जागृत आत्मा के लक्षण और आत्म-प्रबोधन का मार्ग

Signs of an Awakened Soul and the Path to Self-Enlightenment
 
जागृत आत्मा के लक्षण और आत्म-प्रबोधन का मार्ग

आत्मा" की निद्रा का मूल कारण मनुष्य का अज्ञान है। यह अज्ञान इस बात में निहित है कि मनुष्य यह नहीं जानता कि वह वास्तव में क्या है, संसार में क्यों आया है, और उसका अंतिम लक्ष्य क्या है। यदि मनुष्य इन तीनों मौलिक प्रश्नों का ज्ञान प्राप्त कर ले, तो उसकी आत्मा में जागरण की स्थिति पैदा हो जाएगी।

इन प्रश्नों का उत्तर सरल और अंतिम है: मनुष्य परमात्मा का अंश, उसका प्रतिनिधि और पुत्र है। वह संसार में आनंद की खोज करने, उसे प्राप्त करने और इस क्रम में स्वयं को पहचानकर अपने लक्ष्य स्वरूप को प्राप्त करने के लिए आया है।

आत्मिक निद्रा की पहचान और उसके कारण

अपने वास्तविक व्यक्तित्व, कर्तव्य और उद्देश्य से अनभिज्ञ रहने के कारण अज्ञानी मनुष्य अपनी चेतना को निम्न चीज़ों में फँसाए रखता है

  • वासनाओं, तृष्णाओं और एषणाओं (इच्छाओं)

  • मरीचिकाओं (भ्रम) और कुरूपताओं

  • अमंगलकारी प्रवृत्तियों

इस विपरीत स्थिति में, विषयों में सुख खोजना, पदार्थों में आसक्ति बढ़ाना, माया से मोहित होना और कामनाओं का पालन करना उसका स्वभाव बन जाता है। ऐसी विकृत मनोदशा में आत्मा का मोह-निद्रा में मूर्छित पड़ा रहना स्वाभाविक है।

जिसकी आत्मा सोती है, वह मानो स्वयं सोता है। आत्म-जागृति से रहित मनुष्य का भौतिक जागरण, संसार रूपी स्वप्न में डूबे रहने के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। जो व्यक्ति संसार में आकर केवल संसार को पाने की इच्छा रखता है, वह सच्चिदानंद स्वरूप को कैसे प्राप्त कर सकता है? नश्वरता की उपासना करने वाले के लिए अमृतत्व पाना संभव नहीं है।

जागृत आत्मा के लिए तत्काल कार्रवाई

यदि आपको अपनी रुचियों और प्रवृत्तियों में कुरूपता, क्षुद्रता या कलुष-उन्मुखता का आभास होता है, तो तुरंत यह समझ लेना चाहिए कि:

  1. आपकी आत्मा सोई हुई है।

  2. यह एक बड़ा दुर्भाग्य और प्रचंड हानि है।

इस स्थिति को तुरंत दूर करने के लिए तत्पर हो जाना चाहिए। यदि आप प्रमादवश अपनी वर्तमान स्थिति में पड़े रहेंगे, तो आप एक ऐसी क्षति करेंगे, जिसकी भरपाई जन्म-जन्मांतरों तक पूरी नहीं हो सकेगी।

आत्मोन्नति और जागरण के उपाय

आत्म-प्रबोधन (आत्मोन्मेष) के उपायों के लिए आपको अपनी तुच्छताओं, क्षुद्रताओं और वासनाओं को त्यागना होगा।

  • त्याग: दुराचरण, दुर्विचार और दुष्कल्पनाओं को छोड़ दें।

  • ग्रहण: उन्नत, उदात्त और आदर्श रीति-नीति को अपनाएँ।

  • साधना: अपने मनोविकारों और निषेधों को त्यागकर शिव (कल्याणकारी) और सुंदर की साधना में लगें।

यह एक साधना और तप है, किंतु ऐसा तप नहीं है जो मनुष्य के लिए अत्यंत दुष्कर हो। इस तप की साधना के लिए, आपको पुन: आत्मा की ओर ही परिवृत होना होगा, क्योंकि आत्मा ही उन सभी शक्तियों और साहसों का केंद्र है, जिसकी साधना में आवश्यकता होती है। मनुष्य की आत्मा ही उसका सबसे सच्चा मित्र और पथ-प्रदर्शक है। उसी की प्रेरणा से मनुष्य सन्मार्ग, पवित्र प्रवृत्तियों और दिव्य गुणों की ओर अग्रसर होता है। अपनी आत्मा में विश्वास कीजिए और उसे अपने भीतर अधिष्ठित परमात्मा ही समझिए।

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