अक्षय तृतीया, तपती गर्मी और मटके का वो सोंधापन: यादों के झरोखे से बचपन का सुकून

Akshaya Tritiya, the scorching heat, and the earthy fragrance of the earthen pot—glimpses of childhood's tranquility through the windows of memory.
 
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(पवन वर्मा-विनायक फीचर्स)

विशेष लेख | 19 अप्रैल 2026: गर्मी की वो तपती दोपहर और घर के कोने में रखे मटके के पास झुककर अंजलि भरकर पानी पीना... यह केवल प्यास बुझाना नहीं था, बल्कि एक पूरा अनुभव था। आज जब हम फ्रिज और आरओ (RO) के दौर में जी रहे हैं, तब बचपन की यादों में सबसे ठंडी और मीठी चीज़ अगर कुछ याद आती है, तो वह बर्फ नहीं, बल्कि मिट्टी के मटके का वो सोंधापन है।

जब मटका ही 'संसार' था

आज के बच्चों को यह समझाना मुश्किल है कि एक समय ऐसा भी था जब फ्रिज घरों की विलासिता नहीं, बल्कि एक सपना हुआ करते थे। तब मटका ही हमारा फ्रिज था और वही हमारा संसार। अक्षय तृतीया के पावन अवसर पर घर में नया मटका आना एक परंपरा थी, मानो घर में कोई नया सामान नहीं बल्कि नया सदस्य आया हो। मिट्टी की खुशबू लिए वह मटका जब पहली बार पानी से भरा जाता था, तो लगता था जैसे हमने प्रचंड गर्मी पर अपनी पहली जीत हासिल कर ली है।

मटके की पूजा और खरबूजे का वो स्वाद

अक्षय तृतीया का दिन केवल मटका लाने तक सीमित नहीं था। उस दिन मटके पर 'स्वस्तिक' बनाया जाता, उसकी पूजा होती और फिर शुरू होता सोंधे पानी का दौर। साथ में बनता था चने का सत्तू और खरबूजे का शरबत। खरबूजे के छोटे-छोटे टुकड़ों में शक्कर मिलाकर मटके के पास ठंडा होने के लिए रखना और फिर उसे प्रसाद के रूप में पाना... वह स्वाद आज के किसी भी महंगे एनर्जी ड्रिंक या जूस में नहीं मिलता।

मटका: सादगी और समानता का प्रतीक

बचपन में पढ़ी वह कविता— “चल रे मटके टम्मक टूँ, तेरा पानी पीवे कूँ…” आज एक गहरा जीवन दर्शन लगती है। मटका कभी भेदभाव नहीं करता था। घर का सदस्य हो, कोई खास मेहमान या राह चलता अजनबी—मटके का पानी सबके लिए एक जैसा शीतल और मीठा होता था। वह हमें सिखाता था कि मिट्टी से जुड़कर कैसे दूसरों की प्यास बुझाई जाती है और सादगी में कितना गहरा सुकून छिपा होता है।

50 की उम्र और वही सोंधापन

बचपन से लेकर 50 की इस उम्र तक शहर बदले, सुविधाएं बढ़ीं, एसी और बड़े फ्रिज आ गए, लेकिन नए मटके के पानी का सोंधापन आज भी अपरिवर्तित है। आज भी जब घर में नया मटका आता है, तो एक अजीब सी आत्मीयता महसूस होती है, जैसे बचपन की वह ठंडी दोपहर फिर से लौट आई हो।

आज की पीढ़ी के लिए ठंडा पानी केवल एक 'तापमान' है, लेकिन हमारे लिए मटके का पानी एक 'एहसास' है—मिट्टी का, घर का और अपनेपन का। वह पानी केवल गला ही नहीं तर करता था, बल्कि आत्मा को भी तृप्त कर देता था।

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