Chausath Yogini Temple Jabalpur: भारत का एकमात्र ऐसा मंदिर जहाँ नंदी पर विवाह मुद्रा में एक साथ विराजमान हैं शिव-पार्वती! जानिए तंत्र साधना के इस ऐतिहासिक केंद्र की महिमा

Chausath Yogini Temple, Jabalpur: India's only temple where Shiva and Parvati are seated together on Nandi in a wedding posture! Discover the glory of this historic center of Tantric practice.
 
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Chausath Yogini Temple Bhedaghat: सावन के पवित्र महीने में देश भर के शिवालय 'हर-हर महादेव' के जयकारों से गुंजायमान हैं। मध्य प्रदेश की संस्कारधानी जबलपुर के प्रसिद्ध पर्यटन स्थल भेड़ाघाट में स्थित प्राचीन चौसठ योगिनी मंदिर में इन दिनों श्रद्धालुओं का भारी सैलाब उमड़ रहा है। संगमरमर की धवल पहाड़ियों पर स्थित यह मंदिर न केवल आस्था का प्रमुख केंद्र है, बल्कि वास्तुकला, इतिहास और तांत्रिक साधना की एक अनूठी विरासत को भी संजोए हुए है।

 पूरे देश में अनूठी है यह प्रतिमा

चौसठ योगिनी मंदिर के परंपरागत महंत धर्मेंद्र पुरी गोस्वामी के अनुसार, इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यहाँ स्थापित भगवान शिव और माता पार्वती की अत्यंत दुर्लभ प्रतिमा है:

  • एक ही नंदी पर विराजमान: इस अलौकिक प्रतिमा में भगवान भोलेनाथ और माता पार्वती विवाह की मुद्रा में एक ही नंदी पर विराजमान हैं।

  • अद्वितीय स्वरूप: ऐसी विवाह मुद्रा वाली संयुक्त प्रतिमा पूरे भारत में किसी अन्य शिव मंदिर में देखने को नहीं मिलती, जो इसे देश के सभी शिवालयों में सबसे अलग पहचान देती है।

 तांत्रिकों की यूनिवर्सिटी' के रूप में प्रसिद्ध था मंदिर

इतिहासकारों के अनुसार, इस भव्य मंदिर का निर्माण 9वीं-10वीं शताब्दी में कलचुरी शासकों द्वारा कराया गया था।

  • शक्ति उपासना का केंद्र: प्राचीनकाल में यह स्थान तंत्र साधना और तांत्रिक विद्या का प्रमुख केंद्र माना जाता था। देश-विदेश से साधक यहाँ आकर साधना करते थे, जिसके कारण इसे 'तांत्रिकों की यूनिवर्सिटी' भी कहा जाता था।

  • 64 योगिनियों का वास: मंदिर का नाम यहाँ स्थापित 64 योगिनियों (माता दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों) के कारण पड़ा। हालाँकि, समय की थपेड़ों से वर्तमान में केवल 61 प्रतिमाएँ ही सुरक्षित बची हैं।

 सुवर्ण ऋषि और नर्मदा नदी से जुड़ा पौराणिक इतिहास

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, एक बार भगवान शिव और माता पार्वती भ्रमण करते हुए इस पहाड़ी पर पधारे थे। उस समय यहाँ सुवर्ण ऋषि तपस्या कर रहे थे। ऋषि ने महादेव के दर्शन पाकर उनसे प्रार्थना की कि जब तक वे माँ नर्मदा का पूजन करके लौटें, तब तक भगवान इसी पहाड़ी पर विराजमान रहें। भक्त की अटूट भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव वहीं ठहर गए। कहा जाता है कि सुवर्ण ऋषि की प्रार्थना पर ही माँ नर्मदा ने संगमरमर की चट्टानों के बीच से अपना नया मार्ग बनाया था, जो आज प्रसिद्ध धुआंधार प्रपात के रूप में जाना जाता है।

 पुरातात्विक धरोहर और श्रद्धालुओं की आस्था

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के संरक्षण में मौजूद यह मंदिर लाल बलुआ पत्थरों से निर्मित एक गोल घेरे में फैला हुआ है। सावन के दौरान यहाँ रोजाना विशेष रुद्राभिषेक, दुग्धाभिषेक और महाआरती का आयोजन किया जाता है। स्थानीय दर्शनार्थी दुर्गा ठाकुर और मधु पटेल का कहना है कि नंदी पर विराजमान शिव-पार्वती के इस अद्भुत रूप के दर्शन मात्र से मन को असीम शांति मिलती है और हर मनोकामना पूर्ण होती है।जबलपुर के भेड़ाघाट स्थित इस मंदिर में प्रवेश के लिए दो प्रमुख मार्ग हैं—पहला नर्मदा तट की ओर से और दूसरा पंचवटी घाट व धुआंधार जलप्रपात की दिशा से सीढ़ियाँ चढ़कर पहुँचा जा सकता है।

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