वंदे मातरम् पर कांग्रेस का रुख, सुधांशु त्रिवेदी ने याद दिलाया इतिहास; सियासत फिर गरमाई

 
sudhanshu Trivedi on vande matram

नई दिल्ली: राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ को लेकर भारतीय राजनीति में एक बार फिर बहस तेज हो गई है। कांग्रेस कार्यसमिति (CWC) द्वारा 1937 में तय किए गए प्रारूप के अनुसार अपने कार्यक्रमों में वंदे मातरम् के शुरुआती दो अंतरों के गायन की बात कहे जाने के बाद भारतीय जनता पार्टी ने कांग्रेस पर तीखा हमला बोला है। भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता एवं राज्यसभा सांसद सुधांशु त्रिवेदी ने इस मुद्दे को केवल वर्तमान राजनीतिक विवाद नहीं, बल्कि देश के स्वतंत्रता आंदोलन और विभाजन से जुड़े इतिहास के संदर्भ में देखने की बात कही है। (AajTak)

वंदे मातरम् पर क्यों शुरू हुआ विवाद?

कांग्रेस ने हाल में अपने रुख को स्पष्ट करते हुए कहा कि पार्टी अपने कार्यक्रमों में वंदे मातरम् के उस स्वरूप का पालन करेगी, जिसे 28 अक्टूबर 1937 के निर्णय से जोड़ा जाता है। कांग्रेस का तर्क है कि 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा की अंतिम बैठक में डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने ‘जन गण मन’ को राष्ट्रगान और ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रीय गीत के रूप में स्वीकार किए जाने की स्थिति स्पष्ट की थी। (AajTak)

इसी फैसले पर भाजपा ने सवाल उठाते हुए इसे राष्ट्रीय गीत के प्रति कांग्रेस के रवैये से जोड़ दिया है। सुधांशु त्रिवेदी ने कांग्रेस के प्रस्ताव को बेहद निंदनीय बताया और पार्टी के मौजूदा रुख की तुलना 1937 के राजनीतिक घटनाक्रम से की। (ABP News)

सुधांशु त्रिवेदी ने क्या कहा?

सुधांशु त्रिवेदी का कहना है कि वंदे मातरम् केवल एक गीत नहीं है, बल्कि भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की एक महत्वपूर्ण पहचान रहा है। भाजपा नेता ने कांग्रेस के मौजूदा फैसले को इतिहास के संदर्भ में रखते हुए आरोप लगाया कि जिस प्रकार 1937 में वंदे मातरम् को लेकर कांग्रेस ने मुस्लिम लीग की आपत्तियों के बाद कुछ बदलाव स्वीकार किए थे, उसी राजनीतिक सोच की झलक आज भी दिखाई दे रही है।

भाजपा का आरोप है कि कांग्रेस का मौजूदा रुख राष्ट्र और पार्टी के बीच प्राथमिकता के सवाल को जन्म देता है। हालांकि, ये राजनीतिक आरोप हैं और कांग्रेस इन आरोपों को स्वीकार नहीं करती। (Indian Express)

1937 का फैसला क्यों महत्वपूर्ण है?

वंदे मातरम् को लेकर विवाद नया नहीं है। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान यह गीत राष्ट्रीय चेतना और ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष का प्रमुख प्रतीक बन गया था। बाद में इसके कुछ अंशों को लेकर धार्मिक भावनाओं से जुड़े सवाल उठे और कांग्रेस के भीतर भी इस पर चर्चा हुई।

1937 के संदर्भ में कांग्रेस ने इसके शुरुआती दो अंतरों को अपनाने की व्यवस्था की थी। कांग्रेस आज भी इसी ऐतिहासिक निर्णय को अपने वर्तमान रुख के आधार के रूप में प्रस्तुत कर रही है। (AajTak)

यही वह ऐतिहासिक पृष्ठभूमि है जिसे सुधांशु त्रिवेदी वर्तमान विवाद में सामने रख रहे हैं।

स्वतंत्रता दिवस समारोह ने भी बढ़ाया विवाद

15 अगस्त 2026 को कांग्रेस मुख्यालय में स्वतंत्रता दिवस समारोह के दौरान वंदे मातरम् के गायन को लेकर भी विवाद हुआ था। भाजपा नेताओं ने आरोप लगाया कि कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सोनिया गांधी, राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे गीत के दौरान बातचीत करते हुए दिखाई दिए और इसे राष्ट्रीय गीत के प्रति असम्मान बताया।

वहीं कांग्रेस की ओर से इस आरोप को खारिज करते हुए जयराम रमेश ने स्पष्टीकरण दिया कि गीत रोकने का कोई प्रयास नहीं हुआ था और सोनिया गांधी मल्लिकार्जुन खरगे के लिए कुर्सी की व्यवस्था कराने की बात कर रही थीं। इसलिए इस घटना को लेकर दोनों पक्षों के दावे अलग-अलग हैं। (NDTV)

अब इतिहास बनाम राजनीति की बहस

वंदे मातरम् का मुद्दा अब केवल एक गीत के गायन तक सीमित नहीं रह गया है। इसके साथ स्वतंत्रता आंदोलन, कांग्रेस की ऐतिहासिक भूमिका, मुस्लिम लीग की राजनीति, विभाजन और आज की कथित तुष्टीकरण की राजनीति जैसे मुद्दे भी जुड़ गए हैं।

भाजपा जहां कांग्रेस के मौजूदा रुख को उसके ऐतिहासिक निर्णयों से जोड़ रही है, वहीं कांग्रेस 1937 के अपने फैसले और 1950 में संविधान सभा द्वारा राष्ट्रीय गीत की स्थिति स्पष्ट किए जाने का हवाला दे रही है। (AajTak)

ऐसे में सुधांशु त्रिवेदी की टिप्पणी ने इस पुराने ऐतिहासिक विवाद को एक बार फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है। आने वाले दिनों में यह मुद्दा संसद और राजनीतिक मंचों पर और अधिक गरमाने की संभावना है।

नोट: इस लेख में राजनीतिक दलों और नेताओं द्वारा लगाए गए आरोपों को उनके दावों के रूप में प्रस्तुत किया गया है। विवाद से जुड़े सभी दावों की स्वतंत्र पुष्टि समान रूप से उपलब्ध नहीं है।

वीडियो: सुधांशु त्रिवेदी का विशेष साक्षात्कार — वंदे मातरम् पर अड़ी कांग्रेस, सुधांशु त्रिवेदी ने याद दिलाया इतिहास! YouTube वीडियो देखें