आकाशगामिनी विद्या : भारतीय योग-तंत्र की रहस्यमयी चेतना

Akashagamini Vidya: The mysterious consciousness of Indian Yoga-Tantra
 
आकाशगामिनी विद्या : भारतीय योग-तंत्र की रहस्यमयी चेतना
हॉलीवुड की प्रसिद्ध अभिनेत्री शर्ल मैक्लीलन ने अपने यात्रा संस्मरणों में उल्लेख किया है कि एक बार भूटान और आसपास के पर्वतीय क्षेत्रों की यात्रा के दौरान उन्होंने आकाश में पीतवस्त्रधारी एक लामा को उड़ते हुए देखा। उस अद्भुत दृश्य को देखकर उनके मुख से अनायास ही निकल पड़ा— “काश! आज न्यूटन और आइंस्टीन यहाँ होते।”

यह घटना हमें यह सोचने पर विवश करती है कि जो हम नहीं देख पाते, वह अस्तित्व में नहीं है—यह मान लेना ही हमारी सबसे बड़ी भूल है। संभव है कि हम देखने में ही सक्षम न हों। कोरोना काल में जब पूरी दुनिया ठहर गई थी, तब भी यह अनुभूति और गहरी हुई कि हमारी समझ से परे भी बहुत कुछ घटित होता रहता है।

खेचरी मुद्रा और शारीरिक–मानसिक प्रभाव

खेचरी मुद्रा योग की एक अत्यंत महत्वपूर्ण साधना है। यह गले में स्थित थायरॉयड ग्रंथि के स्राव को संतुलित करती है, जिससे मेटाबॉलिज्म बेहतर होता है।
परिणामस्वरूप—

  • पाचन तंत्र स्वस्थ रहता है

  • पेट संबंधी रोग नहीं होते

  • शरीर ऊर्जावान और मन शांत होता है

इस मुद्रा का नियमित अभ्यास क्रोध पर नियंत्रण, मानसिक शांति और एकाग्रता में अद्भुत वृद्धि करता है। स्वयं साधना के अनुभव में भी यह देखा गया है कि नियमपूर्वक अभ्यास से इसके चमत्कारी परिणाम सामने आते हैं।

खेचरी मुद्रा और सिद्धियाँ

खेचरी मुद्रा को परंपरागत रूप सेआकाशगमन, जल में चलना और अन्य सिद्धियों की प्राप्ति से जोड़ा गया है।ऐसा साधक शिवतत्त्व में निमग्न होकर स्वयं में स्थित हो जाता है।देवरहा बाबा, स्वामी विशुद्धानंद और गुरु तोतापुरी जैसे सिद्ध पुरुष इस विद्या में निपुण माने जाते हैं।खे का अर्थ है आकाश और चरी का अर्थ है विचरण करना। इस साधना में पद्मासन में बैठकर—

  • दृष्टि भ्रूमध्य में स्थिर की जाती है

  • श्वास-प्रश्वास का सूक्ष्म अवलोकन किया जाता है

  • जीभ को उलटकर तालु के पीछे रंध्र में लगाने का अभ्यास किया जाता है

आकाशगामिनी विद्या : योग-तंत्र की 64 विद्याओं में एक

आकाशगामिनी विद्या अति प्राचीन तांत्रिक विज्ञान है, जिसे योग-तंत्र की 64 विद्याओं में प्रमुख स्थान प्राप्त है। इस विद्या से युक्त साधकपर्वत, वन, समुद्र, नदी—किसी से बाधित नहीं होता आकाश मार्ग से इच्छानुसार विचरण कर सकता है

पौराणिक और ऐतिहासिक उदाहरण

  • महर्षि शुकदेव ने इसी विद्या से संपूर्ण जम्बूद्वीप की यात्रा की

  • महर्षि नारद तीनों लोकों में इसी से विचरण करते थे

  • हनुमान जी ने समुद्र लंघन और संजीवनी लाने में इसका प्रयोग किया

  • रावण इस विद्या का महान आचार्य माना गया

रावण ने हेमवती विद्या से स्वर्ण निर्माण किया और लंका को स्वर्णमय बनाया।

यक्ष, राक्षस और तांत्रिक विज्ञान

आर्यों के आगमन से पूर्व भारत में यक्ष और राक्षस जातियाँ थीं—दोनों शिव और प्रकृति के उग्र रूपों के उपासक थे।

  • यक्ष : प्रकृति से सामंजस्य

  • राक्षस : प्रकृति पर आधिपत्य

इन्हीं प्रयासों से विविध तांत्रिक विद्याओं और विज्ञानों का विकास हुआ।

पारद विद्या और अमृत तत्व

तांत्रिक विज्ञान में पारद (पारा) अत्यंत महत्वपूर्ण है।इसे बाँधने की प्रक्रिया को रसबन्ध क्रिया कहते हैं।रावण ने पारद से एक गुटिका बनाकर नाभि में धारण की थी, जिससे वहजरा-मरण से मुक्त हो गया। इसी सिद्ध पारद को अमृत कहा गया।

नागार्जुन और आकाशगमन

दूसरी शताब्दी में नागार्जुन ने आकाशगामिनी विद्या को पुनर्जीवित किया। उनके गुरु पदलिप्त स्वयं आकाश मार्ग से तीर्थ यात्रा करते थे।

नागार्जुन—

  • पारद विद्या

  • तारक विद्या (आकाशगमन)

  • हेमवती विद्या (स्वर्ण निर्माण)

के महान आचार्य थे।

तिब्बत का प्रसिद्ध ग्रंथ ‘रस-रत्नाकर’ भी उन्हीं की रचना मानी जाती है।

वैद्य व्याड़ी और भूल से मिली सिद्धि

उज्जैन के वैद्य व्याड़ी ने रसायन विद्या में जीवन लगा दिया।एक शब्द की गलत व्याख्या रक्तामल’ को आँवला समझ लेना उनकी वर्षों की असफलता का कारण बना।परंतु एक संयोगवश तेल और रक्त के मिश्रण से वे और उनकी पत्नी वायु में उड़ने लगे। यहीं से आकाशगामिनी विद्या की अंतिम स्पष्ट ऐतिहासिक घटना मिलती है।

ज्ञान का विनाश और शेष सिद्ध परंपरा

विदेशी आक्रमणों में—

  • नालंदा जैसे विश्वविद्यालय नष्ट हुए

  • दुर्लभ ग्रंथ जला दिए गए

फिर भीगौड़पाद, गोरखनाथ, नागसेन, चर्पटीनाथ जैसे सिद्धों ने परंपरा को जीवित रखा।आज भी हिमालय की गुहाओं में ऐसे सिद्ध पुरुष निवास करते हैं—जो पारद सिद्धि से काल-बंधन से मुक्तऔर आकाशगामिनी विद्या से स्वतंत्र विचरण करते हैं।सामान्य लोग उन्हें नहीं देख पाते,पर कुछ पुण्यात्माओं को उनके प्रत्यक्ष दर्शन हुए हैं— उन्हें आकाशमार्ग से गमन करते हुए।

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