भक्त, ठग और भगवान: यमुना तट की वह दिव्य लीला जिसने एक धोखेबाज़ को संत बना दिया

The Devotee, the Conman, and God: That Divine Play on the Banks of the Yamuna That Transformed a Deceiver into a Saint
 
भक्त, ठग और भगवान: यमुना तट की वह दिव्य लीला जिसने एक धोखेबाज़ को संत बना दिया
यह कहानी है परम भक्त गोविंद दास की, जिनके हृदय में संसार की कोई इच्छा नहीं थी। न उन्हें धन की चाह थी, न सुख-सुविधाओं की और न ही मान-सम्मान की। उनके भीतर बस एक ही व्याकुलता थी—अपने आराध्य, अपने ठाकुर जी के साक्षात दर्शन करना।

वे जिससे भी मिलते, यही पूछते कि "मुझे मेरे भगवान कैसे मिलेंगे?" कोई उन्हें मंदिर जाने की सलाह देता, कोई व्रत-उपवास तो कोई दान-पुण्य और जप करने को कहता। लेकिन गोविंद दास का मन कहीं नहीं रमता था। उन्हें लगता कि ये सब साधन अधूरे हैं, उन्हें तो बस सीधे ठाकुर जी को देखना था।

दिन बीतते गए और उनकी बेचैनी बढ़ती गई। न दिन में चैन था, न रात को नींद। उनके होठों पर हर क्षण केवल एक ही नाम रहता था—"श्री राधा, श्री राधा।" लोग उन्हें पागल समझने लगे थे, लेकिन जो प्रेम के सागर में डूब जाता है, उसे दुनिया के तानों से क्या फर्क पड़ता!

जब रास्ते में मिला एक 'ठग'

एक दिन गोविंद दास रोते-बिलखते हुए एक सुनसान रास्ते से गुजर रहे थे। आँखों में आँसू और मन में ठाकुर जी से विरह का गहरा दर्द था। तभी सामने से एक व्यक्ति आता दिखाई दिया। वह कोई साधु-संत नहीं, बल्कि एक शातिर ठग था। उसकी नज़र जैसे ही गोविंद दास के सोने के गहनों (हाथों की अंगूठियां और गले की चैन) पर पड़ी, उसके मन में लालच आ गया। उसने सोचा कि आज अच्छा शिकार हाथ लगा है। कपट का मुखौटा ओढ़कर वह बड़े दयालु स्वर में बोला, "भैया, इस वीराने में क्यों रो रहे हो?"

गोविंद दास ने सुबकते हुए कहा, "मुझे मेरे ठाकुर जी से मिलना है, मैं बहुत भटक चुका हूँ। अब यह दूरी मुझसे और सहन नहीं होती।" ठग ने तुरंत इस मौके का फायदा उठाने की सोची। उसने चालाकी से कहा, "अगर मैं तुम्हें भगवान से मिला दूँ तो?" यह सुनते ही गोविंद दास की आँखों में चमक आ गई। उन्होंने भावुक होकर कहा, "क्या आप सच में मुझे मेरे प्रभु के दर्शन करा सकते हैं? आप जो कहेंगे, मैं वही करूँगा।"

यमुना तट पर परीक्षा और धोखा

ठग गोविंद दास को लेकर यमुना जी के किनारे पहुँचा। चारों तरफ गहरा सन्नाटा था और ठंडी हवाएं चल रही थीं। ठग ने अपनी योजना के अनुसार कहा:

  1. "सबसे पहले अपने ये सारे गहने उतारकर यहाँ रख दो।" (गोविंद दास ने बिना सोचे-समझे सब उतार दिया)।

  2. "अब इस ठंडे जल में उतर जाओ और कंठ (गले) तक पानी में खड़े हो जाओ।"

  3. "अपनी आँखें बंद कर लो और निरंतर 'श्री राधा' नाम का जप करो। जब तक मैं न कहूँ, आँखें मत खोलना। जैसे ही ठाकुर जी आएंगे, मैं तुम्हें बता दूँगा।"

गोविंद दास ने गुरु आज्ञा मानकर आँखें बंद कीं और पूरे समर्पण से जप शुरू कर दिया—"श्री राधा... श्री राधा..."। उधर मौका पाते ही ठग ने गहनों की पोटली उठाई और वहाँ से रफूचक्कर हो गया।रात गहरी होती गई, हवाएं और बर्फीली हो गईं, गोविंद दास का शरीर ठंड से सुन्न होने लगा, लेकिन उनका विश्वास नहीं डगमगाया। वे उसी ठंडे जल में घंटो वैसे ही खड़े रहे।

जब भगवान आए, पर भक्त ने आँखें खोलने से मना कर दिया!

भक्त की इस निश्छल और तड़प भरी पुकार ने गोलोक में भगवान को विवश कर दिया। अचानक यमुना तट पर एक दिव्य प्रकाश फैल गया। पूरा वातावरण एक अलौकिक सुगंध से भर उठा और बंसी की मधुर धुन गूंजने लगी।स्वयं भगवान श्री कृष्ण गोविंद दास के सम्मुख प्रकट हुए। उन्होंने बड़े लाड़ से कहा, "गोविंद दास, आँखें खोलो। देखो, मैं आ गया हूँ।"लेकिन आगे जो हुआ, उसने इस घटना को एक अमर लीला में बदल दिया। गोविंद दास ने आँखें नहीं खोलीं और शांत स्वर में कहा:

"जब तक मेरे गुरुदेव नहीं कहेंगे, मैं आँखें नहीं खोलूँगा।"

भगवान ने मुस्कुराते हुए कहा, "अरे पगले! जिसे तू गुरु मान रहा है, वह तो एक साधारण ठग था। वह तुझे धोखा देकर तेरे सारे गहने लेकर भाग चुका है।"यह सुनकर गोविंद दास क्रोधित हो गए और बोले, "आप मेरे गुरु की निंदा कर रहे हैं? आप मेरे ठाकुर जी कभी नहीं हो सकते! कृपया यहाँ से चले जाइए।" अपने भक्त के इस अनन्य विश्वास को देखकर भगवान वहाँ से अंतर्ध्यान (अदृश्य) हो गए।

ठग का हृदय परिवर्तन और दिव्य चमत्कार

उधर, गहने लेकर भाग रहा ठग अचानक रास्ते में रुक गया। पहली बार उसके भीतर पछतावे की एक भयानक आग सुलग उठी। उसने सोचा, "मैंने एक ऐसे सीधे-सच्चे इंसान को धोखा दिया, जो भगवान के लिए अपनी जान दांव पर लगाए बैठा है!" उसका ज़मीर उसे धिक्कारने लगा।

तभी उसके सामने वही दिव्य प्रकाश प्रकट हुआ और साक्षात भगवान उसके सामने खड़े हो गए। ठग कांपते हुए प्रभु के चरणों में गिर पड़ा और रोते हुए बोला, "प्रभु! लोभ में आकर मुझसे बड़ा पाप हो गया। मुझे क्षमा कर दीजिए।"भगवान ने करुणा से कहा, "तूने पाप तो किया, लेकिन अनजाने में ही सही, तू इस परम लीला का माध्यम बना है। चल मेरे साथ, अभी भी अवसर है।"जब भगवान उस ठग को लेकर वापस यमुना तट पर पहुँचे, तो दृश्य देखकर ठग की आँखें फटी की फटी रह गईं। गोविंद दास का पूरा शरीर ठंड से नीला पड़ चुका था, होठ कांप रहे थे, लेकिन मुख से अभी भी 'श्री राधा' की ध्वनि निकल रही थी।ठग ने ग्लानि से भरकर रोते हुए पुकारा, "गोविंद दास! अपनी आँखें खोलो, भगवान सच में आ गए हैं!"

लीला का सुखद अंत

अपने 'गुरु' (ठग) की आवाज़ सुनते ही गोविंद दास ने तुरंत आँखें खोल दीं। सामने साक्षात मंद-मंद मुस्कुराते ठाकुर जी खड़े थे। गोविंद दास प्रभु के चरणों में ढह गए और भगवान ने उन्हें उठाकर अपने सीने से लगा लिया। उसी क्षण वहाँ एक अद्भुत कौतुक हुआ; बिना मौसम के ही यमुना जी के उस ठंडे जल में चारों तरफ सुंदर कमल के फूल खिल उठे। आकाश से देव ध्वनि गूंजने लगी। उस ठग का जीवन भी सदा के लिए बदल गया और वह पाप की दुनिया छोड़कर प्रभु भक्ति के मार्ग पर चल पड़ा।

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