Chandra Grahan 2026: इन मंदिरों पर बेअसर है चंद्र ग्रहण; सूतक काल में भी यहाँ खुले रहते हैं भगवान के द्वार

3 मार्च 2026 को लगने वाला पूर्ण चंद्र ग्रहण ज्योतिषीय और धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। जहाँ एक ओर सूतक काल के दौरान देशभर के अधिकांश मंदिरों के कपाट बंद कर दिए जाते हैं, वहीं भारत की आध्यात्मिक भूमि पर कुछ ऐसे सिद्ध स्थान भी हैं जहाँ ग्रहण का कोई बंधन नहीं चलता। इन मंदिरों में ग्रहण के काले साये के बीच भी आस्था की ज्योति जलती रहती है।
 
Chandra Grahan 2026: इन मंदिरों पर बेअसर है चंद्र ग्रहण; सूतक काल में भी यहाँ खुले रहते हैं भगवान के द्वार
Chandra Grahan 2026:   खगोलीय गणना के अनुसार आज साल का पहला पूर्ण चंद्र ग्रहण लग रहा है। शास्त्रानुसार ग्रहण के दौरान देव-प्रतिमाओं का स्पर्श और पूजा वर्जित मानी जाती है, जिसके कारण केदारनाथ से लेकर कन्याकुमारी तक के मंदिरों के पट बंद कर दिए जाते हैं। लेकिन, हमारे देश में कुछ ऐसे चमत्कारिक मंदिर हैं जहाँ की परंपराएं इन नियमों से परे हैं।

1. महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग, उज्जैन (मध्य प्रदेश)

अवंतिका नगरी के राजा 'महाकाल' स्वयं काल (समय) के स्वामी हैं। मान्यता है कि जो कालचक्र को नियंत्रित करता है, उस पर ग्रहण जैसी खगोलीय घटनाओं का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। यही कारण है कि उज्जैन के महाकाल मंदिर के कपाट ग्रहण के दौरान भी खुले रहते हैं और श्रद्धालु बिना किसी बाधा के भस्म आरती और दर्शन का लाभ उठा सकते हैं।

2. कालकाजी मंदिर, दिल्ली

राजधानी दिल्ली का ऐतिहासिक कालकाजी मंदिर शक्तिपीठों में विशेष स्थान रखता है। माँ कालका को 'काल की स्वामिनी' माना गया है। यहाँ मान्यता है कि सभी ग्रह-नक्षत्र देवी के अधीन हैं, इसलिए ग्रहण यहाँ अशुभ नहीं बल्कि साधना के लिए अत्यंत शुभ समय माना जाता है। ग्रहण काल में यहाँ भक्तों की भारी भीड़ माँ के दर्शन के लिए उमड़ती है।

3. कल्पेश्वर महादेव, चमोली (उत्तराखंड)

पंच केदारों में से एक 'कल्पेश्वर मंदिर' अपनी आदिम परंपराओं के लिए विख्यात है। यहाँ भगवान शिव की जटाओं की पूजा होती है। दुर्गम पहाड़ियों में स्थित इस मंदिर के कपाट ग्रहण के दौरान कभी बंद नहीं किए जाते। श्रद्धालुओं का मानना है कि ग्रहण के समय यहाँ की ऊर्जा और भी अधिक बढ़ जाती है, जिससे ध्यान और पूजन का फल अनंत गुना मिलता है।

4. थिरुवारप्पु श्री कृष्ण मंदिर, कोट्टायम (केरल)

इस मंदिर की परंपरा बेहद अनोखी और भावुक कर देने वाली है। यहाँ माना जाता है कि बालकृष्ण को बहुत अधिक भूख लगती है, इसलिए उन्हें दिन में 10 बार भोग लगाया जाता है। भगवान को भूखा न रहना पड़े, इस ममतामयी सोच के कारण ग्रहण के दौरान भी मंदिर बंद नहीं किया जाता और भोग की प्रक्रिया निरंतर जारी रहती है।

5. विष्णुपद मंदिर, गया (बिहार)

मोक्षदायिनी फल्गु नदी के तट पर स्थित विष्णुपद मंदिर पितृ पक्ष और पिंडदान के लिए जगत प्रसिद्ध है। शास्त्रों में ग्रहण के समय किए गए दान और तर्पण का विशेष महत्व बताया गया है। इसी महत्ता को देखते हुए यहाँ ग्रहण के दौरान भी कपाट खुले रखे जाते हैं ताकि श्रद्धालु अपने पूर्वजों की मुक्ति के लिए विशेष अनुष्ठान संपन्न कर सकें।

6. लक्ष्मीनाथ मंदिर, बीकानेर (राजस्थान)

बीकानेर के इस प्राचीन मंदिर से एक लोककथा जुड़ी है। कहा जाता है कि सदियों पहले ग्रहण के कारण भगवान को भोग नहीं लगा, तब स्वयं ठाकुर जी ने एक हलवाई को सपने में दर्शन देकर अपनी क्षुधा (भूख) के बारे में बताया था। उस चमत्कारिक घटना के बाद से यहाँ ग्रहण के दौरान पट बंद करने की परंपरा हमेशा के लिए समाप्त कर दी गई।

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