रावण की पूजा करने वाला अनोखा गांव
रावण बाबा की अनोखी प्रतिमा
राजधानी भोपाल से लगभग 100 किलोमीटर दूर स्थित इस गांव की पहचान यहां मौजूद विशाल शिल्पकला से है, जिसे स्थानीय लोग “रावण बाबा” कहते हैं। यह प्रतिमा लेटी हुई अवस्था में है और ग्रामीण इसे ग्रामदेवता मानकर नित्य पूजा करते हैं। इतिहासकार इसे परमार काल का मानते हैं, लेकिन स्थानीय मान्यता है कि यह प्रतिमा त्रेता युग से जुड़ी हुई है।
विवाह और शुभ कार्यों की शुरुआत रावण बाबा से
गांव की परंपरा अन्य गांवों से बिल्कुल अलग है। यहां विवाह, गृहप्रवेश या नया वाहन खरीदने जैसे किसी भी शुभ अवसर की शुरुआत रावण बाबा की पूजा से होती है। दूल्हा-दुल्हन विवाह के बाद प्रतिमा के दर्शन करने अनिवार्य रूप से आते हैं। नए वाहन पर ग्रामीण “जय लंकेश” या “रावण” लिखवाना शुभ मानते हैं।
आस्था से जुड़ी मान्यताएं
यहां की महिलाएं आज भी परंपरागत रीति से रावण बाबा के स्थान पर घूंघट करती हैं। कई परिवार रावण को अपने कुलदेवता के रूप में पूजते हैं। प्रतिमा पर रोज़ाना दो बार आरती होती है और प्रसाद का वितरण किया जाता है। गांव के पास स्थित “बुद्धा की पहाड़ी” और एक तालाब से भी कई मान्यताएं जुड़ी हैं। कहा जाता है कि तालाब में आज भी रावण की तलवार सुरक्षित है।
रावण दहन से दूरी
जहां पूरे देश में दशहरे पर रावण दहन होता है, वहीं इस गांव के लोग इस आयोजन से दूरी बनाए रखते हैं। ग्रामीण मानते हैं कि अपने ग्रामदेवता का दहन करना या उसका दृश्य देखना भी अशुभ है।
रावण का दूसरा पक्ष
इतिहासकारों और समाजशास्त्रियों का मानना है कि रावण केवल नकारात्मक छवि वाला पात्र नहीं था। वह एक महान शिवभक्त, विद्वान और वेदों का ज्ञाता था। लंका को उसने स्वर्ण नगरी में बदल दिया था। विदिशा का यह गांव रावण के इन्हीं गुणों को मानकर उसकी पूजा करता है।
आस्था और आधुनिकता का संगम
गांव के लोग मानते हैं कि रावण बाबा उनकी रक्षा करते हैं और उनकी पूजा से सुख-समृद्धि मिलती है। आधुनिक युग में भी यह परंपरा जीवित है और ग्रामीण इसे अपनी सामाजिक पहचान मानते हैं। चूंकि यह गांव विश्व प्रसिद्ध उदयगिरि गुफाओं और सांची स्तूप के करीब है, इसलिए राज्य सरकार भी इसे पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने के प्रयास कर रही है ताकि इस अनोखी परंपरा और संस्कृति को दुनिया के सामने लाया जा सके।
