Pregnancy Ultrasound Guide: प्रेग्नेंसी में कितने और कौन से अल्ट्रासाउंड हैं जरूरी? जानें हर स्कैन का महत्व
Pregnancy Ultrasound Guide: गर्भावस्था के दौरान शिशु की सेहत और विकास की सटीक निगरानी के लिए अल्ट्रासाउंड सबसे भरोसेमंद और सुरक्षित जरिया है। कई महिलाओं के मन में यह सवाल होता है कि क्या बार-बार अल्ट्रासाउंड कराना सुरक्षित है? एक विशेषज्ञ (Gynecologist) के तौर पर मैं यह स्पष्ट करना चाहता हूँ कि अल्ट्रासाउंड में किसी हानिकारक विकिरण (Radiation) का नहीं, बल्कि ध्वनि तरंगों (Sound Waves) का उपयोग होता है, जो पूरी तरह सुरक्षित और दर्द रहित है।आमतौर पर एक सामान्य गर्भावस्था में 4 से 5 प्रमुख स्कैन किए जाते हैं। आइए जानते हैं इनके बारे में विस्तार से
1. डेटिंग या अर्ली प्रेग्नेंसी स्कैन (6 से 9 सप्ताह)
प्रेग्नेंसी की पुष्टि होने के बाद यह पहला स्कैन होता है। इसका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि:
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गर्भधारण गर्भाशय के भीतर ही हुआ है (एक्टोपिक प्रेग्नेंसी की जांच)।
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भ्रूण की धड़कन (Heartbeat) सही है।
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गर्भ में एक बच्चा है या जुड़वां (Twins/Triplets)।
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गर्भकालीन आयु का सटीक अनुमान लगाना। नोट: शुरुआती हफ्तों में स्पष्टता के लिए डॉक्टर 'ट्रांसवेजाइनल' स्कैन की सलाह दे सकते हैं।
2. एनटी (NT) स्कैन (11 से 14 सप्ताह)
नुचल ट्रांसलूसेंसी (NT) स्कैन पहली तिमाही का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है।
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उद्देश्य: यह शिशु की गर्दन के पीछे तरल पदार्थ की मात्रा को मापता है।
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महत्व: इससे डाउन सिंड्रोम जैसी क्रोमोसोमल असामान्यताओं के जोखिम का पता चलता है।
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इसे अक्सर सटीक परिणामों के लिए ब्लड टेस्ट (Double Marker) के साथ किया जाता है।
3. एनोमली स्कैन / लेवल-2 स्कैन (18 से 22 सप्ताह)
इसे प्रेग्नेंसी का सबसे विस्तृत (Detailed) स्कैन माना जाता है।
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शारीरिक संरचना: इसमें शिशु के हृदय, मस्तिष्क, रीढ़ की हड्डी, किडनी और चेहरे के अंगों की बारीकी से जांच की जाती है।
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प्लेसेंटा: इसमें प्लेसेंटा (आंव) की स्थिति और एमनियोटिक द्रव (पानी) के स्तर का आकलन होता है।
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यह स्कैन माता-पिता को शिशु के शारीरिक विकास के प्रति आश्वस्त करता है।
4. ग्रोथ स्कैन (28 से 32 सप्ताह)
तीसरी तिमाही में किया जाने वाला यह स्कैन शिशु की डिलीवरी से पहले की तैयारी का जायजा लेता है।
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वजन और पोजीशन: शिशु के अनुमानित वजन और उसकी पोजीशन (सिर नीचे है या नहीं) की जांच होती है।
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स्वास्थ्य: प्लेसेंटा की कार्यक्षमता और एमनियोटिक फ्लूइड की मात्रा जांची जाती है।
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हाई-रिस्क प्रेग्नेंसी (डायबिटीज, हाई बीपी) में यह स्कैन अत्यंत महत्वपूर्ण है।
5. डॉप्लर स्कैन (आवश्यकतानुसार)
यह हर गर्भवती महिला के लिए अनिवार्य नहीं है। डॉक्टर इसकी सलाह तब देते हैं जब:
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शिशु के मस्तिष्क या प्लेसेंटा में रक्त के प्रवाह (Blood Flow) की जांच करनी हो।
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यह सुनिश्चित करना हो कि शिशु को पर्याप्त ऑक्सीजन और पोषण मिल रहा है।
6. 3D/4D स्कैन (वैकल्पिक)
यह एक उन्नत इमेजिंग तकनीक है। इसमें माता-पिता शिशु के चेहरे के फीचर्स और उसकी गतिविधियों (Movement) को वास्तविक समय (Real-time) में देख सकते हैं। यह मेडिकल से ज्यादा भावनात्मक जुड़ाव के लिए कराया जाता है।
