एक अद्भुत मंदिर: जहां प्रसाद के रूप में चढ़ते हैं रंग-बिरंगे घोड़े

An amazing temple where colorful horses are offered as offerings
 
पांडवों से शुरू हुई घोड़े चढ़ाने की प्रथा

(संजीव शर्मा – विभूति फीचर्स)

भारत की धरती पर अनोखी परंपराओं की कमी नहीं, लेकिन कुरुक्षेत्र स्थित भद्रकाली माता का यह मंदिर अपने आप में बिल्कुल अद्वितीय है। यहां प्रसाद के रूप में न तो लड्डू चढ़ते हैं, न नारियल—बल्कि चढ़ते हैं घोड़े। जी हां, छोटे-छोटे मिट्टी, चीनी मिट्टी और धातु से बने रंग-बिरंगे घोड़े—सफेद, लाल, पीले, काले, हरे… हर रंग के। पहली बार देखने वाले श्रद्धालुओं को यह दृश्य आश्चर्यचकित कर देता है, लेकिन इस परंपरा की जड़ें सीधे महाभारत काल से जुड़ी हैं।

पांडवों से शुरू हुई घोड़े चढ़ाने की प्रथा

कहानी वही है जब महाभारत युद्ध शुरू होने को था। कौरवों की विशाल सेना देखकर पांडव चिंतित थे। यह वह समय था जब गीता उपदेश भी नहीं हुआ था। पांडवों की मन:स्थिति समझकर भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें सलाह दी— “पहले माँ भद्रकाली के दर्शन करो और वहां घोड़ा अर्पित करना मत भूलना। जिसने यहां घोड़ा चढ़ाया है, वह कभी पराजित नहीं हुआ।”श्रीकृष्ण के आदेश का पालन करते हुए पांडव कुरुक्षेत्र के समीप स्थित इस पवित्र स्थल पहुंचे और मां को पांच घोड़े अर्पित किए। मान्यता है कि इसी कारण पांडव विजयी हुए और तभी से मन्नत पूरी होने पर घोड़ा चढ़ाने की यह परंपरा चली आ रही है।

पांडवों से शुरू हुई घोड़े चढ़ाने की प्रथा

भद्रकाली शक्तिपीठ—जहां माता सती का दाहिना टखना गिरा

मंदिर का महत्व इसलिए भी अधिक है क्योंकि यह 51 शक्तिपीठों में से एक है। पौराणिक कथा के अनुसार, जब भगवान शिव सती माता के शरीर को लेकर तांडव कर रहे थे, तो विष्णुजी ने सुदर्शन चक्र से उनके शरीर को खंडित किया। जहां-जहां माता के अंग गिरे, वे स्थान शक्तिपीठ कहलाए।

कुरुक्षेत्र स्थित यह शक्ति धाम वह स्थान है जहां मां सती का दाहिना टखना गिरा था। इसे देवीकूप, सावित्रीपीठ, आदिपीठ, कालीपीठ जैसे नामों से भी जाना जाता है।अधिकांश शक्तिपीठ पहाड़ी क्षेत्रों में हैं, परंतु यह मंदिर समतल भूमि पर बना है, जहां तक वाहन से आसानी से पहुंचा जा सकता है।

गर्भगृह की अद्भुत दिव्यता

मंदिर में प्रवेश करते ही घंटियों की मधुर ध्वनि, सुगंध और शांत वातावरण मन को आध्यात्मिकता से भर देता है। गर्भगृह में माता की अष्टभुजा वाली काले पत्थर की प्राचीन प्रतिमा विराजमान है—इतनी जीवंत कि लगता है मानो माता स्वयं बात कर उठें। उनके समक्ष विशाल कमल का प्रतीक और राम–सीता, राधा–कृष्ण सहित कई देव प्रतिमाएं स्थापित हैं।

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सैकड़ों घोड़े—मंदिर की सबसे अनोखी पहचान

मंदिर में प्रवेश करते ही आपको दीवारों, शेल्फों, कोनों—हर जगह रंग-बिरंगे घोड़े ही घोड़े दिखाई देंगे। मिट्टी, प्लास्टर, चीनी मिट्टी या धातु से बने ये घोड़े श्रद्धालुओं की मन्नत का प्रतीक हैं। यहां सोने और चांदी के घोड़े भी बड़ी संख्या में अर्पित किए जाते हैं।इसी तरह बड़ी संख्या में बंधे लाल-पीले मन्नत के धागे और उनसे बना विशाल नारियल भी श्रद्धा का विशेष केंद्र है। मन्नत पूरी होने पर भक्त यहां घोड़ा चढ़ाते हैं, नारियल फोड़ते हैं और धागे खोलकर धन्यवाद अर्पित करते हैं।

आज भी भक्त यहां—

  • परीक्षा में सफलता

  • संतान प्राप्ति

  • व्यापार वृद्धि

  • परिवार की सुरक्षा

जैसी इच्छाओं के साथ बड़ी संख्या में दर्शन करने आते हैं।

मंदिर कैसे पहुंचें

भद्रकाली मंदिर तक पहुंचना बेहद आसान है—

  • दिल्ली से दूरी: लगभग 160 किमी

  • चंडीगढ़ से दूरी: लगभग 100 किमी

  • कुरुक्षेत्र रेलवे स्टेशन से: सिर्फ 3 किमी

  • नज़दीकी एयरपोर्ट: दिल्ली व चंडीगढ़

कुरुक्षेत्र से जुड़ी सड़कें और रेलवे कनेक्टिविटी बेहतरीन है। किसी भी माध्यम से यहां पहुंचना सरल है।यहां आने पर ब्रह्मसरोवर, ज्योतिसर, बाणगंगा जैसे महाभारत कालीन ऐतिहासिक स्थलों का दर्शन भी अवश्य करना चाहिए। भद्रकाली मंदिर न सिर्फ आस्था का केंद्र है, बल्कि यह दर्शाता है कि परंपरा समय के साथ बदल सकती है, पर उसका भाव शाश्वत रहता है। यहां अर्पित किया जाने वाला हर घोड़ा श्रद्धा, विश्वास और माता की कृपा का प्रतीक है—जो आज भी अनगिनत भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण करता आ रहा है।

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