल्म 'कभी-कभी' में अमिताभ बच्चन को दूसरी बार मौका दिया। पहली बार 'दीवार' में एकदम से सीरियस रहने वाला विजय अब 'कभी-कभी' में रोमांस करने के लिए तैयार हो गया था। बॉक्स ऑफिस पर यह फिल्म सुपरहिट रही। इस फिल्म में साहिर लुधियानवी का गीत- मैं पल दो पल का शायर हूं और कभी-कभी मेरे दिल में ख़याल आता है; ख़ूब सुना गया। इस मूवी में खय्याम की संगीत ने दिल ही जीत लिया था। अमिताभ बच्चन के अलावा राखी, शशि कपूर, वहीदा रहमान और नीतू सिंह ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी।इसके बाद, सन १९७७ में अमिताभ बच्चन की एक और सुपरहिट फिल्म आयी। अमर, अकबर, एंथनी। इस फिल्म में अमिताभ ने एंथनी के मज़ेदार रोल को बखूबी निभाया। इसके लिए उन्हें उस साल के लिए बेस्ट एक्टर का फिल्म फेयर अवॉर्ड भी मिला। यह एक मल्टीस्टारर फिल्म थी। ऐसी मल्टीस्टारर कई फिल्मों में अमिताभ बच्चन लगातार दिख रहे थे। अमर,अकबर,एंथनी के गाने सुपरहिट रहे। परदा है परदा, देख के तुझको दिल डोला है जैसे कई हिट गाने थे इस मूवी में।
अब आता है अमिताभ बच्चन के करियर का सबसे अहम साल।
जी हां, साल १९७८। यह वह साल था जिसने अमिताभ बच्चन को उस मुकाम पर खड़ा कर दिया जहां कभी राजेश खन्ना की हुकूमत चला करती थी। इस साल इन्होंने कसमें-वादे, डॉन, त्रिशूल और मुक़द्दर का सिकंदर जैसी सुपर-डुपर हिट फिल्में कीं।
'डॉन' का गाना खईके पान बनारस वाला, कौन नहीं जानता है!
'त्रिशूल' यश चोपड़ा की मूवी थी। इसकी पटकथा सलीम-जावेद की जोड़ी ने लिखा था। साहिर लुधियानवी के गीत और खय्याम के संगीत ने इस मूवी की कामयाबी लिखने में मदद की। सबसे बड़ी बात कि अमिताभ बच्चन और उनके पिता की भूमिका में संजीव कुमार ने जिस तरह से बाप-बेटे के किरदार को निभाया; उस मेहनत ने उन दोनों कलाकारों के करियर में एक और मील का पत्थर खड़ा कर दिया।
वहीं, 'मुकद्दर का सिकंदर' में अमिताभ और रेखा की जोड़ी बॉलीवुड में ऐसे दस्तक देती है कि हर ज़ुबान, हर मीडिया हाउस की सुर्खियों में बस एक ही कहानी होती थी - ' सलाम-ए-इश्क़ मेरी जां ज़रा कुबुल कर ले, हमसे प्यार करने की ज़रा सी भूल कर ले'। इस इश्क़ की कहानी में कोई और नहीं केवल अमिताभ और रेखा का ज़िक्र किया जाता था। सन १९७८ के बाद से हिन्दी सिनेमा जगत में एक्टरों के अफेयर्स की चर्चों में सिर्फ इसी जोड़ी को प्राथमिकता दी जाती थी। मुक़द्दर का सिकंदर सुपरहिट रही और इसने रेखा-अमिताभ के करियर को नयी ऊंचाई प्रदान की।

अमिताभ और रेखा दोनों को स्टारडम देने की कहानी कुदरत ने ही लिख दिया था। साल १९७९ में एक और फिल्म आयी जिसमें इन दोनों की जोड़ी ने काम किया था, उस मूवी का नाम था - मिस्टर नटवरलाल। यह भी एक सुपरहिट फिल्म साबित हुई। रेखा और अमिताभ की जोड़ी एक बार फिर से मीडिया की सुर्खियों में छा गयी थी। इस फिल्म में अमिताभ की आवाज़ को एक गाने में सुना गया। इसके बाद अमिताभ बच्चन के खाते में काला पत्थर और दोस्ताना जैसी जबरदस्त फिल्में आयीं। काला पत्थर ने अमिताभ को बेस्ट एक्टर का पुरस्कार भी दिलाया।
इसके बाद अमिताभ ने १९८१ में सिलसिला में काम किया। 'सिलसिला' में अमिताभ के साथ रेखा एक बार फिर से बड़े पर्दे पर दिखीं। इन दोनों के अलावा संजीव कुमार और जया भादुड़ी ने भी अहम भूमिकाएं निभायीं। यह फिल्म अपनी कथित सफलता से अधिक अमिताभ-रेखा के अफेयर की चर्चा के लिए जानी गयी। इस फिल्म को यश चोपड़ा ने निर्देशित किया था जिन्हें रोमांस को हिन्दी सिनेमा में नये सिरे से दिखाने का श्रेय जाता है। 'सिलसिला' त्रिकोण लव स्टोरी पर आधारित मूवी थी। इस फिल्म ने इस तरह से अफवाहों को पैदा किया कि रेखा-अमिताभ की जोड़ी इसके बाद एक साथ नहीं दिखी। हालांकि, उसके पहले इन दोनों की जोड़ी ने 'सुहाग' में एक साथ काम किया था।'सिलसिला' के एक गाने 'रंग-बरसे भीगे चुनर वाली रंग बरसे' में अमिताभ और रेखा ने जिस तरह से अभिनय किया था; उसे देखकर हर कोई अवाक रह गया था। यह रील से अधिक रियलिटी को प्रस्तुत कर रहा था। इस गाने को देखकर हर कोई इन दोनों के प्रेम-प्रसंग को लेकर क़िस्से और कहानियां गढ़ने को बेकरार होने लगा।
इसके बाद अमिताभ ने जयाप्रदा के साथ फिल्म 'शराबी' में काम किया था। 'शराबी' की लोकप्रियता कहीं से भी कम नहीं रही। देश के युवाओं ने एक नये अमिताभ बच्चन को देखा। 'मुझे नौलक्खा मंगा दे ओ सैंया दीवानी' और 'दे दे प्यार दे ' जैसे गानों की शराबी में जबरदस्त धूम रही। इसके बाद अमिताभ बच्चन ने कुली, मर्द, परवरिश जैसे सफल और लोकप्रिय फिल्मों में अमिट छाप छोड़ी।फिल्म कुली के एक सीन में अमिताभ बच्चन को चरित्र अभिनेता पुनीत इस्सर के साथ एक फाइट सीन में गहरी और जानलेवा चोट लग गयी थी। इस चोट के कारण मिस्टर बच्चन की ज़िन्दगी पर ख़तरे का साया मंडराने लगा था। तमाम तरह की शारीरिक तकलीफ़ों को सहने और देश-दुनिया में अपने प्रशंसकों की दुआओं के कारण उन्हें एक तरह से पुनर्जन्म मिला।

हालांकि, १९८५ के बाद इनके करियर में ढ़लान का दौर शुरू होने लगा था। इसके बाद 'अग्निपथ' में अमिताभ बच्चन ने विजय दीनानाथ चौहान की यादगार भूमिका निभायी। उन्हें इसके लिए बेस्ट एक्टर का नेशनल अवॉर्ड भी मिला। अमिताभ बच्चन ने अपने करियर में तक़रीबन पांच दशकों में क़रीब दो सौ से अधिक फिल्मों में काम किया। इन फिल्मों में मुख्य रूप से- दीवार, जंजीर, शोले, कभी-कभी, हेराफेरी, सिलसिला, परवरिश, खून-पसीना, कसमें-वादे, डॉन, त्रिशूल, सुहाग, दोस्ताना, नसीब, लावारिस, नमक हराम, नमक हलाल, कुली, शराबी, मर्द, अभिमान, मिली, अग्निपथ, चुपके-चुपके, काला-पत्थर, शान, हम, शहंशाह और शक्ति जैसी वे फिल्में हैं जो नब्वे के दशक के पहले तक अमिताभ बच्चन को सिनेमाघरों का शहंशाह बनाया।
अमिताभ बच्चन ने अपने करियर में सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार चार बार जीता, जो कि अपने आप में एक कीर्तिमान है।इसके अलावा सोलह बार फिल्म फेयर अवॉर्ड जीता है। भारत सरकार द्वारा आर्ट्स में उनके योगदान को सराहते हुए साल १९८४ में पद्मश्री, २००१ में, पद्म भूषण, २०१५ में पद्मविभूषण और २०१८ में सिनेमा के क्षेत्र में भारत का सर्वोच्च सम्मान दादा साहब फाल्के पुरस्कार से नवाजा गया।
दिलचस्प बात यह है कि १९८४ में फिल्मों से दूरी बनाने के बाद अमिताभ बच्चन ने राजनीति में क़दम रख दिया। उन्होंने अपने पारिवारिक मित्र राजीव गांधी का चुनावी समर्थन किया। इसके अलावा इलाहाबाद लोकसभा सीट से उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमन्त्री हेमवती नन्दन बहुगुणा के ख़िलाफ़ चुनाव लड़कर उन्हें बुरी तरह से पराजित कर दिया। उस चुनाव में अमिताभ बच्चन ने इतने बड़े अन्तर से हेमवती नन्दन बहुगुणा को हराया था; जो कि अभी तक का रेकॉर्ड बना हुआ है। कुछ निजी कारणों और राजनीतिक आरोपों की वज़ह से सिनेमा के शहंशाह ने राजनीति से दूरी बना ली थी।

सिनेमा के शहंशाह ने अपने करियर में एक दौर ऐसा भी देखा जब उन्हें आर्थिक रूप से हाशिए पर आना पड़ा। मीडिया रिपोर्टों की मानें तो वे भारी-भरकम क़र्ज़ के तले दब चुके थे। ऐसा सिर्फ इसलिए हुआ था कि उनके प्रोडक्शन हाउस के तले बनी फिल्में फ्लॉप हो गयी थीं। लेकिन, अमिताभ बच्चन सम्भवतः इस जहां के ऐसे पहले इन्सान हैं जिन्होंने ने अपनी धैर्य, आत्मविश्वास और सकारात्मकता से सारी दुनिया को दिखाया कि उन्हें शहंशाह क्यों कहा जाता है। उन्होंने अपने बुरे दौर से हार नहीं मानी। उन्होंने दोबारा वापसी की। वो भी छोटे पर्दे पर। अमिताभ बच्चन जैसा बड़ा नाम पहली बार इक्कीसवीं सदी के आरम्भ में बड़े पर्दे पर दस्तक दे रहा था - कौन बनेगा करोड़पति नामक शो से। सारी दुनिया हैरान थी। लेकिन, अमिताभ बच्चन अपनी दूसरी पारी खेलने के लिए तैयार थे। जिसका नतीज़ा यह हुआ कि कौन बनेगा करोड़पति घर-घर देखा जाने लगा और आज बयासी साल की उम्र में मिस्टर बच्चन इस शो को टीवी पर चला रहे हैं। इसके अलावा सन् २००१ में फिल्म मोहब्बतें और उसके बाद कभी ख़ुशी कभी ग़म से अमिताभ बच्चन ने एक बार फिर से पर्दे पर दस्तक दिया। उसके बाद मिस्टर बच्चन आज तक डंटे हुए हैं। इन ढ़ाई दशकों में अमिताभ बच्चन ने तमाम सफल फिल्में कीं। पुरस्कारों को जीता और ख़ूब सारी धन-दौलत अर्जित किया।आप उनकी आलोचना करें या प्रशंसा; लेकिन सच तो यही है कि अमिताभ बच्चन ने हर मुश्किलों को धूल चटाया और दुनिया को दिखाया कि उन्हें ' मुक़द्दर का सिकंदर ' क्यों कहा जाता है। उम्र की इस पड़ाव पर उनकी कामयाबी का ग्राफ देखकर हर कोई दंग रह जाता है और उसका दम्भ वहीं पर चकनाचूर हो जाता है।
-: Roshan Mishra
Independent Journalist - The Political Mukhiya
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