आस्था और शौर्य का संगम: गढ़पहरा के सिद्ध हनुमान और ऐतिहासिक किला

डॉ. संदीप सबलोक की यह रचना मध्य प्रदेश के सागर जिले की ऐतिहासिक और आध्यात्मिक भव्यता का एक सुंदर दस्तावेज है। गढ़पहरा के हनुमान और यहाँ का किला केवल ईंट-पत्थरों का ढांचा नहीं, बल्कि बुंदेलखंड की आन-बान-शान और अटूट विश्वास का संगम है।
 
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— डॉ. संदीप सबलोक (विनायक फीचर्स)

मध्य प्रदेश के सागर जिले की ऐतिहासिक धरा पर स्थित गढ़पहरा का किला बुंदेलखंड के शौर्य, बेमिसाल स्थापत्य कला और अटूट धार्मिक आस्था का जीवंत गवाह है। विंध्य पर्वत श्रृंखलाओं की ऊँची पहाड़ियों पर विराजे हनुमान जी का प्राचीन सिद्ध मंदिर न केवल एक धार्मिक केंद्र है, बल्कि यह इस क्षेत्र के सामाजिक और सांस्कृतिक ताने-बाने का अभिन्न हिस्सा भी है।

1. सिद्ध हनुमान मंदिर: जहाँ गूँजती है 'देव आरती'

पहाड़ की सबसे ऊँची चोटी पर स्थित हनुमान जी की प्रतिमा अत्यंत सौम्य और तेजस्वी है। इस मंदिर को एक 'सिद्ध पीठ' माना जाता है, जिससे कई रोमांचक लोक कथाएँ जुड़ी हैं:

  • अदृश्य सूचना: किंवदंती है कि प्राचीन काल में दुर्ग पर आने वाले किसी भी संकट की सूचना हनुमान जी अदृश्य रूप में राजा को दे दिया करते थे।

  • देव आरती: स्थानीय लोगों का मानना है कि आज भी रात के आखिरी पहर में पहाड़ पर शंख और नगाड़ों की ध्वनि सुनाई देती है, जिसे 'देव आरती' कहा जाता है।

  • निशान चढ़ाने की परंपरा: आषाढ़ मास के मेलों में भक्त अपनी मन्नत पूरी होने पर 'निशान' (ध्वजा) चढ़ाते हैं।

2. आषाढ़ मेला: बुंदेली संस्कृति का दर्पण

वर्षा ऋतु के आगमन के साथ आषाढ़ माह के हर मंगलवार को यहाँ भक्ति का सैलाब उमड़ता है। यह मेला केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि बुंदेली लोक संस्कृति का जीवंत रूप है। दूर-दराज के गाँवों से किसान अपनी नई फसल की सुख-समृद्धि की कामना लेकर यहाँ आते हैं। फाग, ढोलक की थाप और भजनों के स्वर आधुनिकता के दौर में भी हमारी जड़ों की मजबूती का अहसास कराते हैं।

3. गढ़पहरा का अभेद्य किला और रहस्यमयी शीश महल

11वीं से 16वीं शताब्दी तक दांगी राजाओं की राजधानी रहा यह दुर्ग बुंदेली वास्तुकला का अद्भुत उदाहरण है:

  • शौर्य का इतिहास: राजा पृथ्वी सिंह के शासनकाल में यह किला अपनी भव्यता के चरम पर था। यहाँ की ऊँची प्राचीरें और पत्थरों पर की गई नक्काशी तत्कालीन वैभव की कहानी सुनाती हैं।

  • शीश महल: किले के भीतर स्थित 'शीश महल' पर्यटकों के लिए विशेष आकर्षण है। दीवारों पर काँच के बारीक काम और झरोखों से दिखने वाला विहंगम दृश्य इसे अद्वितीय बनाता है। यह उस दौर की कलात्मक रुचि और विलासिता का परिचायक है।

4. 'मिनी पचमढ़ी' का अहसास और सामाजिक समरसता

  • प्राकृतिक सौंदर्य: मानसून के दौरान जब पूरी पहाड़ी हरियाली की चादर ओढ़ लेती है, तब गढ़पहरा किसी हिल स्टेशन (मिनी पचमढ़ी) जैसा प्रतीत होता है। यह ट्रेकर्स और शांति की तलाश करने वालों के लिए स्वर्ग समान है।

  • एकता का केंद्र: यहाँ आयोजित होने वाले भंडारों और मेलों में जाति, धर्म और वर्ग का भेद मिट जाता है। हर मंगलवार और शनिवार को यहाँ 'आस्था का लघु कुंभ' दिखाई देता है।

गढ़पहरा का यह परिसर हमारी अमूल्य सांस्कृतिक धरोहर है। यहाँ का हनुमान मंदिर, ऐतिहासिक किला और शीश महल मिलकर सागर को एक विशिष्ट पहचान देते हैं। यदि आप इतिहास और आध्यात्मिकता को एक साथ महसूस करना चाहते हैं, तो आषाढ़ की रिमझिम फुहारों के बीच गढ़पहरा की यात्रा एक अविस्मरणीय अनुभव साबित होगी।

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